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DSP Vijay Raghuvanshi Case: “प्रशासनिक कार्रवाई या सोची-समझी साजिश?” डीएसपी विजय रघुवंशी प्रकरण में तबादले से कथित जातिगत उत्पीड़न तक, जाने पूरी कहानी

हिमाचल प्रदेश पुलिस में डीएसपी विजय रघुवंशी से जुड़े जातिगत उत्पीड़न मामले ने राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली, वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही और संस्थागत दबाव पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला अब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।
By PNT
Published on: 20 August 2026
DSP Vijay Raghuvanshi Case: "प्रशासनिक कार्रवाई या सोची-समझी साजिश?" डीएसपी विजय रघुवंशी प्रकरण में तबादले से कथित जातिगत उत्पीड़न तक, जाने पूरी कहानी

DSP Vijay Raghuvanshi Case: हिमाचल प्रदेश पुलिस के डीएसपी विजय रघुवंशी से जुड़े जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न मामले ने अब हिमाचल प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली, वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही और अनुसूचित जाति से संबंधित एक पुलिस अधिकारी के साथ कथित भेदभाव और अपमान के गंभीर आरोपों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला अब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि नवंबर 2025 से शुरू हुई घटनाओं की पूरी श्रृंखला को अलग-अलग प्रशासनिक घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक साथ देखने पर चुनिंदा लक्ष्यीकरण, अपमान, संस्थागत दबाव और कथित जातिगत उत्पीड़न का पैटर्न दिखाई देता है। इन आरोपों की अंतिम सत्यता सक्षम जांच द्वारा निर्धारित की जानी है।

तबादला आदेश से विवाद की शुरुआत
बता दें कि 5 नवंबर 2025 को हिमाचल प्रदेश सरकार ने 40 से अधिक पुलिस अधिकारियों के तबादले किए। डीएसपी विजय रघुवंशी को पांवटा साहिब में नई तैनाती दी गई। 23 मई 2023 की सरकारी तबादला नीति के अनुसार अधिकारी को निर्धारित समय में कार्यमुक्त होकर नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करना था। एसपी शिमला ने विजय रघुवंशी को कार्यमुक्त किया और वह सरकारी आदेश का पालन करते हुए पांवटा साहिब पहुंचे।

शिकायतकर्ता का कहना है कि सरकार की ओर से ऐसा कोई आदेश नहीं था कि वह पांवटा साहिब जाने से पहले डीजीपी कार्यालय से किसी अलग ‘मूवमेंट ऑर्डर’ की प्रतीक्षा करें। इसके बावजूद, उनके अनुसार, पांवटा साहिब पहुंचने पर उन्हें कार्यभार ग्रहण करने से रोकने के लिए थाना प्रभारी को भेजा गया।

एक डीएसपी को रोकने के लिए थाना प्रभारी क्यों?
विजय रघुवंशी का आरोप है कि उन्हें रोकने के लिए एक कनिष्ठ अधिकारी यानी थाना प्रभारी को मौके पर भेजा गया। उनका कहना है कि इसके बाद तत्कालीन डीजीपी अशोक तिवारी ने उन्हें फोन और व्हाट्सऐप के माध्यम से संपर्क कर कथित रूप से धमकाया और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी।

शिकायतकर्ता के अनुसार, किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को उसकी विधिवत नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करने से रोकने के लिए थाना प्रभारी को भेजना अपने आप में असाधारण और अपमानजनक कार्रवाई थी। उनका आरोप है कि यह केवल ज्वाइनिंग रोकना नहीं था, बल्कि एक पुलिस अधिकारी की गरिमा और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने की हद तक किया गया हस्तक्षेप था।

एसपी सिरमौर और दक्षिणी रेंज के डीआईजी की भूमिका भी सवालों में
मामले में एसपी सिरमौर की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। शिकायतकर्ता के अनुसार, पांवटा साहिब पहुंचने के बाद एसपी सिरमौर ने उनका कार्यभार स्वीकार नहीं किया। इस पूरे घटनाक्रम के संबंध में एसपी सिरमौर द्वारा दक्षिणी रेंज के डीआईजी को भेजी गई आंतरिक रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण दस्तावेज बताई जा रही है।

इसी रिपोर्ट में तत्कालीन वरिष्ठ सीआईडी अधिकारी एडीजीपी ज्ञानेश्वर सिंह का उल्लेख होने और डीएसपी विजय रघुवंशी की गतिविधियों पर निगरानी रखे जाने का आरोप सामने आया है। यदि आधिकारिक रिकॉर्ड में ऐसा उल्लेख है, तो यह गंभीर सवाल उठाता है कि एक सरकारी तबादला आदेश के तहत नई तैनाती पर जाने वाले डीएसपी की गतिविधियों पर सीआईडी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी की आवश्यकता क्यों पड़ी?

