Navratri 2026: भारतीय संस्कृति की सनातन चेतना में नवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, अपितु शक्ति की उपासना, आत्मशुद्धि, साधना, संयम, श्रद्धा एवं लोकमंगल की दिव्य अभिव्यक्ति है। यह महापर्व हमें जीवन में व्याप्त तमाम विकारों का परित्याग कर सद्गुणों को आत्मसात् करने तथा अंतःकरण में निहित दिव्य चेतना को जाग्रत करने की प्रेरणा प्रदान करता है। माँ आदिशक्ति के नौ दिव्य स्वरूपों की आराधना का यह पावन अवसर संपूर्ण सृष्टि में निहित सृजनात्मक ऊर्जा, मातृत्व, करुणा, साहस एवं धर्मनिष्ठा के प्रति हमारी आस्था को और अधिक सुदृढ़ करता है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति को समस्त सृष्टि की मूल प्रेरणा तथा सृजन, संरक्षण एवं संहार की अधिष्ठात्री माना गया है। शक्ति के अभाव में शिव भी शव के समान माने जाते हैं। यह दार्शनिक अवधारणा इस सत्य को उद्घाटित करती है कि चेतना और ऊर्जा का समन्वय ही जीवन एवं जगत् की गतिशीलता का मूलाधार है।नवरात्रि इसी शाश्वत सत्य का उत्सव है, जो मनुष्य को बाह्य आडंबरों से ऊपर उठकर अपने अंतर्मन में निहित दिव्यता का साक्षात्कार करने का संदेश देता है।
देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों का स्मरण करते हुए शास्त्रों में कहा गया है—
प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः॥
माँ शैलपुत्री प्रकृति की स्थिरता एवं दृढ़ संकल्प की प्रतीक हैं। माँ ब्रह्मचारिणी तप, त्याग, साधना एवं आत्मसंयम का संदेश देती हैं। माँ चन्द्रघण्टा निर्भीकता और पराक्रम की अधिष्ठात्री हैं, जबकि माँ कूष्माण्डा सृजनात्मक ऊर्जा एवं जीवन के प्रकाश का प्रतीक हैं। माँ स्कन्दमाता वात्सल्य, ममत्व एवं संरक्षण की भावना को अभिव्यक्त करती हैं। माँ कात्यायनी अन्याय के प्रतिकार और धर्म की प्रतिष्ठा का संदेश देती हैं।
माँ कालरात्रि भय, अज्ञान एवं नकारात्मकता के विनाश की प्रतीक हैं। माँ महागौरी पवित्रता, शांति एवं निर्मलता का बोध कराती हैं, जबकि माँ सिद्धिदात्री साधना की पूर्णता तथा आध्यात्मिक सिद्धि का प्रतीक स्वरूप हैं। नवदुर्गा के ये नौ स्वरूप वस्तुतः मानवीय जीवन के नौ महत्त्वपूर्ण आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी उपासना का वास्तविक अभिप्राय केवल विधि-विधानपूर्वक पूजन करना नहीं, बल्कि इन दिव्य गुणों को अपने आचरण, विचार एवं व्यवहार में प्रतिष्ठित करना भी है।
नवरात्रि का मूल संदेश आत्मविजय है। मनुष्य के अंतर्मन में विद्यमान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मत्सर जैसे विकार उसकी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक बनते हैं। माँ भगवती की आराधना इन विकारों पर विजय प्राप्त करने, विवेक को जाग्रत करने तथा मन को सात्त्विक बनाने की प्रेरणा देती है। व्रत, उपवास, जप, ध्यान, स्वाध्याय एवं साधना इस पर्व की महत्त्वपूर्ण परंपराएँ हैं। इनका उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा के मध्य संतुलन स्थापित करना तथा व्यक्ति को आत्मानुशासन के पथ पर अग्रसर करना है।
उपवास का व्यापक आध्यात्मिक अर्थ केवल आहार का त्याग नहीं, अपितु दुर्विचारों, दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों से दूरी बनाकर सद्विचारों और सद्कर्मों को अपने जीवन में स्थान देना भी है। नवरात्रि हमें यह स्मरण कराती है कि वास्तविक विजय दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करने में नहीं, बल्कि स्वयं के अवगुणों पर नियंत्रण प्राप्त करने में निहित है। जिस दिन मनुष्य अपने अंतर्मन के अंधकार को ज्ञान, करुणा एवं विवेक के प्रकाश से आलोकित कर लेता है, उसी दिन उसके जीवन में शक्ति की वास्तविक प्रतिष्ठा होती है।
