HP DGP NCSC Hearing: हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी आज राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हो रहे हैं। आयोग ने डीजीपी द्वारा व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट देने और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने के अनुरोध को खारिज कर दिया था। इसके बाद आज की यह व्यक्तिगत पेशी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
दरअसल, यह पूरा मामला अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले पुलिस उपाधीक्षक विजय रघुवंशी के सेवा-संबंधी विवाद, कथित उत्पीड़न और निलंबन की संस्तुति से जुड़ा हुआ है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत स्थापित राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुसूचित जातियों के अधिकारों, संवैधानिक संरक्षण और प्रशासनिक उत्पीड़न से संबंधित मामलों की गहन जांच करता है। जब किसी सरकारी सेवा में तैनात अनुसूचित जाति के अधिकारी के साथ भेदभाव या प्रताड़ना का मामला सामने आता है, तो आयोग की संवैधानिक भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्राप्त जानकारी अनुसार यह विवाद तब शुरू हुआ जब डीएसपी विजय रघुवंशी ने अपनी गंभीर शारीरिक परेशानी और निर्धारित कर्तव्यों को पूरा करने में असमर्थता व्यक्त करते हुए शिमला के जिलाधिकारी को एक पत्र लिखा। आरोप है कि अपनी स्वास्थ्य संबंधी स्थिति से अवगत कराने वाले इस पत्र को ही उनके खिलाफ अनुशासनहीनता मान लिया गया और विभागीय कार्रवाई के साथ निलंबन की संस्तुति का आधार बना दिया गया। यह स्थिति प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है कि अपनी बीमारी और पीड़ा के बारे में सक्षम प्राधिकारी को सूचित करना किस सेवा नियम के तहत गंभीर कदाचार माना जा सकता है।
इस मामले में एक और संवेदनशील और मानवीय पहलू सामने आया है। आरोप है कि डीएसपी विजय रघुवंशी से उनकी अधिकृत सरकारी वाहन सुविधा वापस ले ली गई, जिससे उन्हें लगभग 7 किलोमीटर पैदल चलने पर मजबूर होना पड़ा। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि जब उसी कार्यालय के अन्य अधिकारियों को सरकारी वाहन उपलब्ध कराए जा रहे थे, तब एक डीएसपी स्तर के अधिकारी को वाहन से वंचित क्यों किया गया?
इसके साथ ही, यह आरोप भी सामने आया है कि इसी दौरान डीजीपी अशोक तिवारी द्वारा प्रशिक्षण पर आए भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों के लिए नए स्कॉर्पियो-एन वाहन उपलब्ध कराए गए थे। एक ओर नए अधिकारियों को वाहन आवंटन और दूसरी ओर एक कार्यरत डीएसपी को 7 किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर करने का यह विरोधाभास आयोग के समक्ष प्रमुख बिंदु बना हुआ है।
इसके अतिरिक्त, यह जानकारी भी सामने आई है कि बीते 19 मई को जब विजय रघुवंशी चिकित्सकीय परीक्षण के लिए गए थे, तब उनकी अनुपस्थिति दर्ज कर ली गई और मामले को अनुशासनहीनता का रूप दे दिया गया। इस मामले में शिमला के पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह और डीजीपी अशोक तिवारी की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं कि अधिकारी के स्वास्थ्य का हाल जानने के बजाय एकपक्षीय कार्रवाई की गई, जिससे उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा। इस मामले में सभी आरोपों के पीछे कि सच्चाई निष्पक्ष जाँच से ही सामने आएगी।
हिमाचल प्रदेश सरकार की चुप्पी पर भी उठ रहे हैं सवाल
इस गंभीर मामले में सुक्खू सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि एक अनुसूचित जाति के अधिकारी द्वारा कथित उत्पीड़न और प्रशासनिक दबाव की शिकायत किए जाने के बावजूद सरकार ने अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई और मूकदर्शक बनी रही।
सोलन के एक दलित नेता ने चेतावनी दी है कि यदि कमजोर वर्ग के अधिकारियों के साथ भेदभाव और दुर्व्यवहार की शिकायतों पर संस्थागत कार्रवाई नहीं हुई, तो इस मुद्दे पर प्रदर्शन किया जाएगा। उनका कहना है कि प्रभावशाली अधिकारियों को संरक्षण देना और कमजोर वर्ग के अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार करना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
इस मामले अब सभी की निगाहें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की व्यक्तिगत सुनवाई पर टिकी हैं। आयोग के समक्ष यह सवाल तो है ही कि विजय रघुवंशी के विरुद्ध कार्रवाई उचित थी या नहीं, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि एक पुलिस उपाधीक्षक को जबरन वाहन सुविधा से वंचित कर 7 किलोमीटर पैदल चलने पर मजबूर क्यों किया गया, जबकि अन्य अधिकारियों और प्रशिक्षणरत IPS अधिकारियों के लिए नए वाहन उपलब्ध थे? आज की सुनवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि अनुशासन के नाम पर प्रशासनिक कार्रवाई की सीमा क्या है और क्या अनुसूचित जाति के अधिकारी के स्वास्थ्य, सुविधा तथा सम्मान से जुड़े निर्णयों में संवैधानिक समानता का पालन हुआ है।


