इससे यह भी जांच का विषय बनता है कि दक्षिणी रेंज के डीआईजी को इस पूरी कार्रवाई की कितनी जानकारी थी, उन्हें किस स्तर से निर्देश मिले और उन्होंने अधिकारी को कार्यभार ग्रहण करने से रोकने की कार्रवाई पर क्या कदम उठाए।

क्या पूरे पुलिस तंत्र का इस्तेमाल अधिकारी को रोकने में हुआ?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि घटनाओं को एक साथ देखने पर थाना प्रभारी से लेकर एसपी सिरमौर, दक्षिणी रेंज के डीआईजी और सीआईडी स्तर तक पुलिस तंत्र के विभिन्न स्तरों का उल्लेख सामने आता है। उनका कहना है कि इन सभी घटनाओं की कड़ियां इस ओर संकेत करती हैं कि उन्हें नई तैनाती पर जाने से रोकने के लिए एक असाधारण स्तर का संस्थागत हस्तक्षेप किया गया।

यदि रिकॉर्ड इस आरोप की पुष्टि करते हैं तो यह सामान्य स्थानांतरण विवाद नहीं रहेगा, बल्कि यह सवाल बनेगा कि क्या राज्य पुलिस के विभिन्न स्तरों का इस्तेमाल एक ही अधिकारी के विरुद्ध किया गया?

अन्य अधिकारी ज्वाइन करते रहे, कार्रवाई सिर्फ विजय रघुवंशी पर क्यों?
विजय रघुवंशी का कहना है कि 6 नवंबर 2025 को अन्य अधिकारी भी अपनी नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण कर रहे थे। लेकिन उनके मामले में अलग रवैया अपनाया गया। 12 दिसंबर 2025 को डीजीपी अशोक तिवारी द्वारा उनके विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच की सिफारिश किए जाने का आरोप है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके विरुद्ध प्रतिकूल कार्रवाई का आधार ही यह बनाया गया कि उन्होंने तबादला आदेश के बाद नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करने का प्रयास क्यों किया। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि तबादला आदेश का पालन करना अन्य अधिकारियों के लिए सामान्य प्रक्रिया थी, तो विजय रघुवंशी के लिए वही कार्रवाई अनुशासनहीनता कैसे बन गई?

जबरन सरकारी वाहन वापस लेने का विवाद
इसके बाद एसपी शिमला गौरव सिंह की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए। विजय रघुवंशी का कहना है कि उनका सरकारी वाहन वापस ले लिया गया। उन्होंने इस घटना की सूचना डेली डायरी में दर्ज कराई और अगले दिन लगभग छह किलोमीटर पैदल कार्यालय जाना पड़ा।

उनके अनुसार, जब उन्होंने एसपी शिमला से वाहन वापस लिए जाने का कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि उन्होंने एसएसपी संजीव गांधी को सहायता क्यों दी। उनका आरोप है कि उन्हें यह भी संकेत दिया गया कि यदि उन्होंने ऐसा करना जारी रखा तो उनके साथ और अधिक कठोर व्यवहार किया जाएगा। यह आरोप यदि रिकॉर्ड से पुष्ट होता है तो सवाल उठता है कि क्या सरकारी वाहन को प्रशासनिक सुविधा के बजाय दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया?

₹750 की वेतन कटौती ने वाहन विवाद को और गंभीर बनाया
एसपी शिमला के उत्तर को लेकर विजय रघुवंशी का कहना है कि वाहन को उनके साथ संलग्न वाहन नहीं बताया गया, जबकि उनके वेतन से ₹750 प्रतिमाह की कटौती होती थी और कथित रूप से वाहन वापस लिए जाने के बाद भी यह कटौती जारी रही। उनका कहना है कि वेतन विवरण और कार्यालयीन रिकॉर्ड वाहन के वास्तविक दर्जे को स्पष्ट कर सकते हैं। यदि सरकारी रिकॉर्ड वाहन को संलग्न दिखाते हैं और आयोग के समक्ष इसके विपरीत तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं, तो यह महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने या गलत प्रस्तुतीकरण का प्रश्न बन सकता है।

