Himachal News Today: हिमाचल प्रदेश रोड सेफ्टी फंड एंड एक्टिविटीज रूल्स, 2022 के प्रावधानों का पिछले कई वर्षों से पुलिस महानिदेशक, हिमाचल प्रदेश के कार्यालय द्वारा कथित रूप से समुचित पालन नहीं करवाया गया और इन नियमों की मूल भावना से समझौता किया गया। पिछले कुछ वर्षों के दौरान रोड सेफ्टी फंड के अंतर्गत लगभग 30 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई। लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण मूल अभिलेख, जैसे कैश बुक तथा फंड एलोकेशन रजिस्टर, तक उचित रूप से संधारित नहीं किए गए।
विभिन्न मदों में एक्सपेंडिचर सैंक्शंस तथा एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रूवल प्रदान किए गए, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के अनुसार इन स्वीकृतियों के अनुरूप तथा निर्धारित नियमों के अनुसार धनराशि का व्यय नहीं किया गया। इससे न केवल वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं, बल्कि हिमाचल प्रदेश रोड सेफ्टी फंड एंड एक्टिविटीज रूल्स, 2022 के अक्षरशः तथा मूल भावना के अनुरूप पालन न करने से अत्यंत गंभीर संदेह उत्पन्न होता है कि भ्रष्टाचार को दबाने के लिए यह सब किया गया ।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक डीआईजी टीटीआर के पद पर कार्यभार ग्रहण करने के पश्चात संजीव गांधी ने रोड सेफ्टी फंड से किए गए व्ययों में अनेक अनियमितताओं का पता लगाया। प्राप्त जानकारी के अनुसार, उन्होंने इन खरीद तथा व्ययों में हुई कथित अनियमितताओं और हेराफेरी के संबंध में अनेक रिपोर्टें सरकार को भी प्रेषित कीं। इन रिपोर्टों में यह तथ्य सामने लाया गया कि रोड सेफ्टी फंड से संबंधित विभिन्न कार्यों और खरीद में हिमाचल प्रदेश रोड सेफ्टी फंड एंड एक्टिविटीज रूल्स, 2022 का न तो अक्षरशः और न ही उसकी मूल भावना के अनुरूप पालन किया गया।
सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जब डीआईजी टीटीआर संजीव गांधी ने लगभग 30 करोड़ रुपये के रोड सेफ्टी फंड का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ऑडिट अकाउंटेंट जनरल के माध्यम से करवाने का प्रस्ताव रखा, तो पुलिस महानिदेशक द्वारा उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया। इसके विपरीत, पुलिस महानिदेशक के कार्यालय द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उल्टे उस घर का समिति के माध्यम से ऑडिट करवाने की घोषणा की गई, जिसमे स्वयं संजीव गांधी रह रहे है।
इससे यह गंभीर प्रश्न उठता है कि जब स्वतंत्र बाहरी ऑडिट की मांग की गई थी, तो उसे स्वीकार करने के बजाय यह बात किसी की भी समझ से परे है कि किसी अधिकारी के आवास का ऑडिट कराया जाए और वह भी ऐसी समिति से, जिसका गठन स्वयं पुलिस महानिदेशक द्वारा अपनी पसंद से किया गया हो। प्रथम दृष्टया यह कार्रवाई प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है। इसके बजाय पुलिस महानिदेशक को लगभग 30 करोड़ रुपये के रोड सेफ्टी फंड के उपयोग और व्यय का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ऑडिट करवाना चाहिए था।
इसी क्रम में यह भी उल्लेखनीय है कि पुलिस महानिदेशक द्वारा पूर्व में भी डीआईजी स्तर के अधिकारी संजीव गांधी पर लगभग 1.80 लाख रुपये का पेनल रेंट लगाया गया, जबकि इस कार्रवाई की वैधानिक क्षमता, अधिकारिता तथा आधार पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। प्रथम, संबंधित आवास के संबंध में ऐसा कोई स्पष्ट अभिलेख उपलब्ध नहीं था, जिससे यह प्रमाणित हो कि उक्त आवास को कभी विधिवत रूप से एसपी शिमला के लिए निर्धारित किया गया था। पुलिस महानिदेशक के कार्यालय में ऐसा कोई स्पष्ट नोटिफिकेशन अथवा आदेश भी उपलब्ध नहीं था, जिससे यह प्रमाणित हो कि उक्त आवास को एसपी शिमला के लिए आधिकारिक रूप से निर्धारित किया गया था।
