Sukhu Govt Budget Analysis: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा पेश किया गया हालिया बजट (Himachal Budget 2026-27) हिमाचल प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने वाला साबित होने जा रहा है। इस बजट का सबसे गहरा और सकारात्मक असर प्रदेश के किसानों, बागवानों और पशुपालकों पर दिखने वाला है। सुक्खू सरकार ने न केवल खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का प्रयास किया है, बल्कि पारंपरिक खेती और पशुपालन को भी सीधा आर्थिक सहारा दिया है।
किसान आयोग से बढ़ेगी किसानों की ताकत
हिमाचल की करीब 70% आबादी सीधे तौर पर खेती और बागवानी से जुड़ी है। किसानों की लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करते हुए सरकार ने ‘राज्य किसान आयोग’ के गठन का बड़ा फैसला लिया है। यह आयोग एक ऐसे मंच के रूप में काम करेगा जहाँ किसान और बागवान सीधे अपनी समस्याएं और सुझाव विशेषज्ञों व सरकार तक पहुँचा सकेंगे। इससे न केवल सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर होगा, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए ठोस नीतियां भी बन सकेंगी।
प्राकृतिक खेती जोर और एमएसपी में ऐतिहासिक वृद्धि
सुक्खू सरकार ने प्राकृतिक खेती को सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि फायदे का सौदा बना दिया है। प्रदेश के करीब 2.23 लाख किसान जो प्राकृतिक खेती से जुड़े हैं, उन्हें अब अपनी उपज का बहुत शानदार दाम मिलेगा। बजट में प्राकृतिक खेती से उगाए गेहूं का समर्थन मूल्य (MSP) 60 से बढ़ाकर 80 रुपये, मक्का 40 से 50 रुपये और हल्दी का दाम 90 से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलो कर दिया गया है।
पहली बार अदरक को भी 30 रुपये किलो के एमएसपी के दायरे में लाया गया है। इसके अलावा, ‘बीज गांव योजना’ के जरिए पारंपरिक बीजों को सहेजने के लिए किसानों को प्रति बीघा 5,000 रुपये की सब्सिडी और समूहों को 2 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी। सरकार खेती को बेहतर बनाने के लिए फसल विविधीकरण योजना पर ₹203 करोड़ खर्च करने जा रही है।
इस बजट से खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए माइक्रो इरिगेशन (सूक्ष्म सिंचाई), फसल ले जाने के लिए खेत की सड़कें, फेंसिंग और किसानों को नई तकनीक सिखाने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएंगे। इसके साथ ही, आवारा पशुओं से फसलों को बचाने के लिए मुख्यमंत्री खेत बाड़बंदी योजना के तहत ₹10 करोड़ का अलग से प्रावधान किया गया है, ताकि किसान अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रख सकें।
पशुपालन कों मिलेगी मजबूती. दूध के दामों में बढ़ोतरी
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पशुपालन क्षेत्र को इस बजट से जबरदस्त मजबूती मिली है। सरकार ने गाय के दूध की खरीद दर 51 से बढ़ाकर 61 रुपये और भैंस के दूध की दर 61 से बढ़ाकर 71 रुपये प्रति लीटर कर दी है। इससे पशुपालकों के हाथ में सीधा पैसा आएगा। दूध के साथ-साथ प्राकृतिक खेती के लिए गोबर/खाद की बिक्री से किसानों को दोहरा लाभ मिलेगा। कांगड़ा के ढगवार में बन रहा आधुनिक मिल्क प्रोसेसिंग प्लांट और अन्य जिलों में नए चिलिंग सेंटर इस सेक्टर की तस्वीर बदल देंगे।
पिछले तीन सालों में सरकार ने दूध के दाम काफी बढ़ा दिए हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अब दूध की सरकारी खरीद भी पहले से दोगुनी हो गई है। जहाँ पहले साल भर में 4 करोड़ लीटर दूध इकट्ठा होता था, वहीं अब यह बढ़कर सालाना 8 करोड़ लीटर तक पहुँच गया है।
चरवाहों और डेयरी क्षेत्र के लिए नई योजनाएं
सरकार अब चरवाहों की बेहतरी के लिए कई बड़े कदम उठाने जा रही है। इसके तहत हर चरवाहे का अपना एक डिजिटल कार्ड बनाया जाएगा और उन्हें बीमा की सुरक्षा भी दी जाएगी। चराई के नियमों को आसान बनाने के लिए कर्नाटक की तर्ज पर एक नया कानून लाने की तैयारी है। ‘पीईएचईएल’ (PEHEL) नाम की योजना के लिए 300 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है, जिससे लगभग 40 हजार परिवारों को फायदा मिलेगा। इन परिवारों को न केवल डिजिटल कार्ड और बीमा मिलेगा, बल्कि अच्छे नस्ल के पशु भी उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि उनकी कमाई बढ़ सके।
डेयरी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए इस साल के आखिर तक गांवों में सहकारी समितियों की संख्या बढ़ाकर 2,000 की जाएगी, जिसमें महिलाओं की भागीदारी पर खास जोर रहेगा। दूध के काम को आधुनिक बनाने के लिए अमूल की तरह एक मोबाइल ऐप और दूध की जांच के लिए मशीनें दी जाएंगी। जो लोग इस क्षेत्र में अपना काम शुरू करना चाहते हैं, उन्हें गाड़ियों की खरीद पर 65% तक की सब्सिडी मिलेगी। ये गाड़ियां दूध इकट्ठा करने के साथ-साथ पशुओं के इलाज में भी मदद करेंगी।
पशुपालकों के फायदे के लिए सरकार अब दूध पर मिलने वाली अतिरिक्त राशि (इंसेंटिव) को 3 रुपये से बढ़ाकर 6 रुपये प्रति लीटर करने जा रही है। साथ ही, शुद्ध ए2 (A2) दूध की ब्रांडिंग की जाएगी ताकि उसे 100 रुपये प्रति लीटर तक के अच्छे दाम पर खरीदा जा सके। इसके अलावा, गायों की सेवा और संरक्षण के लिए अब बड़े व्यापारिक घरानों को भी गौशालाएं गोद लेने की अनुमति दी जाएगी।
बागवानी में नई तकनीक
हिमाचल की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ ‘बागवानी’ है। 1292 करोड़ रुपये की ‘एचपी शिवा परियोजना’ के तहत प्रदेश के 7 जिलों में संतरा, अमरूद, अनार और लीची जैसे फलों के 400 क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं। इससे 15 हजार किसान परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा। फल खराब न हों, इसके लिए नगरोटा, दधोल और नादौन में 5 करोड़ की लागत से आधुनिक ग्रेडिंग और पैकेजिंग केंद्र (Post Harvest Centers) बनाए जाएंगे। साथ ही, अब हिमाचल में किसान हाइड्रोपोनिक विधि (बिना मिट्टी की खेती) से सब्जियां उगाकर अपनी कमाई बढ़ा सकेंगे।