चिकित्सा स्थिति के बावजूद कठिन ड्यूटी का आरोप
विजय रघुवंशी का कहना है कि उनकी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी डीजीपी सहित वरिष्ठ अधिकारियों को थी। उन्होंने Coccydynia और गंभीर टेल-बोन/स्पाइनल चोट का उल्लेख किया है। इसके बावजूद, उनके अनुसार, वाहन वापस लिया गया और उन्हें दूरस्थ तथा कठिन क्षेत्रों में ड्यूटी दी गई। शिकायतकर्ता का सवाल है कि यदि उन्हें फील्ड फंक्शन नहीं दिया गया था और इसी आधार पर वाहन वापस लिया गया, तो बाद में उन्हें ऐसे कार्यों पर क्यों लगाया गया जिनमें भौतिक आवागमन आवश्यक था? उनका आरोप है कि इन तैनातियों का उद्देश्य प्रशासनिक आवश्यकता से अधिक दबाव, अपमान और प्रतिशोध था।

जिला मजिस्ट्रेट को पत्र लिखना भी अनुशासनहीनता?
मामले में एक और विवाद जिला मजिस्ट्रेट को लिखे गए पत्र को लेकर है। विजय रघुवंशी का कहना है कि उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट को एक रिपोर्ट/पत्र भेजा, लेकिन उसे भी अनुशासनहीनता के रूप में प्रस्तुत किया गया और उनके विरुद्ध कार्रवाई के आधार के रूप में इस्तेमाल किया गया।

इस पर सवाल है कि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा जिला मजिस्ट्रेट को किसी प्रशासनिक या तथ्यात्मक विषय पर पत्र लिखना अपने आप में अनुशासनहीनता कैसे हो सकता है?, यदि पत्र में कोई प्रक्रियात्मक या भाषा संबंधी कमी थी तो उसका परीक्षण नियमों के अनुसार किया जा सकता था। लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसे भी उनके विरुद्ध प्रतिकूल रिकॉर्ड तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया गया।

कथित उत्पीड़न परिवार तक पहुंचा
विजय रघुवंशी का आरोप है कि कथित दबाव केवल उनके तक सीमित नहीं रहा। उनकी पत्नी उस समय थाना छोटा शिमला की एसएचओ थीं। उनके अनुसार, उनके कार्यकाल में थाना छोटा शिमला का सरकारी वाहन वापस ले लिया गया और उनके एसएचओ पद से हटने के अगले ही दिन वाहन बहाल कर दिया गया। यदि वाहन की वापसी और बहाली की तारीखें आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होती हैं, तो यह महत्वपूर्ण प्रश्न होगा कि क्या यह सामान्य प्रशासनिक निर्णय था या परिवार पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने का प्रयास।

कांस्टेबल निखिल के तबादले का आरोप
विजय रघुवंशी के अनुसार, कांस्टेबल निखिल ने केवल उनके सरकारी वाहन वापस लिए जाने की सूचना डेली डायरी में दर्ज की थी। इसके बाद उसका दूरस्थ स्थान पर तबादला कर दिया गया। एक पुलिसकर्मी का सरकारी रिकॉर्ड में घटना दर्ज करना उसका कर्तव्य है। इसलिए, यदि केवल सूचना दर्ज करने के कारण उसके विरुद्ध प्रतिकूल कार्रवाई हुई, तो यह भी गंभीर जांच का विषय होगा।

इंस्पेक्टर ममता की तैनाती पर भी सवाल
विजय रघुवंशी का कहना है कि उनकी पत्नी को एसएचओ पद से हटाए जाने के बाद इंस्पेक्टर ममता को ऐसी ड्यूटी दी गई जिसे वह जानबूझकर कठिन और प्रतिकूल मानते हैं। शिकायतकर्ता इसे परिवार और उससे जुड़े अधिकारियों पर कथित संस्थागत दबाव के व्यापक पैटर्न का हिस्सा मानते हैं।

एफआईआर 4/2024 और गिरफ्तारी की अनुमति का मामला
विजय रघुवंशी ने एफआईआर संख्या 4/2024, पुलिस थाना एसवी एवं एसीबी से संबंधित कार्यवाही को भी अपने विरुद्ध कथित प्रतिशोधात्मक कार्रवाई से जोड़ा है। उनका आरोप है कि वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध उनकी शिकायतों के बाद उनके विरुद्ध गिरफ्तारी की अनुमति और अभियोजन स्वीकृति से जुड़े प्रस्ताव आगे बढ़ाए गए। आरटीआई से प्राप्त अभियोजन विभाग की नोटशीट और संयुक्त निदेशक अभियोजन की टिप्पणी का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि उनके विरुद्ध पर्याप्त स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य नहीं था तथा प्रस्तावित गिरफ्तारी और हिरासत में पूछताछ की अनुमति नहीं दी गई।

