Himachal News Today: सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में सरकारी भूमि पर दशकों पुराने अवैध कब्जों को हटाने के संबंध में राज्य के हाई कोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने इस पूरे मामले में फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह राहत भरा आदेश हिमाचल प्रदेश राज्य सरकार द्वारा पूनम गुप्ता मामले में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की गई विशेष अनुमति याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के बाद आया है।
हाई कोर्ट ने अवैध कब्जे नियमित करने की नीति को किया था रद
उल्लेखनीय है कि इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक सख्त फैसला सुनाते हुए सरकारी भूमि पर किए गए अवैध कब्जों को नियमित करने से जुड़ी राज्य सरकार की नीति को पूरी तरह से रद कर दिया था। मुख्य अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वह सरकारी भूमि पर हुए सभी अतिक्रमणों को कानून सम्मत तरीके से हटाना सुनिश्चित करे। हाई कोर्ट ने प्रशासन को आदेश दिया था कि सभी अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध उचित कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए और इस पूरी प्रक्रिया को हर हाल में 28 फरवरी, 2026 तक तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।

पूनम गुप्ता की जनहित याचिका पर आया था आदेश
बता दें कि हाई कोर्ट की खंडपीठ ने यह कड़ा रुख पूनम गुप्ता द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका (पीआईएल) को स्वीकार करते हुए अपनाया था। अपने विस्तृत फैसले में हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि सुशासन का असली मतलब अतिक्रमण से निपटने वाले मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करना है। कोर्ट ने कहा था कि अवैध कार्यों को वैध बनाने के उद्देश्य से लाई जाने वाली नीतियां समाज में बेईमानी और कानून के उल्लंघन की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं।
संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना था
अदालत ने अतिक्रमणकारियों को राहत देने वाली सरकारी नीति को मनमाना घोषित किया था। फैसले में कहा गया था कि ईमानदार नागरिकों और कानून तोड़ने वाले असमान लोगों के साथ एक जैसा समान व्यवहार करके राज्य सरकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन कर रही है। कानून का उल्लंघन करने वालों को इस तरह से माफ करना किसी भी तरह तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
भूमि राजस्व अधिनियम की धारा 163-ए को बताया था असंवैधानिक
हाई कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश भूमि राजस्व अधिनियम की धारा 163-ए को पूरी तरह से मनमाना और असंवैधानिक करार देते हुए इस धारा और इसके तहत बनाए गए सभी नियमों को रद कर दिया था। इस विवादित धारा के माध्यम से राज्य सरकार ने अतिक्रमणों को नियमित करने की विशेष शक्तियां अपने हाथों में ले ली थीं, जबकि राज्य के मूल कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। इसके साथ ही, कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया था कि वह उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा की तर्ज पर “आपराधिक अतिक्रमण” से संबंधित कड़े कानून बनाने पर विचार करे।
1.67 लाख आवेदनों पर टिकी थीं नजरें
हिमाचल प्रदेश में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे का मामला बेहद बड़ा और संवेदनशील है। साल 2002 में राज्य सरकार द्वारा जारी नियमितीकरण नीति के तहत अवैध कब्जाधारकों से नियमितीकरण के लिए आवेदन मांगे गए थे। इस नीति के तहत सरकार के पास कुल 1,67,339 आवेदन पहुंचे थे, जिनमें लगभग 24,198 एकड़ सरकारी भूमि पर किए गए अवैध कब्जों को नियमित करने की मांग की गई थी।
इसके बाद वर्ष 2017 में भी सरकार ने 5 बीघा तक की सरकारी भूमि पर किए गए अतिक्रमणों को नियमित करने के लिए ड्राफ्ट नियम राजपत्र में प्रकाशित किए थे। हालांकि, बाद में इन ड्राफ्ट नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं की अदालती सुनवाई के दौरान सरकार ने स्पष्ट किया था कि फिलहाल उसके समक्ष ऐसे अवैध कब्जों को नियमित करने का कोई सक्रिय प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद प्रभावितों को बड़ी राहत मिली है।


















