Panchayat Tender Scam: हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित धर्मपुर विकास खंड के अंतर्गत आने वाली पंचायतों में निर्माण सामग्री की निविदाओं (टेंडर) को लेकर प्रशासनिक स्तर पर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अभी महज एक सप्ताह पहले ही गंगुडी, हुडंग और रोड़ी पंचायतों में टेंडर निविदाएं प्रकाशित करने में भारी गड़बड़ियों का मामला सामने आया था। उस दौरान मामला उजागर होने के बाद प्रशासन ने भारी अनियमितताओं के चलते प्रकाशित निविदाओं को रद्द कर दिया था। इस कार्रवाई के बाद भी ब्लॉक स्तर पर व्यवस्था में कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा है।
हाल ही में ब्लॉक कार्यालय में आयोजित हुई स्टाफ बैठक के दौरान भी उच्च अधिकारियों द्वारा सभी पंचायत कर्मचारियों को टेंडर निविदाओं को प्रदर्शित करने में पूरी सावधानी बरतने के सख्त मौखिक निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद, अब एक और नया मामला सामने आने के बाद यह गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं कि संबंधित पंचायत सचिव अपने उच्च अधिकारियों के आदेशों की सरेआम अवहेलना क्यों कर रहे हैं। निर्देशों के बाद भी प्रक्रिया में पारदर्शिता का न होना प्रशासनिक ढिलाई की ओर इशारा करता है।

ताजा प्रकरण में सनवारा पंचायत द्वारा जारी किया गया नया टेंडर नोटिस चर्चा और विवाद का मुख्य विषय बन गया है। इस पंचायत में जारी किए गए निविदा विज्ञापन की समय सीमा और आवंटन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सनवारा पंचायत द्वारा प्रकाशित निविदा में टेंडर फॉर्म आमंत्रित करने की तिथि 13 अगस्त से 21 अगस्त तक तय की गई है। हालांकि, हैरान करने वाली बात यह है कि पंचायत प्रशासन द्वारा इस निविदा को समाचार पत्रों में 19 अगस्त को प्रकाशित करवाया गया।
नियमानुसार, किसी भी विज्ञापन के समाचार पत्रों में छपने के बाद आवेदकों को निविदा फॉर्म भरकर जमा करने के लिए कम से कम 15 दिनों का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। इसके विपरीत, इस मामले में विज्ञापन छपने के बाद आवेदकों के पास फॉर्म जमा करने के लिए केवल दो दिन का समय बचा है। इस अभूतपूर्व जल्दबाजी के सामने आने के बाद अब यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या पंचायत में टेंडर जारी करना सिर्फ एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है या इसके पीछे कोई सोची-समझी मंशा काम कर रही है।
कम समय दिए जाने के कारण स्थानीय ग्रामीणों और संबंधित ठेकेदारों में भारी रोष व्याप्त है। ठेकेदारों का आरोप है कि इतने कम समय की वजह से आम वेंडर और नए प्रतिभागी इस प्रक्रिया में हिस्सा ही नहीं ले पा रहे हैं। क्षेत्र में यह आशंका गहराई से जताई जा रही है कि अपने पसंदीदा और खास लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाने की नीयत से ही सार्वजनिक समाचार पत्रों में विज्ञापन के प्रकाशन में जानबूझकर देरी की गई है ताकि प्रतिस्पर्धा को समाप्त किया जा सके।
इस पूरे प्रकरण में खंड विकास अधिकारी कार्यालय की कार्यप्रणाली और भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है। जनसामान्य के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि पंचायतों द्वारा तैयार की जाने वाली और प्रकाशित की जाने वाली निविदाओं की पूर्व जांच बीडीओ कार्यालय के स्तर पर क्यों नहीं की जा रही है। अगर उच्च स्तर पर समय रहते जांच की जाए, तो इस प्रकार के नियमों के उल्लंघन पर शुरुआती चरण में ही रोक लगाई जा सकती है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विकास खंड के अधीन आने वाली विभिन्न पंचायतों में वेंडरों के चयन के लिए अलग-अलग और असंगत मापदंड तय किए गए हैं। आरोप है कि कुछ पंचायतों द्वारा निविदा सूची में जानबूझकर बहुत कम सामग्री की मांग दिखाई जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि टेंडर प्रक्रिया एक बार बिना किसी खास प्रतिस्पर्धा के पूरी हो जाए और फिर बाद में अपने चहेते सप्लायरों से बिना टेंडर अतिरिक्त सामान खरीदकर मोटी कमीशनखोरी की जा सके। यह पूरी व्यवस्था पंचायत राज की पारदर्शी कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है।
धर्मपुर क्षेत्र की पंचायतों में निविदा आवंटन में लगातार सामने आ रही इन गंभीर खामियों और धांधली के चलते अब विजिलेंस जांच की मांग तेजी से जोर पकड़ने लगी है। स्थानीय नागरिकों, ठेकेदारों और जन प्रतिनिधियों ने राज्य के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू तथा पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह से इस पूरे मामले में तत्काल कड़ा हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। जन प्रतिनिधियों की मांग है कि केवल धर्मपुर ही नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश की पंचायतों में हाल के दिनों में जारी की गई सभी निविदाओं की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि दोषियों को चिह्नित कर उन पर सख्त कार्रवाई की जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम पर धर्मपुर के पंचायत इंस्पेक्टर राजिंदर वर्मा ने पहले भी ऐसा मामला सामने आने के दौरान स्थिति स्पष्ट की थी। उन्होंने बताया था कि पंचायती राज नियमों के अनुसार, किसी भी टेंडर नोटिस का सार्वजनिक प्रकाशन होने के बाद उसकी आवंटन प्रक्रिया के लिए न्यूनतम 15 दिनों का समय दिया जाना कानूनन अनिवार्य है, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे। नियमावली के इतने स्पष्ट और कड़े प्रावधानों के बावजूद समय-सीमा में इस तरह की हेरफेर होना विभाग के लिए अत्यंत चिंताजनक पहलू है, जिस पर पंचायती राज विभाग को कड़ा संज्ञान लेते हुए त्वरित और सख्त रुख अपनाने की जरूरत है।


















