ADHD Causes In Kids: हर माता-पिता की यह आकांक्षा होती है कि उनका बच्चा पढ़ाई में अव्वल रहे, अनुशासित हो और उनकी बातों को समझे। हालांकि, कई बार बच्चे अपनी ऊर्जा के कारण अत्यधिक शरारती प्रतीत होते हैं और अक्सर स्कूल से भी उनकी शिकायतें आती हैं। इसे केवल स्वभाव मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है, क्योंकि यह स्थिति ADHD का संकेत हो सकती है।
पीएचडी स्कॉलर शिल्पी शर्मा बताती हैं कि ADHD कोई बीमारी नहीं, बल्कि मस्तिष्क के कार्य करने का एक भिन्न तरीका है। आज के समय में अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को लेकर चिंतित रहते हैं, खासकर तब जब बच्चा पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा पाता, एक जगह टिककर नहीं बैठता या बार-बार शिकायतें स्कूल से आने लगती हैं। अक्सर ऐसे व्यवहार को ‘सामान्य बचपना’ समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन यह Attention Deficit Hyperactivity Disorder (ADHD) का संकेत भी हो सकता है।
शोधार्थी शिल्पी शर्मा के अनुसार ADHD कोई साधारण शरारत नहीं, बल्कि दिमाग के काम करने का एक अलग तरीका है, जिसमें बच्चे का ध्यान, व्यवहार और ऊर्जा स्तर सामान्य से अलग होता है। सही समय पर पहचान और मार्गदर्शन से ऐसे बच्चों की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दी जा सकती है।
कैसे पहचानें, सामान्य शरारत या ADHD?
ADHD की स्थिति को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।
- पहली श्रेणी ‘इनअटेंशन’ (ध्यान न दे पाना) है, जिसमें बच्चा किसी काम को पूरा नहीं कर पाता, जल्दी बोर हो जाता है या छोटी-छोटी बातों पर उसका ध्यान भटक जाता है।
- दूसरी श्रेणी ‘हाइपरएक्टिविटी’ (अत्यधिक सक्रियता) है, जहाँ बच्चा बिना थके घंटों भागता-दौड़ता रहता है और एक स्थान पर शांत नहीं बैठ पाता, मानो उसके अंदर कोई मोटर लगी हो।
- तीसरी और महत्वपूर्ण श्रेणी ‘इम्पल्सिविटी’ (आवेगशीलता) है। इसमें बच्चा बिना सोचे-समझे कार्य करता है, बातचीत के बीच में दूसरों की बात काट देता है या अपनी बारी आने का धैर्यपूर्वक इंतजार नहीं कर पाता। इन लक्षणों की पहचान समय रहते कर लेना आवश्यक है ताकि बच्चे को सही मार्गदर्शन मिल सके।
माता-पिता के लिए प्रभावी प्रबंधन और टिप्स
शोधार्थी शिल्पी शर्मा के अनुसार ADHD प्रभावित बच्चों के लिए दिनचर्या में स्थिरता सबसे महत्वपूर्ण है। माता-पिता को बच्चे के उठने, खाने, पढ़ने और खेलने का एक निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए। अनिश्चितता ऐसे बच्चों में बेचैनी पैदा करती है, जबकि एक तय रूटीन उन्हें सुरक्षित महसूस कराता है। जब बच्चे को ज्ञात होता है कि आगे क्या होने वाला है, तो उनकी घबराहट में कमी आती है।
निर्देश देते समय स्पष्टता रखें। यदि आप बच्चे से जटिल काम एक साथ कहेंगे, तो वह उलझ जाएगा। इसके बजाय, निर्देशों को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित करें। उदाहरण के तौर पर, “अपना कमरा साफ करो” कहने के बजाय, पहले “खिलौने उठाओ” कहें। जब वह एक काम पूरा कर ले, तभी उसे अगला निर्देश दें।
सकारात्मक सुदृढ़ीकरण (Positive Reinforcement) का जादू भी काम करता है। ऐसे बच्चे अक्सर डांट के कारण कम आत्मविश्वास महसूस करते हैं। जब भी वे कोई छोटा कार्य भी सही ढंग से करें, तो उनकी प्रशंसा करें। यह उन्हें यह महसूस करने में मदद करेगा कि वे भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं।
जीवनशैली में बदलाव के सुझाव
ऐसे मामलों में स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है। मोबाइल और टेलीविजन की स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी मस्तिष्क को अधिक उत्तेजित (Hyper) कर देती है। इसकी जगह उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। तैराकी या साइकिलिंग जैसी गतिविधियां उनकी अतिरिक्त ऊर्जा को सही दिशा में खर्च करने में मदद करती हैं।
आहार में परिवर्तन भी स्थिति में सुधार ला सकता है। शिल्पी कहती है कि शोध बताते हैं कि अत्यधिक चीनी और पैकेट बंद जंक फूड बच्चों की हाइपरएक्टिविटी को बढ़ा सकते हैं। उनके दैनिक भोजन में प्रोटीन, फल और हरी सब्जियों की मात्रा बढ़ाना अधिक लाभकारी होता है।
अंत में, यह समझना आवश्यक है कि आपका बच्चा ‘कमजोर’ नहीं, बल्कि ‘खास’ है। इतिहास गवाह है कि थॉमस एडिसन और अल्बर्ट आइंस्टीन जैसी महान विभूतियों में भी ADHD के लक्षण थे। आपका बच्चा दुनिया को एक अलग दृष्टिकोण से देखता है। उसे आपकी डांट की नहीं, बल्कि आपके साथ और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।
















