Himachal Artificial Lake: हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के नालागढ़ उपमंडल अंतर्गत कोईड़ी पंचायत के कुमारहट्टी में प्राकृतिक आपदा का नया संकट मंडरा रहा है। बीते 2 सितंबर की रात को हुए भारी भूस्खलन के बाद चिकनी खड्ड के प्राकृतिक जल बहाव में पहाड़ से गिरे भारी मलबे ने नदी का मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया। मलबे के इस अस्थायी बांध के पीछे पानी एकत्र होने से एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण हो गया है।
घटना के 25 दिन बीत जाने के बाद भी स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है, जिससे क्षेत्र में भारी भय और अनिश्चितता का माहौल है। मौजूदा परिस्थितियों में सबसे गंभीर चिंता आगामी बारिश को लेकर बनी हुई है। यदि क्षेत्र में पुन: वर्षा होती है, तो नया जल प्रवाह सीधे इसी जलाशय में समाहित होगा। जलस्तर में निरंतर वृद्धि होने से मलबे द्वारा निर्मित अस्थायी अवरोध पर दबाव अत्यंत तीव्र हो जाएगा।
यदि यह कमजोर अवरोध अचानक टूटा, तो जमा पानी और मलबे का भीषण सैलाब अत्यधिक गति से निचले इलाकों की ओर बहेगा। ऐसी स्थिति में चिकनी खड्ड के मैदानी इलाकों में अचानक विनाशकारी बाढ़ आने की प्रबल आशंका उत्पन्न हो गई है, जिसे लेकर सतर्कता अनिवार्य है।
इस आपदा का सबसे प्रत्यक्ष और घातक प्रभाव स्थानीय किसानों की आजीविका पर पड़ा है। कृत्रिम झील के जलभराव के कारण तीन भाईयों, नरेश कुमार शर्मा, जगपाल शर्मा और यशपाल शर्मा की लगभग 10 बीघा उपजाऊ कृषि भूमि पूरी तरह जलमग्न हो चुकी है। खेतों में पानी भर जाने से खरीफ की प्रमुख फसलें, विशेषकर टमाटर की पैदावार पूरी तरह नष्ट हो गई है।
पीड़ितों का कहना है कि वर्ष 2023 में भी उनकी फसलें तबाह हुई थीं लेकिन कोई राहत नहीं मिली थी। अब जलभराव के कारण आगामी कृषि चक्र और बुआई भी सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है। इस संकट का दूसरा अत्यंत संवेदनशील पहलू नदी तट पर स्थित हाई स्कूल भवन की सुरक्षा से जुड़ा है। कोईड़ी पंचायत के उपप्रधान कर्म चंद के अनुसार, झील का पानी लगातार आसपास की मिट्टी में रिस रहा है।
लंबे समय तक जल का ठहराव रहने से भूगर्भीय संरचना कमजोर हो रही है, जिससे पुनः बड़े भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। यदि भूस्खलन होता है तो स्कूल भवन जमींदोज हो सकता है। इसके अलावा, स्थानीय निवासी राम लाल के अनुसार, नदी पार के बच्चों को विद्यालय पहुंचने के लिए 3 से 4 किलोमीटर का अतिरिक्त पैदल सफर तय करना पड़ रहा है।
भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान अत्यंत संवेदनशील बनता जा रहा है। ग्राम पंचायत प्रधान रामनाथ चंदेल के अनुसार, इसी स्थल पर वर्ष 2023 में भी भूस्खलन के पश्चात झील जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी, जबकि वर्ष 2025 में भी पहाड़ी खिसकने की घटना दर्ज की गई थी। बार-बार एक ही स्थान पर मलबा गिरने से नदी का अवरुद्ध होना गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने बार-बार अस्थायी प्रयास करने के बजाय प्रशासन से इस प्राकृतिक समस्या का स्थायी तकनीकी समाधान खोजने की पुरजोर मांग की है। प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की बात करें तो घटना के पश्चात जिलाधीश मनमोहन शर्मा एवं एसडीएम नरेंद्र अहलूवालिया ने लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों, स्थानीय प्रतिनिधियों सहित स्थलीय निरीक्षण किया था।
अधिकारियों ने पानी की शीघ्र निकासी के आदेश दिए थे, जिसके बाद लोक निर्माण विभाग की पोकलेन मशीनों से खुदाई कर आंशिक निकासी शुरू की गई। हालांकि, कुमारहट्टी से गुरुकुंड तक अभी भी भारी मात्रा में जल जमा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता परवरसर सिंह ने स्पष्ट किया कि झील की निकासी विभाग के सीधे कार्यक्षेत्र में नहीं आती; एस्टीमेट प्रशासन को सौंप दिया गया है और बजट मिलते ही पूर्ण निकासी का कार्य किया जाएगा।
बता दें कि हिमालयी क्षेत्रों में पूर्व में घटी नेपाल जैसी त्रासदियों ने यह साबित किया है कि मलबे के अस्थायी बांध टूटने से कितना भीषण विनाश होता है। यद्यपि कुमारहट्टी में सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, परंतु 25 दिनों से जमा पानी, कमजोर मलबा और संभावित बारिश का संयोजन बेहद घातक सिद्ध हो सकता है। यदि समय रहते पानी की सुरक्षित निकासी और स्थायी सुरक्षा ढांचा तैयार नहीं किया गया, तो यह स्थानीय जलभराव की समस्या निचले मैदानी इलाकों के लिए एक भीषण तबाही में तब्दील हो सकती है।


















