Ayushman Bharat News: देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत मरीजों को मुफ्त इलाज तो मिल रहा है, लेकिन भुगतान में देरी के कारण पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआई) को करोड़ों रुपये का इंतजार करना पड़ रहा है। हाल ही में सामने आई ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, पीजीआई चंडीगढ़ के करोड़ों रुपये भुगतान में लगातार देरी और क्लेम खारिज होने की वजह से फंसे हुए हैं। इस स्थिति ने अस्पताल प्रबंधन के सामने गंभीर वित्तीय चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ऑडिट रिपोर्ट में साफ तौर पर सामने आया है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत पीजीआई द्वारा मरीजों के इलाज के बाद भेजे गए क्लेम का भुगतान तय समय सीमा के भीतर नहीं किया गया। नियमों के मुताबिक, पीजीआई और नेशनल हेल्थ एजेंसी के बीच हुए समझौते के अनुसार क्लेम राशि 30 दिनों के भीतर जारी होनी चाहिए थी। इसके विपरीत, वास्तविक स्थिति यह रही कि कई मामलों में भुगतान की यह प्रक्रिया महीनों तक अटकी रही और पूरी तरह से लंबित रही। इससे संस्थान पर आर्थिक दबाव बढ़ा और करोड़ों रुपये लंबे समय तक फंसे रहे, जिससे इलाज से जुड़ी वित्तीय प्रक्रिया काफी प्रभावित हुई।
इस पूरे मामले में समय पर क्लेम फाइल नहीं होने की एक बड़ी समस्या भी उजागर हुई है। पीजीआई प्रशासन के मुताबिक, आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज कराने वाले कई मरीज अस्पताल से छुट्टी मिलने (डिस्चार्ज) के बाद सीधे वार्ड से अपने घर चले गए और अस्पताल में निर्धारित आयुष्मान काउंटर तक नहीं पहुंचे। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि डिस्चार्ज प्रक्रिया के दौरान इन मरीजों का अंतिम सत्यापन और जरूरी दस्तावेज अपडेट नहीं हो पाए।
मरीजों के सीधे घर चले जाने के चलते उनके उपचार से जुड़े रिकॉर्ड बाद में अलग-अलग विभागों से जुटाने पड़े, जिससे क्लेम दाखिल करने की प्रक्रिया में काफी देरी हुई। कई मामलों में तय समय सीमा के भीतर दस्तावेज पूरे नहीं हो सके और क्लेम अधूरी प्रक्रिया के कारण लंबित रह गए। कुछ दावे तो संबंधित स्टेट हेल्थ एजेंसियों द्वारा तकनीकी और दस्तावेजी कमियों के कारण पूरी तरह खारिज भी कर दिए गए।
आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक लंबित 4579 क्लेम में से पंजाब और जम्मू-कश्मीर की स्टेट हेल्थ एजेंसियों ने 16.59 करोड़ रुपये के कुल 2973 क्लेम खारिज कर दिए। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकांश क्लेम दस्तावेजों में कमी, सत्यापन में देरी और निर्धारित प्रक्रिया पूरी न होने के कारण रिजेक्ट हुए। इससे पीजीआई को भारी नुकसान उठाना पड़ा और करोड़ों रुपये के भुगतान का इंतजार करना पड़ा। हालांकि, संस्थान का कहना है कि कई दावे अभी भी संबंधित एजेंसियों के पास पुनर्विचार के लिए लंबित हैं।
ऑडिट में यह भी सामने आया कि पहले की व्यवस्था में मरीजों के डिस्चार्ज के समय रियल टाइम सत्यापन की व्यवस्था मजबूत नहीं थी। कई मामलों में लाभार्थियों का अंतिम बायोमेट्रिक सत्यापन नहीं हो पाया और जरूरी दस्तावेज तुरंत ऑनलाइन अपलोड नहीं किए गए, जिससे बाद में रिकॉर्ड मिलान और क्लेम सत्यापन में गंभीर परेशानी आई। इसी कमी को दूर करने के लिए अब पीजीआई प्रशासन ने संस्थान में ‘टीएमएस 2.0’ (TMS 2.0) सिस्टम को पूरी तरह लागू कर दिया है।
इस नई व्यवस्था के तहत आयुष्मान योजना के लाभार्थियों का अस्पताल से डिस्चार्ज होने के समय बायोमेट्रिक सत्यापन पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है। मरीज के अस्पताल से छुट्टी लेने से पहले उसकी पहचान, उपचार का रिकॉर्ड और योजना से संबंधित सभी दस्तावेज ऑनलाइन सिस्टम में तुरंत अपडेट किए जाएंगे। इससे क्लेम तुरंत जनरेट होंगे और समय पर दाखिल किए जा सकेंगे, जिससे दस्तावेजी त्रुटियों की संभावना काफी हद तक खत्म हो जाएगी। फिलहाल पंजाब और जम्मू-कश्मीर के समक्ष लंबित क्लेम संबंधित स्टेट हेल्थ एजेंसियों के विचाराधीन हैं, लेकिन अंतिम भुगतान अभी बाकी है।
आयुष्मान भारत योजना के अलावा, पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत भी पीजीआई का करोड़ों रुपये का फंड फंसा हुआ है। हिमाचल सरकार की ‘हिमकेयर’ (Himcare) योजना के तहत पीजीआई का करीब 4.02 करोड़ रुपये का भुगतान लंबे समय से लंबित है। यह बकाया राशि कुल 657 मरीजों के इलाज से जुड़ी है, जिसका भुगतान तय समय सीमा बीतने के बावजूद नहीं किया गया।
पीजीआई और हिमाचल सरकार के बीच फरवरी 2024 में एक समझौता हुआ था, जिसके तहत हिमकेयर कार्ड धारक मरीजों को अस्पताल में कैशलेस इलाज दिया जाना था और दावा राशि 30 दिनों के भीतर जारी की जानी थी। वित्तीय वर्ष 2024-25 में पीजीआई ने इस योजना के तहत कुल 34.65 करोड़ रुपये के दावे भेजे थे, जिनमें से संस्थान को केवल 27.42 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं और बाकी की बड़ी राशि अभी भी सरकार के पास लंबित पड़ी है।

















