Prajasatta Side Scroll Menu
Bahra University - Shimla Hills

पटना हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यौन अपराधों पर न्यायिक संवेदनशीलता के लिए बड़ा निर्देश जारी

Judicial Sensitivity on Sexual Offences Handbook: पटना हाईकोर्ट द्वारा एक फैसले में 'सलवार उतारना और छाती दबाना' बलात्कार का प्रयास न मानने पर SC ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है और सभी अदालतों को विशेष हैंडबुक का पालन करने का आदेश दिया है।
Supreme Court on Patna High Court judgment: पटना हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यौन अपराधों पर न्यायिक संवेदनशीलता के लिए बड़ा निर्देश जारी

Supreme Court on Patna High Court judgment: देश की शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर एक बेहद गंभीर रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस हालिया आदेश पर गहरी नाराजगी जताई है, जिसमें अदालत ने टिप्पणी की थी कि ‘सलवार उतारना और छाती दबाना’ बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अब एक बड़ा निर्देश जारी किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि यौन अपराध के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर तैयार की गई राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति की रिपोर्ट को तुरंत सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी उच्च न्यायालयों की आधिकारिक वेबसाइटों पर अपलोड किया जाए। यह कदम निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों तक के जजों को ऐसे संवेदनशील मामलों में सही दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

दरअसल यह पूरा मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च, 2025 के एक पुराने आदेश से उपजे स्वतः संज्ञान मामले से जुड़ा है। उस समय इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपनी एक टिप्पणी में कहा था कि किसी लड़की के पजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना रेप की कोशिश के दायरे में नहीं आएगा। इसी मामले के बाद जजों को संवेदनशील बनाने की दिशा में एक रिपोर्ट और हैंडबुक तैयार की गई थी।

शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि ऐसी न्यायिक टिप्पणियां समय-समय पर सामने आती रही हैं। उन्होंने कोर्ट के सामने 9 जुलाई को आए पटना हाई कोर्ट के आदेश का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिसमें महिला की सलवार उतारने और उसकी छाती दबाने की घटना को बलात्कार का प्रयास मानने से इनकार कर दिया गया था।

इसे भी पढ़ें:  सावधान! होटल के बिल में लगा है LPG या Fuel Charge? तुरंत करें ये काम, सरकार ने दी सख्त चेतावनी

इस दलील पर जस्टिस वी. मोहना ने सवाल उठाया कि क्या पटना हाईकोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए पिछले फैसले का संदर्भ लिया था, जिसमें जजों को संवेदनशील बनाने के कड़े निर्देश थे। इसके साथ ही, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पटना हाई कोर्ट के आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जजों की भी यह पूरी जिम्मेदारी बनती है कि वे किसी फैसले पर पहुंचने से पहले कुछ कानूनी रिसर्च करें। उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, “स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है।”

सुप्रीम कोर्ट ने अब साफ कर दिया है कि सभी अदालतें इस विषय पर बनाई गई हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का अनिवार्य रूप से पालन करें। इसके साथ ही राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे सभी पुलिस स्टेशनों को निर्देश जारी करें ताकि एफआईआर दर्ज करते समय और चार्जशीट दाखिल करते समय हैंडबुक के नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके। कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में एक विस्तृत और तर्कपूर्ण फैसला भी जल्द ही अपलोड करेगा।

इसे भी पढ़ें:  FASTag Big Update: फास्टैग में 1 फरवरी से लागू होंगे बड़े बदलाव, KYV खत्म करने समेत ये होंगे नए नियम,,!

क्या था पटना हाईकोर्ट का पूरा फैसला?
उल्खलेनीय है कि पटना हाई कोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने इस मामले में सुनवाई करते हुए एक व्यक्ति की सजा को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति महिला की सलवार उतारता है और उसकी छाती दबाता है, तो इन हरकतों को केवल महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध माना जाएगा, न कि बलात्कार की कोशिश। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार के प्रयास की गंभीर धारा से राहत दे दी थी।

बता दें कि यह पूरा विवाद साल 2008 की एक घटना से जुड़ा हुआ है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक महिला अपने पिता के साथ बिहार के अमरपुर में स्थित एक फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी। फोटो खींचने के बाद स्टूडियो के मालिक ने उसके पिता को बाहर इंतजार करने को कहा, क्योंकि उसे कंप्यूटर पर फोटो दिखानी थी। इसके बाद आरोपी ने स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और महिला के साथ यौन उत्पीड़न का प्रयास किया।

इसे भी पढ़ें:  Congress Income Tax Notice Case Update: इनकम टैक्स मामले में कांग्रेस को बड़ी राहत

महिला की चीख सुनकर जब उसके पिता दरवाजे की तरफ दौड़े, तो आरोपी मौका देखकर वहां से भाग निकला। इस घटना की एफआईआर दर्ज होने और पुलिस जांच के बाद निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की, बलात्कार की कोशिश और गलत तरीके से बंधक बनाने की धाराओं के तहत दोषी करार दिया था। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

पटना हाईकोर्ट ने जब सबूतों पर दोबारा विचार किया, तो पाया कि रिकॉर्ड में कोई मेडिकल सबूत मौजूद नहीं था। इसके अलावा, ट्रायल के दौरान मामले के जांच अधिकारी से भी पूछताछ नहीं की गई थी। पूरा मामला केवल पीड़िता और उसके माता-पिता के बयानों पर आधारित था। इन कमियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष बलात्कार के प्रयास का आरोप साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि अभियोजन पक्ष के आरोपों को पूरी तरह सच मान भी लिया जाए, तो भी यह मामला आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाने का बनता है। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने पीड़िता को स्टूडियो में बंद करके, दरवाजा बंद करके और उसकी सलवार उतारने की कोशिश व छाती दबाकर आपराधिक बल का प्रयोग किया, जिससे महिला की मर्यादा को ठेस पहुंची।

Indian Penal CodeJudicial Sensitivity HandbookPatna High CourtSupreme CourtWomen Safety Laws India

Join WhatsApp

Join Now