DSP Vijay Raghuvanshi Case: डीएसपी विजय कुमार रघुवंशी से जुड़े कथित जातिगत उत्पीड़न और प्रशासनिक भेदभाव के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने हिमाचल प्रदेश पुलिस के शीर्ष नेतृत्व के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग के सदस्य डॉ. पार्थ बिस्वास के समक्ष हुई सुनवाई में पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी की लगातार अनुपस्थिति और शिकायतकर्ता के खिलाफ की गई प्रशासनिक कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त तुलनात्मक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जाने पर सवाल उठाए गए। आयोग ने संबंधित अधिकारियों से मामले के सभी पहलुओं पर स्पष्ट जवाब और आवश्यक दस्तावेज पेश करने को कहा है।
आयोग के अनुसार, बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद डीजीपी अशोक तिवारी व्यक्तिगत रूप से सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए। उनकी अनुपस्थिति से छूट के लिए कोई पूर्व वैध अनुरोध भी प्रस्तुत नहीं किया गया था। आयोग ने इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस मुख्यालय यह साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य देने में विफल रहा कि शिकायतकर्ता के विरुद्ध की गई प्रशासनिक कार्रवाई न्यायसंगत और गैर-भेदभावपूर्ण थी। विशेष रूप से, समान परिस्थितियों में अन्य अधिकारियों के साथ किए गए व्यवहार का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
उल्लेखनीय है कि मामले में शिमला में तैनात डीएसपी विजय कुमार रघुवंशी ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर जातिगत उत्पीड़न, संस्थागत भेदभाव और पद का दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्हें योजनाबद्ध तरीके से पेशेवर रूप से अलग-थलग किया गया, कठिन और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपे गए तथा पात्रता के बावजूद आवश्यक आधिकारिक सुविधाओं से वंचित रखा गया। ये आरोप शिकायतकर्ता के पक्ष में लगाए गए दावे हैं, जिनकी पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड और विभागीय जवाबों के आधार पर होनी है।
आयोग ने मामले की जांच के लिए प्रशासनिक रिकॉर्ड की विस्तृत जानकारी मांगी है। संबंधित अधिकारियों को डीएसपी के स्थानांतरण, कार्यभार ग्रहण करने, आवाजाही और तैनाती से जुड़े सभी आदेश तथा 5 नवंबर 2025 की मूल सरकारी अधिसूचना कालानुक्रमिक क्रम में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, संबंधित अवधि में स्थानांतरित किए गए समान स्थिति वाले अन्य हिमाचल प्रदेश पुलिस सेवा (HPPS) अधिकारियों का तुलनात्मक विवरण भी मांगा गया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शिकायतकर्ता के मामले में अपनाई गई प्रशासनिक प्रक्रिया सामान्य नियमों के अनुरूप थी या नहीं।
वाहन सुविधा को लेकर भी आयोग ने विभाग से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। पुलिस विभाग को बताना होगा कि क्या डीएसपी से वाहन वापस लेने के संबंध में कोई लिखित आदेश जारी किया गया था। इसके साथ ही, लागू वाहन आवंटन नीति का रिकॉर्ड भी प्रस्तुत करना होगा। आयोग ने शिकायतकर्ता को सौंपे गए कार्यों की प्रकृति और दायरे का विवरण मांगते हुए यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि उन्हें सार्थक जिम्मेदारियों से वंचित रखने और शारीरिक रूप से कठिन तथा क्षेत्र-आधारित कार्य सौंपने के आरोपों के संबंध में विभाग का क्या पक्ष है।
शिकायतकर्ता की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए आयोग ने उनकी रीढ़ की चोट और चिकित्सक की ओर से दी गई आराम की सलाह को प्राथमिकता देने पर जोर दिया है। आयोग ने सिफारिश की है कि उन्हें उनकी पात्रता के अनुसार सभी आधिकारिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और स्वास्थ्य स्थिति के अनुरूप उपयुक्त जिम्मेदारियां सौंपी जाएं। साथ ही, यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि जातिगत पृष्ठभूमि या आयोग में शिकायत दर्ज कराने के कारण उनके खिलाफ किसी प्रकार की दंडात्मक अथवा प्रतिशोधात्मक कार्रवाई न हो।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने संबंधित प्राधिकारियों को अगली सुनवाई में उपस्थित रहने और 15 दिनों के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट (ATR) प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अब मामले में पुलिस विभाग द्वारा पेश किए जाने वाले दस्तावेज, तुलनात्मक विवरण और आधिकारिक जवाब महत्वपूर्ण होंगे। इनसे शिकायतकर्ता के आरोपों तथा उसके विरुद्ध की गई प्रशासनिक कार्रवाई की परिस्थितियों का आकलन करने में मदद मिलेगी।


















