HP High Court News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि में सुधार के लिए सेवा नियमों में तय की गई समयसीमा का सख्ती से पालन किया जाना जरूरी है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल समानता या न्यायसंगत आधार के नाम पर निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद जन्मतिथि में बदलाव की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जा सकती।
दरअसल यह फैसला न्यायमूर्ति राकेश कैन्थला की अदालत द्वारा सुनाया गया है। जानकारी के मुताबिक यह पूरा कानूनी मामला प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक सुरेश कुमार से जुड़ा हुआ है। सुरेश कुमार ने दीवानी अदालत में एक याचिका दायर कर अपने स्कूली और सरकारी सेवा रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि 30 अगस्त 1968 को बदलकर 1 सितंबर 1969 दर्ज करने की मांग की थी।
सुरेश कुमार का यह दावा था कि उनकी जन्मतिथि मूल रूप से गलत तरीके से दर्ज हो गई थी और बाद में अधिकारियों से प्राप्त जन्म प्रमाणपत्र के माध्यम से सही जन्मतिथि 1 सितंबर 1969 सामने आई थी। राज्य सरकार ने शिक्षक के इस दावे का कड़ा विरोध किया था। सरकार की ओर से दलील दी गई कि सुरेश कुमार की जन्मतिथि उनके मैट्रिक प्रमाणपत्र, स्कूल छोड़ने के प्रमाणपत्र और आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड में शुरू से 30 अगस्त 1968 ही दर्ज थी।
इसके अलावा, उनके पिता ने भी संबंधित समय पर यही जन्मतिथि दर्ज कराई थी। शुरुआती स्तर पर ट्रायल कोर्ट ने सुरेश कुमार के दावे को खारिज कर दिया था, लेकिन इसके बाद प्रथम अपीलीय अदालत ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट का रुख किया था। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश वित्तीय नियम, 1971 के नियम 7.1 का विशेष रूप से हवाला दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को सरकारी सेवा में प्रवेश करने के दो साल के भीतर ही अपनी जन्मतिथि में सुधार की मांग करनी होती है। रिकॉर्ड के अनुसार, सुरेश कुमार ने 1 सितंबर 2001 को सरकारी सेवा ज्वाइन की थी, जबकि उन्होंने पहली बार जन्मतिथि में सुधार के लिए 13 मई 2003 को आवेदन दिया था। इस प्रकार यह दावा निर्धारित दो साल की वैधानिक अवधि समाप्त होने के बाद किया गया था।
अदालत ने शिक्षक की उस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि देरी केवल कुछ महीनों की थी और इस नियम का मुख्य उद्देश्य सेवा के अंतिम चरण में जन्मतिथि बदलने के दावों पर रोक लगाना है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक बार नियम ने स्पष्ट समयसीमा तय कर दी है, तो अदालत उसके पीछे के मूल उद्देश्य की अलग से व्याख्या कर उस अवधि में कोई छूट प्रदान नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जन्मतिथि में देरी से किए जाने वाले बदलाव का सीधा असर अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता और पदोन्नति के अवसरों पर पड़ सकता है। इसलिए अदालतें केवल समानता या न्यायसंगत विचारों के आधार पर वैधानिक नियमों में ढील नहीं दे सकती हैं। सीमा अवधि के संबंध में अदालत ने पाया कि विवादित जन्मतिथि 1985 में जारी किए गए मैट्रिक प्रमाणपत्र में पहले से ही दर्ज थी, जिसके चलते 2004 में दायर किया गया यह मुकदमा अत्यधिक विलंबित था।
अदालत ने ज्योतिषी के माध्यम से कथित सही जन्मतिथि का पता चलने के दावे को भी स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रथम अपीलीय अदालत ने निर्धारित दो साल की अवधि बीत जाने के बाद भी जन्मतिथि में सुधार की अनुमति देकर गंभीर कानूनी भूल की थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को पलटते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह से बहाल कर दिया, जिसमें सुरेश कुमार का मुकदमा खारिज कर दिया गया था।


