डीजीपी पर ‘क्रिमिनल इम्यूटेशन’ बनाने का आरोप
विजय रघुवंशी का आरोप है कि उनके विरुद्ध ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं जिनसे उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे और उन्हें आपराधिक मामलों से जोड़ने की धारणा पैदा हो। उनका कहना है कि संबंधित ट्रांसक्रिप्ट और अन्य आधारभूत सामग्री का स्वतंत्र परीक्षण किया जाना चाहिए क्योंकि उनके अनुसार उसमें उनके विरुद्ध कोई स्पष्ट स्वतंत्र कड़ी नहीं थी।

पूरे मामले में एक ही पैटर्न का आरोप
विजय रघुवंशी की शिकायत का मूल आधार यह है कि घटनाओं को अलग-अलग देखकर वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आएगी। उनका कहना है कि तबादला रोकने का प्रयास, कथित डीजीपी हस्तक्षेप, सीआईडी स्तर की कथित निगरानी, एसपी सिरमौर की कार्रवाई, दक्षिणी रेंज के डीआईजी को रिपोर्टिंग, निलंबन की सिफारिश, वाहन वापस लेना, वेतन कटौती, चिकित्सा स्थिति की कथित अनदेखी, कठिन ड्यूटी, परिवार से जुड़े अधिकारियों पर कार्रवाई और बाद के प्रतिकूल प्रस्ताव, इन सभी को एक साथ देखा जाना चाहिए। उनका आरोप है कि यह एक अधिकारी को क्रमिक रूप से अपमानित, अलग-थलग और कमजोर करने की संस्थागत प्रक्रिया थी।

अब मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सामने
मामला अब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि उसके साथ जातिगत आधार पर अपमान, भेदभाव और संस्थागत उत्पीड़न किया गया। अब आयोग के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या घटनाएं सामान्य प्रशासनिक निर्णय थीं या उनके पीछे कोई चुनिंदा लक्ष्यीकरण और जातिगत भेदभाव का पैटर्न था। इसके लिए मूल तबादला आदेश, कार्यमुक्ति आदेश, ज्वाइनिंग रिकॉर्ड, एसपी सिरमौर की रिपोर्ट, डीआईजी दक्षिणी रेंज का पत्राचार, सीआईडी से संबंधित रिकॉर्ड, कॉल और व्हाट्सऐप संचार, वाहन आवंटन रिकॉर्ड, वेतन कटौती के दस्तावेज, डेली डायरी, स्थानांतरण आदेश और विभागीय नोटशीट निर्णायक महत्व रखेंगे।

राजनीतिक सवाल भी अब सामने
मामले का राजनीतिक पहलू भी उभर रहा है। यदि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर अनुसूचित जाति से संबंधित एक अधिकारी को कथित रूप से अपमानित और प्रताड़ित करने के आरोप लगते हैं और सरकार प्रभावी एवं स्वतंत्र जांच नहीं कराती, तो इसका असर सरकार की सामाजिक न्याय संबंधी छवि पर पड़ सकता है। विशेष रूप से तब, जब आरोप राज्य पुलिस के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचते हैं। सरकार के लिए सबसे सुरक्षित और संस्थागत रूप से उचित रास्ता यही होगा कि आरोपों को न तो पहले से सही माना जाए और न ही बिना स्वतंत्र जांच के खारिज किया जाए।

अब असली परीक्षा रिकॉर्ड की है
यह मामला अब केवल विजय रघुवंशी और पुलिस अधिकारियों के बीच व्यक्तिगत विवाद नहीं है। यह सवाल है कि क्या किसी सरकारी अधिकारी को वैध आदेश का पालन करने पर दंडित किया जा सकता है, क्या वरिष्ठ अधिकारी अपनी शक्तियों का इस्तेमाल अधीनस्थ अधिकारी को अपमानित करने के लिए कर सकते हैं, और क्या अनुसूचित जाति से संबंधित अधिकारी को समान सुरक्षा और समान व्यवहार का संवैधानिक अधिकार वास्तव में सुनिश्चित है?

यदि दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और प्रत्यक्ष गवाह शिकायतकर्ता के आरोपों की पुष्टि करते हैं, तो मामला गंभीर संस्थागत जवाबदेही का बन सकता है। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो स्वतंत्र जांच से संबंधित अधिकारियों की स्थिति भी स्पष्ट होगी। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह महज प्रशासनिक कार्रवाई थी, या घटनाओं की पूरी श्रृंखला एक डीएसपी को लक्षित करने, अपमानित करने और संस्थागत रूप से कमजोर करने की कहानी कहती है? , राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की कार्यवाही और मूल रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच अब इस सवाल का जवाब तय करेगी।

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