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शिमला रेलवे स्टेशन पर गरजे सीटू कार्यकर्ता

Published on: 15 March 2021
शिमला रेलवे स्टेशन पर क्यों गरजे सीटू कार्यकर्ता

पूजा|शिमला
सीटू राज्य कमेटी हिमाचल प्रदेश ने केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच व किसान संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर मजदूर विरोधी लेबर कोडों,कृषि के निगमीकरण,बिजली विधेयक 2020,सार्वजनिक क्षेत्र,बैंक,बीमा,बीएसएनएल,बिजली,ट्रांसपोर्ट,रेलवे के निजीकरण आदि के खिलाफ शिमला के रेलवे स्टेशन पर जोरदार प्रदर्शन किया।

इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने रेलवे स्टेशन पर धरना दे दिया व केंद्र सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी पर उतर आए। प्रदर्शन में विजेंद्र मेहरा,बाबू राम,बालक राम,किशोरी ढटवालिया,विनोद बिरसांटा,विकास,प्रेम चंद,देशराज,राम प्रकाश,सुरजीत,हिमी देवी आदि शामिल रहे। सीटू ने केंद्र सरकार को चेताया है कि मजदूर विरोधी लेबर कोडों,काले कृषि कानूनों,सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण व बिजली विधेयक 2020 के खिलाफ आंदोलन तेज होगा।

सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा व जिला सचिव बाबू राम ने रेलवे स्टेशन पर हुए धरने को सम्बोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार की निजीकरण की मुहिम से ऐतिहासिक शिमला-कालका रेल लाइन भी पूंजीपतियों के कब्जे में चली जाएगी। इस रेल लाइन का न केवल ऐतिहासिक व पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्व है अपितु इस से हिमाचल के लोगो की भावनाएं भी जुड़ी हैं। इस से हिमाचल की जनता को सस्ती यातायात सुविधा तो मिलती ही है जोकि निजीकरण के बाद महंगी होना तय है बल्कि यह हिमाचल के विकास में अहम योगदान देती रही है। उन्होंने कहा है कि जनता इसका निजीकरण किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेगी।

उन्होंने बैंक कर्मचारियों की अभूतपूर्व हड़ताल पर जनता को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि सीटू 15-16 मार्च को बैंक,17 मार्च को जनरल इंश्योरेंस,18 मार्च को लाइफ इंश्योरेंस की हड़ताल व 24-26 मार्च को क्रमिक भूख हड़ताल का समर्थन करती है क्योंकि केंद्र की मोदी सरकार पूरी तरह पूँजीपतियों के साथ खड़ी हो गयी है व आर्थिक संसाधनों को आम जनता से छीनकर अमीरों के हवाले करने के रास्ते पर आगे बढ़ रही है। मजदूर विरोधी चार लेबर कोड,तीन कृषि कानून,कृषि का निगमीकरण,बिजली विधेयक 2020 व सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से ही किए जा रहे हैं।

सीटू ने मांग की है कि इन्हें तुरन्त वापिस लिया जाए। उन्होंने कहा कि हालिया बजट में बैंक,बीमा,रेलवे,एयरपोर्टों,बंदरगाहों,ट्रांसपोर्ट,गैस पाइप लाइन,बिजली,सरकारी कम्पनियों के गोदाम व खाली जमीन,सड़कों,स्टेडियम सहित ज़्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण करके बेचने का रास्ता खोल दिया गया है। ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस के नारे की आड़ में मजदूर विरोधी लेबर कोडों को अमलीजामा पहनाया गया है। इस से केवल पूंजीपतियों,उद्योगपतियों व कॉरपोरेट घरानों को फायदा होने वाला है। इस से 70 प्रतिशत उद्योग व 74 प्रतिशत मजदूर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जाएंगे।

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