Himachal News: हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान न्यायपालिका की भूमिका और उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण बयान दिया है। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावलिया और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की उपस्थिति में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सरकार से कोई चूक या गलती होती है, तो न्यायालय को उसे सुधारने का पूरा अधिकार है, लेकिन न्यायालय को स्वयं नए नियम बनाने का अधिकार नहीं है।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपने संबोधन में सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और अदालती फैसलों से उत्पन्न आर्थिक वित्तीय दबावों का ब्योरा दिया। उन्होंने बताया कि प्रदेश के कुल खजाने का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा केवल सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन भुगतान पर खर्च होता है। इस वित्तीय भार को कम करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि कोई भी चुनी हुई सरकार अपने कर्मचारियों को उनके वित्तीय लाभों से वंचित नहीं रखना चाहती और खजाने की स्थिति का ध्यान रखना बेहद आवश्यक होता है।
मुख्यमंत्री ने भर्ती नियमों और अदालती आदेशों के कारण उत्पन्न होने वाली जटिलताओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कई बार अदालतों के ऐसे आदेश आ जाते हैं, जिनसे भर्ती नियमों से जुड़े मामले सीधे प्रभावित होते हैं। यद्यपि भर्ती नियमों को रद्द नहीं किया जाता, फिर भी भर्ती नियमों से बाहर जाकर वित्तीय लाभ देने के फैसले सुना दिए जाते हैं। ऐसे फैसलों से राज्य सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।
इस संदर्भ में वर्ष 2003 के एक पुराने मामले का उदाहरण देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि तत्कालीन सरकार ने फैसला किया था कि अनुबंध कर्मचारियों को वरिष्ठता और इंक्रीमेंट नहीं मिलेंगे। हालांकि, करीब 20 साल बाद अदालत ने कर्मचारियों को वित्तीय लाभ देने का फैसला सुना दिया, जबकि भर्ती नियमों में ऐसा कोई प्रावधान उस समय भी नहीं था और आज भी नहीं है। इस प्रकार के अदालती फैसलों से राज्य सरकार के सीमित वित्तीय संसाधनों पर अत्यधिक दबाव बनता है।
इसके साथ ही, मुख्यमंत्री सुक्खू ने खेल मैदानों के इस्तेमाल और स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन को लेकर हाई कोर्ट के एक आदेश पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश एक पहाड़ी राज्य है, जहां नए खेल मैदानों का निर्माण अत्यंत कठिन कार्य है। इसी कारण स्कूलों के मैदानों और सामुदायिक मैदानों का साझा इस्तेमाल किया जाता है, जहां स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आजादी के 80 साल बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि राज्य सरकार को स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए पांच लाख रुपये चुकाने पड़े। हाई कोर्ट ने इस शर्त के साथ सरकारी मैदान के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। सीएम सुक्खू ने कहा कि संविधान सभी को अधिकार देता है और सरकार संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही आगे की बातचीत करती है। सरकार को नियमों का पालन करने का निर्देश दिया जा सकता है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए मुख्यमंत्री को हाई कोर्ट आदेश दे, तो यह न्यायोचित नहीं है।
मुख्यमंत्री ने न्यायपालिका को लोकतंत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य आम नागरिकों और समाज के वंचित वर्गों को न्याय दिलाना है। संविधान के तीनों अंगों का काम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन जब न्यायिक निर्णयों के कारण सरकार के जनहित कार्यों में इस प्रकार की परिस्थितियां पैदा होती हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि इस बात पर विचार करना है कि न्याय करते समय संबंधित परिस्थितियों, मंशा और व्यापक जनहित को महत्व दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में न्याय केवल एक आदेश तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके साथ निष्पक्षता, विवेक और परिस्थितियों की समुचित समझ जुड़ी होनी चाहिए।



















