Kangra News Today: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शाहपुर से मानवीय रिश्तों और संवेदनशीलता की एक ऐसी अनूठी मिसाल सामने आई है, जिसने रूढ़िवादी समाज के सामने एक बड़ा उदाहरण पेश किया है। यहां के चंमडेरा गांव में एक सास-ससुर ने अपनी विधवा बहू को केवल सहारा ही नहीं दिया, बल्कि उसे बेटी का दर्जा देते हुए उसका कन्यादान कर नए जीवन की शुरुआत कराई है। इस भावुक और प्रेरणादायक कदम की पूरे क्षेत्र में जमकर सराहना की जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत करीब डेढ़ साल पहले हुई थी, जब रंजना के पति राजिंद्र कुमार की एक सड़क हादसे में असमय और दुखद मृत्यु हो गई थी। पति के निधन के बाद रंजना के जीवन में पूरी तरह अंधेरा छा गया था और उसका भविष्य दांव पर लग गया था। ऐसी विकट परिस्थिति में रंजना के ससुर ईश्वर दास और सास विमला देवी ने रूढ़िवादी परंपराओं के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी बहू के हक में खड़े होने का फैसला किया।

सास-ससुर ने दुख की इस घड़ी में रंजना को अकेला छोड़ने के बजाय उसे अपनी सगी बेटी की तरह पाला और उसके भविष्य को सुरक्षित करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने समाज की पुरानी सोच और दकियानूसी परंपराओं की बेड़ियों को तोड़ते हुए अपनी बहू का पुनर्विवाह कराने का एक बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय लिया। ईश्वर दास और विमला देवी ने सामाजिक मान्यताओं से ऊपर उठकर इस पुनर्विवाह की सभी आवश्यक व्यवस्थाएं खुद पूरी कीं।
दो दिन पहले एक स्थानीय मंदिर में रंजना का विवाह पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। इस विवाह की सबसे खास बात यह रही कि ससुर ईश्वर दास और सास विमला देवी ने खुद माता-पिता का फर्ज निभाते हुए रंजना का कन्यादान किया। इस पुनीत कार्य में परिवार के अन्य सदस्यों ने भी अपनी पूरी जिम्मेदारी निभाई और बदलते समय के साथ पारिवारिक रिश्तों को एक नई और सम्मानजनक परिभाषा दी।
इस विवाह में रंजना के देवरों, इंद्र कुमार और सुरेंद्र पाल ने भी समाज के सामने एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी भाभी के विवाह में भाइयों का दायित्व बखूबी निभाया। दोनों देवरों ने न केवल शादी की सभी व्यवस्थाओं की कमान अपने हाथों में संभाली, बल्कि अपनी भाभी को नए वैवाहिक जीवन की सुखद शुरुआत के लिए आवश्यक घरेलू सामान भी उपहार स्वरूप भेंट किया।
जब विवाह की रस्में पूरी होने के बाद रंजना को डोली में बिठाकर विदा किया गया, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। चंमडेरा गांव के इस परिवार ने देश और समाज को यह संदेश दिया है कि रिश्ते केवल खून के नहीं होते, बल्कि वे अपनत्व, सम्मान, जिम्मेदारी और आपसी विश्वास से निभाए जाते हैं। यह घटना उन लोगों के लिए एक बड़ी सीख है जो आज भी रूढ़िवादिता में जकड़े हुए हैं।


















