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जिलों की आएगी बहार, कांगड़ा टूटने के आसार

जिलों की आएगी बहार, कांगड़ा टूटने के आसार

सियासत में अपने ऊंचे कद के लिए मशहूर जिला कांगड़ा के कद में कांट-छांट के आसार बन रहे हैं। अगर सब तय रणनीति के तहत चलता रहा तो कांगड़ा की जड़ों में सियासी जल जाने से नूरपुर और पालमपुर नाम के दो और जिले आकार ले लेंगे। यह सब तब होने जा रहा है, जब भाजपा के महासागर में कांगड़ा जिले के विघटन के धुर विरोधी रहे शांता कुमार उम्र के लिहाज से शांत पड़े हुए हैं और नूरपुर जिले के प्रबल समर्थक और नए जिलों के नारे के जनक राकेश पठानिया सत्ता के हिलोरे फुल स्विंग में ले रहे हैं। खबर के मुताबिक इस पर मंथन चला हुआ है कि छोटे-छोटे जिलों के मैदान में साल 2022 के लिए कोई बड़ा खेल खेला जाए। इसी कड़ी में नूरपुर और पालमपुर के नाम उभर कर सामने आ गए हैं। नूरपुर का नाम इसलिए भी अहम माना जा रहा है कि पूर्व में धूमल सरकार ने नूरपुर में करीबन चार महीनों के लिए एडीसी को बिठा दिया था। मगर शांता कुमार के तीखे विरोध के चलते यह व्यवस्था वहीं ध्वस्त होकर रह गई थी। नूरपुर के हल्ले की हवा बाद में पालमपुर तक भी पहुंची थी, पर शांता कुमार का घर होने की वजह से उनके आंगन में सियासी ‘झमाकड़ा’ करने की हिम्मत किसी की नहीं हो पाई थी।

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शांता कुमार अपनी लिखी किताबों के बदौलत बहुत हद तक ‘पॉलिटिकल पॉवर्टी लाइन’ के आस-पास घूम रहे हैं और उनके दबदबे के हालात भी बदले हुए हैं। भाजपा के वजूद के भी मौजूदा हालात ऐसे हैं कि भाजपा को पॉलिटिकल माइलेज के लिए जिलों का ईंधन जरूरी लग रहा है। भाजपा के लिए कांगड़ा में नए जिलों का मुद्दा अब प्रेसटीज इश्यू भी बन गया है।
पठानिया पर भी यह इल्जाम आम हो गया है कि वह नूरपुर का हल्ला तो बोलते हैं पर जमीन पर इसकी पैदाइश के लिए कोई हल नहीं जोतते। पर अब ताजा खबरें यह इशारा कर रहीं हैं कि जिलों के ड्रामे को भाजपा अब हकीकत की जमीन पर लाने की पुख्ता कवायदों में गंभीर हो गई है। खबर यह भी है कि अगले वित्तीय वर्ष में जिलों के लिए हरी झंडी फरफरा सकती है।

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अब कोई विरोधी गुट नहीं
इस बार नए जिलों के गठन पर भाजपा को भी कोई परेशानी नहीं है। नहीं तो एक दौर ऐसा भी था जब शांता कुमार के अनन्य भक्त रहे मौजूदा सांसद किशन कपूर ने नूरपुर के तत्कालीन विधायक और मौजूदा वन मंत्री राकेश पठानिया को धर्मशाला में पांव न धरने की चुनौती दे डाली थी और पठानिया पूरी फौज के साथ टकराने के लिए धर्मशाला धमक गए थे। हालात तनावपूर्ण हुए थे, मगर काबू में रहे थे।

कांगड़ा माइनस होगा तो सियासत में प्लस
अभी हाल-फिलहाल सियासत की रिवायत के मुताबिक सत्ता की सीढ़ी माने जाने वाला कांगड़ा जिला में जिस तरह का सियासी माहौल है, उसको लेकर माहिर भी यह मान रहे हैं कि अगर कांगड़ा में जनता की उम्मीद पर भाजपा खरा उतरती है तो सत्ता के पायदान भी मजबूत हो सकते हैं। हालांकि देहरा को जिला बनाने का हल्ला भी बराबर पड़ता रहा है, मगर ताजा संभावित जिलों की लिस्ट में देहरा के खाते में फिर से बासीपन ही आया है। फिलवक्त फिर वही नारा नजर आ रहा है, जिसमें यह कहा जाता रहा है कि, “देहरा कोई नहीं तेरा।” जाहिर सी बात है कि साल 2022 में सत्ता में प्लस बने रहने के लिए कांगड़ा अगर पॉलिटिकल आकार में माइनस भी हो जाए तो बड़ी बात नहीं होगी।

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पालमपुर में भी नहीं कोई अड़चन
शांता कुमार के मौजूदा सियासी वजन के लिहाज से पालमपुर के भी भारी पडऩे के आसार गहरा गए हैं। जाहिर सी बात है कि आज तक दौर में पालमपुर के पास अपना ब्लॉक तक नहीं है। जबकि जिस तरह से शांता कुमार का एक दौर में रसूख रहा है, उससे पालमपुर को बड़ी पहले भारी पड़ना चाहिए था। अब शांता शांत हैं तो पालमपुर गरमाने शुरू हो गया है। स्थानीय विधायक आशीष बुटेल भी जिले की जंग का परचम उठा कर आगे बढ़ चुके हैं।
-खबर इनपुट दरअसल

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