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Major Vijay Singh Mankotia Death: देश के लिए तीन युद्ध लड़ने वाले पूर्व मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया का निधन,

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अपनी बेबाक शैली और बागी तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया का मंगलवार को निधन हो गया। मनकोटिया का 29 सितंबर 2026 को 87 वर्ष की आयु में निधन हुआ है।
Updated By News Desk
Published on: 29 सितम्बर 2026
Major Vijay Singh Mankotia Death: देश के लिए तीन युद्ध लड़ने वाले पूर्व मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया का निधन,

Major Vijay Singh Mankotia Death: हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अपनी बेबाक शैली, बागी तेवरों और देश के लिए तीन युद्धों में पराक्रम दिखाने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया का मंगलवार को निधन हो गया। उन्होंने अपने पैतृक गांव त्यारा में अंतिम सांस ली। स्वर्गीय मेजर विजय सिंह मनकोटिया का अंतिम संस्कार कल उनके पैतृक गांव में किया जाएगा।

सैन्य पृष्ठभूमि से निकलकर सत्ता के शीर्ष गलियारों तक अपनी मजबूत छाप छोड़ने वाले मेजर मनकोटिया के निधन से प्रदेश के राजनीतिक जगत और पूर्व सैनिकों में शोक की लहर दौड़ गई है। बता दें कि 87 वर्षीय मनकोटिया  का उनके पैतृक गांव त्यारा, जिला कांगड़ा में हृदयाघात के कारण निधन हुआ।

स्वर्गीय मेजर विजय सिंह मनकोटिया के भाई अभय सिंह ने घटनाक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि मंगलवार सुबह करीब 8 बजे जब मेजर मनकोटिया उठे, तब वे पूरी तरह स्वस्थ थे और एक बैठक में जाने की तैयारी कर रहे थे। सुबह करीब 8:40 बजे नाश्ता करते समय अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और सीने में तेज दर्द शुरू हुआ।

परिजनों ने तत्काल डॉक्टर को बुलाया, जिन्होंने हालत की गंभीरता को देखते हुए उन्हें अस्पताल ले जाने की सलाह दी। हालांकि, अस्पताल पहुंचने तक उनकी स्थिति अत्यधिक बिगड़ चुकी थी और डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों ने बताया कि वर्तमान में उनकी बेटी समयुक्त गुजरात में रहती हैं और बेटा सूर्यवीर अबू धाबी में रहता है। परिजनों के पैतृक गांव पहुंचने के बाद ही उनका अंतिम संस्कार संपन्न कराया जाएगा।

मेजर मनकोटिया का राजनीति में भी रुख एक सैन्य अधिकारी की तरह ही कड़ा और स्पष्ट रहा। राजनीतिक मोर्चे पर उन्होंने कभी भी समझौता नहीं किया। 1939 में जन्मे विजय सिंह मनकोटिया ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त किया और 1962 में गोरखा रेजिमेंट में शामिल हुए। भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून (IMA Dehradun) में वे एक उत्कृष्ट कैडेट कमांडर रहे, जहां 6 जनवरी 1962 की ऐतिहासिक परेड में उन्होंने IMA की टुकड़ी की अगुवाई की थी।

मेजर मनकोटिया ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के अलावा 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। मेजर की रैंक तक पहुंचने के बाद उन्होंने सेना से सेवानिवृत्ति ले ली। वे हिमाचल प्रदेश के स्कूलों में सैन्य परंपराओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने और भारतीय सेना में ‘हिमाचल रेजिमेंट’ के गठन के सबसे प्रबल पैरोकार माने जाते थे।

सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1982 में उन्होंने कांगड़ा जिले की शाहपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पहला चुनाव जीता। 1985 तक आते-आते वे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी बने और कांग्रेस में शामिल होकर शाहपुर से पुनः विधायक चुने गए। वर्ष 1989-90 में वे कांग्रेस से अलग होकर वी.पी. सिंह के जनमोर्चा/जनता दल से जुड़े और 1990 में जनता दल के टिकट पर शाहपुर से जीत दर्ज की। इसके बाद वे पुनः कांग्रेस में लौट आए।

वर्ष 1993 में शाहपुर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की सरकार में पहली बार पर्यटन मंत्री का कार्यभार सौंपा गया। यहीं से वीरभद्र सिंह और मेजर मनकोटिया के बीच राजनीतिक मतभेद शुरू हुए, जो जीवन के अंतिम पड़ाव तक कायम रहे। 1997 में उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया और उसी वर्ष हुए चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

साल 2002 में उन्होंने फिर जीत हासिल की और 2003 में पुनः पर्यटन मंत्री बने, लेकिन मतभेदों के चलते 2004 में उन्होंने एक साल के भीतर ही इस्तीफा दे दिया। वर्ष 2007 में उन्होंने एक चर्चित ऑडियो सीडी जारी कर हिमाचल की राजनीति में हलचल मचा दी थी। वर्ष 2007 में कांग्रेस छोड़कर वे बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए। बसपा प्रमुख मायावती ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया और मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया, हालांकि इस चुनाव में उन्हें पराजय मिली।

कांग्रेस में वापसी के बाद 2012 का चुनाव हारने के बावजूद वीरभद्र सिंह ने उन्हें पर्यटन निगम का उपाध्यक्ष बनाया। इस कार्यकाल के दौरान उन्होंने अभिनेत्री कंगना रनौत को हिमाचल टूरिज्म का ब्रांड एंबेसडर बनाने की वकालत की थी। 2017 में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली।

अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम पड़ाव में, वर्ष 2022 में उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की मौजूदगी में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की खुले मंचों से सराहना की। वर्ष 2024 में उन्होंने रिज मैदान पर वीरभद्र सिंह की प्रतिमा लगाने का विरोध किया था, हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया था कि वीरभद्र सिंह एक दूरदर्शी नेता थे। दोनों नेताओं ने बिशप कॉटन स्कूल शिमला में साथ पढ़ाई की थी और छात्र जीवन से ही एक-दूसरे को जानते थे।

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