Justice Yashwant Varma: इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे गंभीर नकदी आरोपों की जांच अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस पूरे मामले की जांच कर रही जजेज इंक्वायरी कमेटी ने सोमवार (18 मई) को अपनी विस्तृत रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी है। पूर्व न्यायाधीश के सरकारी आवास से भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी मिलने के बाद यह उच्च स्तरीय जांच शुरू की गई थी। अब इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों के समक्ष विचार और चर्चा के लिए रखा जाएगा।
अधिकारियों से मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, यह रिपोर्ट जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही सौंपी गई है। लोकसभा अध्यक्ष को रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद अब इसे संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखने की तैयारी की जा रही है। राजनीतिक और कानूनी गलियारों में यह माना जा रहा है कि संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान इस बेहद संवेदनशील रिपोर्ट पर दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा हो सकती है।
उल्लेखनीय है कि इस पूरे विवाद की शुरुआत पिछले साल मार्च महीने में हुई थी। 14 मार्च 2025 की रात को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में अचानक आग लग गई थी। इस दुर्घटना के दौरान जब दमकलकर्मी आग बुझाने के लिए बंगले के अंदर दाखिल हुए, तो उन्हें वहां के एक स्टोर रूम में भारी मात्रा में अधजली और बेहिसाब नकदी बरामद हुई थी। इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद न्यायपालिका के साथ-साथ देश के राजनीतिक हलकों में भी हड़कंप मच गया था।
इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा एक इन-हाउस कमेटी का गठन किया गया था, जिसने मामले की प्रारंभिक जांच की। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा था कि जिस स्टोर रूम से भारी मात्रा में नकदी मिली थी, उस पर सीधे तौर पर जस्टिस वर्मा का प्रत्यक्ष या मौन नियंत्रण था। इस खुलासे के बाद जुलाई 2025 में संसद के 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए हस्ताक्षर किए थे।
सांसदों के इस कदम के बाद, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त, 2025 को तीन सदस्यीय औपचारिक जांच समिति का गठन किया था। इस विशेष समिति का मुख्य कार्य जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे गंभीर वित्तीय आरोपों की गहराई से जांच करना और अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करना था। समिति ने अपनी विस्तृत और लंबी जांच प्रक्रिया को पूरा करने के बाद अब अपनी रिपोर्ट स्पीकर को सौंप दी है।
इस बीच, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की प्रबल संभावना को देखते हुए जस्टिस वर्मा ने हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से अपना इस्तीफा दे दिया। उनके इस कदम के बाद तकनीकी रूप से उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की कार्यवाही निष्फल हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के अनुसार, कोई भी न्यायाधीश राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंपने और उसकी प्रति सार्वजनिक करने के बाद स्वतः ही पद छोड़ चुका माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति की तत्काल स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता है, बल्कि इसके बाद केवल एक औपचारिक अधिसूचना जारी की जाती है। तय प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति इस पर अपनी औपचारिक स्वीकृति देते हैं, जिसके बाद विधि मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा इसकी आधिकारिक सूचना जारी की जाती है। इसी कानूनी आधार पर विशेषज्ञों का मानना है कि इस्तीफे के बाद अब जस्टिस वर्मा एक निजी नागरिक माने जाएंगे और भारतीय संसद किसी पूर्व न्यायाधीश को उसके पद से नहीं हटा सकती।
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि जस्टिस वर्मा के अचानक दिए गए इस्तीफे का जांच समिति के काम पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा, क्योंकि यह जांच उस समय शुरू हो चुकी थी जब वह अपने पद पर कार्यरत थे। समिति ने अपनी जिम्मेदारी को पूरा करते हुए रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी है। अब इसे संसद के दोनों सदनों में नियमानुसार पेश किया जाएगा और इसके बाद ही स्पष्ट होगा कि इस रिपोर्ट पर संसद का क्या रुख रहता है।

