नवरात्रि का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष नारीशक्ति की प्रतिष्ठा है। भारतीय संस्कृति में नारी को सृजन, संवेदना, त्याग, करुणा, धैर्य एवं शक्ति की प्रतिमूर्ति के रूप में सम्मानित किया गया है। माँ दुर्गा के विविध स्वरूप इस तथ्य के प्रतीक हैं कि नारी केवल ममता और करुणा की प्रतिमूर्ति ही नहीं, अपितु अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाली अदम्य साहसशक्ति भी है।
नवरात्रि की सार्थकता तभी पूर्ण होती है, जब देवी की प्रतिमा के समक्ष नमन करने के साथ-साथ समाज की प्रत्येक नारी के सम्मान, सुरक्षा, स्वाभिमान एवं समान अवसरों के प्रति भी हमारी प्रतिबद्धता सुदृढ़ हो। कन्या पूजन की परंपरा हमें बालिकाओं में निहित दिव्यता का सम्मान करना सिखाती है। इस भावना को जीवन में उतारते हुए बालिकाओं की शिक्षा, उनके अधिकारों की रक्षा तथा महिलाओं के प्रति संवेदनशील और सम्मानपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना हमारा नैतिक दायित्व है।
देवी की आराधना का सर्वोच्च प्रतिफल यही है कि समाज में नारी को गरिमा, समानता एवं सम्मानपूर्ण जीवन प्राप्त हो तथा प्रत्येक बालिका को अपने स्वप्न साकार करने का अवसर मिले। भारतीय पर्व-परंपराएँ व्यक्तिगत आस्था को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने का कार्य करती हैं। नवरात्रि भी इसी व्यापक लोकमंगल की भावना से ओतप्रोत है। इस अवसर पर मंदिरों में होने वाले पूजन-अर्चन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, भजन-कीर्तन, सामूहिक आराधना एवं सेवा के विविध कार्य समाज में श्रद्धा, सहयोग, सद्भाव और एकात्मता की भावना को सुदृढ़ करते हैं।
माँ जगदम्बा की उपासना हमें यह प्रेरणा देती है कि हमारा जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के वंचित, पीड़ित, असहाय एवं जरूरतमंद व्यक्तियों के कल्याण के लिए भी समर्पित हो। भूखे को भोजन, निराश्रित को आश्रय, अशिक्षित को शिक्षा तथा पीड़ित को संबल प्रदान करना भी लोकमंगल की उसी भावना का व्यावहारिक स्वरूप है, जिसका संदेश हमारी आध्यात्मिक परंपराएँ देती हैं।
नवरात्रि हमें परस्पर वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष एवं संकीर्णता का परित्याग कर प्रेम, सद्भाव, सहिष्णुता और मानवीय संवेदनाओं को अपनाने की प्रेरणा देती है। जब धार्मिक आस्था मानवसेवा का रूप धारण कर लेती है, तब वह समाज के नैतिक उत्थान का सशक्त माध्यम बन जाती है।
वर्तमान युग में भौतिक प्रगति, प्रतिस्पर्धा, तनाव, नैतिक द्वंद्व एवं सामाजिक विघटन जैसी चुनौतियों के मध्य नवरात्रि का महत्त्व और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आज मनुष्य के पास संसाधनों की प्रचुरता है, किंतु मानसिक शांति, आत्मिक संतोष एवं पारस्परिक संवेदनशीलता का अभाव अनेक स्तरों पर अनुभव किया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में नवरात्रि का आध्यात्मिक अनुशासन व्यक्ति को आत्मचिंतन, मानसिक संतुलन एवं सकारात्मक जीवनदृष्टि की ओर प्रेरित करता है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग संरक्षण के लिए होना चाहिए, दमन के लिए नहीं; ज्ञान का उद्देश्य विवेक का विकास होना चाहिए, अहंकार की वृद्धि नहीं; और समृद्धि का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उससे समाज का व्यापक कल्याण सुनिश्चित हो। पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय, नारी सम्मान, नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा मानवीय संवेदनाओं का विस्तार भी शक्ति-उपासना की व्यापक भावना से जुड़े हुए हैं। प्रकृति को मातृस्वरूप मानने वाली भारतीय दृष्टि हमें उसके संरक्षण एवं संवर्धन का दायित्व भी सौंपती है।
