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11 हजार सेब बागवानों ने प्राकृतिक खेती विधि से शुरू की सेब बागवानी

11 हजार सेब बागवानों ने प्राकृतिक खेती विधि से शुरू की सेब बागवानी

पूजा|शिमला
हिमाचल की आर्थिकी में अहम भूमिका निभाने वाली सेब बागवानी की बढ़ती लागत को कम करने के लिए प्रदेश के बागवानों ने प्राकृतिक खेती विधि से सेब बागवानी शुरू कर दी है। सेब बागवानी में प्रयोग होने वाले मंहगे खादों, कीटनाशकों और फफूंदनाशकों के बजाए अब प्रदेश के 11 हजार सेब बागवानों ने प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान येाजना के तहत शुरू की गई सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती विधि के तहत बागवानी शुरू की है। ढाई साल पहले प्रदेश में शुरू की गई इस योजना के तहत सेब बागवानी के लिए प्रसिद्ध शिमला, कुल्लु, मंडी, चंबा और सिरमौर जिला के किसानों ने अपने 1 से 55 बीघा के बागिचों में बागवानी शुरू कर दी है।

प्राकृतिक खेती के तहत सेब बागवानी को लेकर शिमला में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के दौरान योजना के राज्य परियोजना निदेशक एवं विशेष सचिव कृषि राकेश कंवर ने प्रदेश के 8 जिलों से आए उत्तम बागवानों से सेब बागवानी के बारे में विचार संाझा किए। राकेश कंवर ने कहा कि सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती विधि के सफल परिणाम सभी तरह की अनाज फसलों, सब्जियों और फलों में देखे गए हैं।

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उन्होंने कहा कि अभी तक इस खेती विधि से 11 हजार बागवान और 1 लाख किसान जुड़ चुके हैं और बड़ी तेजी से यह विधि खासकर बागवानों में ख्याति पा रही है। उन्होंने कहा कि इस विधि के तहत विश्वविद्यालयों और विभाग स्तर पर शोध किए गए हैं। जिनके सफल परिणाम देखने को मिले हैं। राकेश कंवर ने कहा कि इस साल प्राकृतिक खेती कर रहे बागवानों का पंजीकरण कर उन्हें उचित बाजार मुहैया करवाया जाएगा। इसके अलावा एचपीएमसी की मंडियों में प्राकृतिक खेती के उत्पादों के लिए अलग से दुकान का प्रावधान भी किया जाएगा।

कार्यशाला के दौरान योजना के कार्यकारी निदेशक प्रो राजेश्वर सिंह चंदेल ने बताया इस खेती विधि को लेकर अभी तक किए गए शोध में इसमें बागवानों की लागत में 43 फीसदी की कमी आई है। इसके अलावा किसी विशेष मार्केट के बागवानों को 27 फीसदी अधिक दाम मिले हैं। उन्होंने बताया कि इस खेती विधि में किसानों को बाजार से कुछ भी लाने की जरूरत नहीं है और किसान अपने घर के आस-पास मौजूद वनस्पतियों से ही सभी प्रकार की दवाईयां तैयार कर सकते हैं। उन्होंने बताया एसपीएनएफ विधि में सेब बागवानों के बागिचों में मारसोनिना और स्कैब का प्रकोप भी कम आंका गया है।

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इस मौके पर प्रदेश के आठ जिलों से आए 30 बागवानों ने प्राकृतिक खेती विधि को लेकर अपने अनुभवों को सांझा किया। इसके अलावा नौणी विश्वविद्यालय के क्षेत्रिय अनुसंधान केंद्र मशोबरा के वैज्ञानिकों ने भी इस मौके पर बागवानों को उनके केंद्र पर प्राकृतिक खेती विधि पर चल रहे शोध कार्य के बारे में जानकारी दी।

Kasauli International Public School, Sanwara (Shimla Hills)
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