दूसरे, संजीव गांधी को पदोन्नत होने पर आवास कभी विधिवत रूप से आवंटित ही नहीं किया गया था। जून माह में एक आवास आवंटित किया गया, लेकिन वह उपलब्ध नहीं हो सका क्योंकि डॉ. राहुल राव द्वारा पूर्व आवास खाली नहीं किया गया था। इस प्रकार आवास का आवंटन एक क्रमिक प्रक्रिया का हिस्सा था। अगर डॉ राहुल राव घर खाली करते तभी वह घर मिल पाता इसी लिए जुलाई माह में जो आवास आवंटित किया गया, वह स्वयं अत्यंत जर्जर अवस्था में था। ऐसी परिस्थितियों में यह गंभीर प्रश्न उठता है कि किस आधार पर और किस वैधानिक अधिकार के अंतर्गत डीआईजी स्तर के अधिकारी पर र्माकेट रेट पर पीनल रेंट लगाया गया।
इन समस्त परिस्थितियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पुलिस महानिदेशक का कार्यालय लगभग 30 करोड़ रुपये के रोड सेफ्टी फंड के उपयोग और व्यय का स्वतंत्र ऑडिट करवाने से क्यों बच रहा है? यदि सभी व्यय नियमों के अनुरूप और पारदर्शी थे, तो अकाउंटेंट जनरल के माध्यम से स्वतंत्र ऑडिट कराने में आपत्ति का कोई औचित्य क्यों होना चाहिए?
इसके विपरीत, एक डीआईजी द्वारा उठाए गए वित्तीय अनियमितताओं के प्रश्नों के बाद उसी अधिकारी के विरुद्ध पीनल रेंट जैसी कार्रवाई करना और उससे संबंधित विषयों को चुनिंदा रूप से प्रेस में जारी करना गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।
यह भी गंभीर प्रश्न है कि केवल लगभग 130 वर्ष पुराने साउथवुड हाउस के संबंध में एक विशेष टीम गठित कर चयनात्मक ऑडिट क्यों कराया गया, जबकि लगभग 30 करोड़ रुपये के रोड सेफ्टी फंड के व्यापक उपयोग और व्यय का स्वतंत्र एवं समग्र ऑडिट कराने की मांग की गई थी। क्या यह मात्र संयोग है कि एक ओर रोड सेफ्टी फंड में कथित गंभीर अनियमितताओं को डीआईजी टीटीआर द्वारा उजागर किया गया और दूसरी ओर उन्हीं के विरुद्ध आवास, पीनल रेंट तथा अन्य विषयों से संबंधित कार्रवाइयों को चुनिंदा रूप से सार्वजनिक किया गया?
पूरे घटनाक्रम से यह गंभीर आशंका उत्पन्न होती है कि डीआईजी संजीव गांधी द्वारा रोड सेफ्टी फंड में उजागर की गई कथित वित्तीय अनियमितताओं और खरीद में हुई हेराफेरी के कारण उन्हें सामाजिक रूप से अपमानित, बदनाम और सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने का प्रयास किया गया। यदि किसी अधिकारी द्वारा नियमों के उल्लंघन और वित्तीय अनियमितताओं को उजागर करना ही उसके विरुद्ध प्रतिकूल कार्रवाई का कारण बन जाए, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और विधि के शासन के लिए अत्यंत गंभीर स्थिति होगी।
वास्तव में, किसी कनिष्ठ अधिकारी द्वारा अपने से अत्यंत वरिष्ठ अधिकारियों के प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण में हुए कथित अनियमित व्ययों को उजागर करना निश्चित रूप से कठिन और जोखिमपूर्ण कार्य है। यदि ऐसे अधिकारी को अपनी बात रखने के बाद स्थानांतरण, सामाजिक अपमान, चुनिंदा प्रेस प्रकाशनों और अन्य प्रतिकूल कार्रवाइयों का सामना करना पड़े, तो यह स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठाता है कि क्या ये कार्रवाईयां प्रतिशोध या बदले की कार्रवाई का स्वरूप तो नहीं रखतीं। डीआईजी संजीव गांधी द्वारा उठाए गए प्रश्नों का उत्तर कार्रवाई से नहीं, बल्कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और बाहरी ऑडिट के माध्यम से दिया जाना चाहिए। वहीं इस गंभीर मामले पर सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू और हिमाचल प्रदेश सरकार को निष्पक्ष जाँच करवानी चाहिए।


















