Ram Temple Theft Case: अयोध्या के राम मंदिर का प्रबंधन संभालने वाला ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ केंद्र या उत्तर प्रदेश सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के एक महत्वपूर्ण आदेश के अनुसार, इस मंदिर ट्रस्ट का पूरा कामकाज सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के दायरे से बाहर रहेगा।
गृह मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि ट्रस्ट के सभी नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय पूरी तरह से अंदरूनी तौर पर लिए जाते हैं। इस मामले की शुरुआत तब हुई जब RTI कार्यकर्ता नीरज शर्मा ने वर्ष 2024 की शुरुआत में केंद्र सरकार के समक्ष एक आवेदन दायर किया था।

इस आवेदन के माध्यम से उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट के पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर्स के नाम मांगे थे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह ट्रस्ट RTI एक्ट के तहत एक ‘पब्लिक अथॉरिटी’ है या नहीं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय ने शुरुआत में इस अपील को खारिज कर दिया था। मंत्रालय द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद नीरज शर्मा ने फरवरी 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन को निर्देश दिया कि वह इस संबंध में गृह मंत्रालय से जवाब मांगे।
कोर्ट ने आयोग को पूरी जांच के बाद यह तय करने की जिम्मेदारी सौंपी थी कि राम मंदिर ट्रस्ट एक ‘पब्लिक अथॉरिटी’ है या फिर एक पूर्णतः ऑटोनॉमस बॉडी के रूप में कार्य करता है। दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश के बाद गृह मंत्रालय ने 20 फरवरी को केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष अपना आधिकारिक जवाब दाखिल किया।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट सरकार के प्रति किसी भी रूप में जवाबदेह नहीं है। इस जवाब की समीक्षा करने के बाद CIC ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि मंदिर ट्रस्ट को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के तहत गठित किया गया था। इस संस्था को राज्य या केंद्र सरकार से कोई आर्थिक मदद या प्रशासनिक नियंत्रण प्राप्त नहीं होता है। चूंकि यह ‘पब्लिक अथॉरिटी’ की परिभाषा में नहीं आता, इसलिए इसे RTI के दायरे से बाहर रखा गया है।
दूसरी ओर, राम मंदिर ट्रस्ट के आंतरिक ढांचे और इसके संचालन को लेकर आगामी 6 जुलाई को एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है। इस बैठक में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे पर अंतिम फैसला लिया जाना है। दोनों पदाधिकारियों ने हाल ही में सामने आए ‘दान चोरी विवाद’ के बीच नैतिक आधार पर अपने पदों से इस्तीफा देने की पेशकश की है। ट्रस्ट के भीतर इस समय समीकरण काफी जटिल बने हुए हैं।
ट्रस्ट के कुल 15 सदस्यों में से चार सदस्य सरकारी प्रतिनिधि हैं, जिनके पास नीतिगत और आंतरिक फैसलों में वोटिंग का अधिकार नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, एक सदस्य का आकस्मिक निधन हो चुका है। तकनीकी रूप से चंपत राय और अनिल मिश्रा अभी भी ट्रस्टी हैं और उन्हें इस बैठक में शामिल होने का पूरा अधिकार है।
ऐसी स्थिति में, बचे हुए 10 मतदान योग्य सदस्यों में से किसी भी प्रस्ताव को पारित करने के लिए बहुमत के रूप में कम से कम 6 वोटों की आवश्यकता होगी। तकनीकी और रणनीतिक रूप से यह स्पष्ट है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा अपने स्वयं के खिलाफ मतदान नहीं करेंगे, जिससे प्रभावी वोटों की संख्या 10 से घटकर 8 रह जाएगी।
अब दोनों को पदों से हटाने के लिए शेष 8 सदस्यों में से कम से कम 6 सदस्यों का एक साथ एकजुट होना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता है, तो उनके इस्तीफे को स्वीकार करने या उन्हें हटाने का प्रस्ताव गिर जाएगा। चूंकि ट्रस्ट पूरी तरह एक स्वतंत्र और स्व-शासित संस्था है, इसलिए देश की किसी भी बाहरी कानूनी संस्था के पास इसके पदाधिकारियों को हटाने का अधिकार नहीं है।
