अतः नवरात्रि के अवसर पर पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, स्वच्छता, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व को अपने आचरण का अभिन्न अंग बनाना समय की आवश्यकता है। नवरात्रि का वास्तविक उत्सव तभी सार्थक होगा, जब माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों से प्रेरित सद्गुण हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनें और हमारी जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन परिलक्षित हो।
माँ शक्ति की महिमा का गुणगान करते हुए दुर्गा सप्तशती में प्रार्थना की गई है—
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
अर्थात् जय प्रदान करने वाली, मंगलमयी, कालस्वरूपा, कल्याणकारिणी, समस्त जगत् का धारण-पोषण करने वाली तथा क्षमा एवं कल्याण की अधिष्ठात्री माँ भगवती को हमारा बारंबार नमन है।
इसी प्रकार देवी की करुणा एवं कृपा का स्मरण करते हुए कहा गया है—
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
यह स्तुति माँ भगवती की कृपा, संरक्षण एवं शरणागतवत्सलता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करती है। भक्त का विश्वास है कि माँ की शरण में प्राप्त आस्था उसे विपत्तियों का सामना करने का संबल प्रदान करती है तथा जीवन में धैर्य, आशा एवं सकारात्मकता का संचार करती है।
नवरात्रि के इस पावन अवसर पर हमारी प्रार्थना है कि माँ जगदम्बा समस्त प्राणियों के जीवन में सुख, शांति, आरोग्य, समृद्धि एवं सद्बुद्धि का संचार करें। समाज में व्याप्त अज्ञान, अन्याय, वैमनस्य एवं दुर्भावनाओं का अंत हो तथा मानवता, करुणा, सद्भाव एवं परस्पर सहयोग की भावना पुष्पित-पल्लवित हो।
नवरात्रि भारतीय संस्कृति की वह दिव्य साधना है, जिसमें भक्ति के साथ शक्ति, श्रद्धा के साथ साधना, उपासना के साथ आत्मानुशासन तथा आध्यात्मिक चेतना के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वय दिखाई देता है। यह महापर्व हमें स्मरण कराता है कि माँ दुर्गा की वास्तविक आराधना केवल मंदिरों में दीप प्रज्वलित करने तक सीमित नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन में सदाचार, करुणा, सत्य, साहस एवं सेवा का दीप प्रज्वलित करने में निहित है। जब हम अपने आचरण में पवित्रता, विचारों में उदात्तता, व्यवहार में विनम्रता और कर्मों में लोककल्याण की भावना धारण करते हैं, तभी नवरात्रि की आध्यात्मिक चेतना हमारे जीवन में साकार होती है।
माँ शक्ति के नौ स्वरूप हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संतुलन, विवेक, साहस एवं सकारात्मकता का पथ दिखाते हैं।आइए, इस पावन महापर्व पर हम संकल्प लें कि नारी का सम्मान करेंगे, समाज में सद्भाव बढ़ाएँगे, असहायों की सहायता करेंगे, प्रकृति का संरक्षण करेंगे तथा अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए राष्ट्र एवं समाज के उत्थान में योगदान देंगे।
माँ भगवती, माँ दुर्गा एवं माँ जगदम्बा के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन। ज्ञान, भक्ति एवं शक्ति की त्रिवेणी से हमारा जीवन आलोकित हो। माँ आदिशक्ति का दिव्य वरदहस्त सदैव हम सभी पर बना रहे तथा संपूर्ण विश्व शांति, समृद्धि, सद्भाव एवं मंगलभाव से परिपूर्ण हो।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
लेखक: डॉ. सुरेन्द्र शर्मा



















