KSLF 2026: हिमाचल प्रदेश के कसौली क्लब में शुक्रवार को 15वें खुशवंत सिंह लिटफेस्ट (KSLF) 2026 की शुरुआत हो गई। इस प्रतिष्ठित आयोजन में भाग लेने पहुंचे पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) मनोज मुकुंद नरवणे ने ‘केएसएलएफ फॉरएवर यंग’ की शुरुआत की। इसके बाद नरवणे ने मीडिया से बातचीत में विदेश नीति, देश में चल रहे प्रदर्शनों, अग्निपथ योजना, रक्षा आत्मनिर्भरता और अपनी किताब तक कई मुद्दों पर बेबाक राय रखी।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में पुराने गठबंधन टूट रहे हैं और यह तय करना मुश्किल है कि कौन लंबे समय का दोस्त है और कौन थोड़े समय का। उन्होंने कहा कि “एक पुराना दोस्त दो नए दोस्तों से बेहतर है।” वहीं देश में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों और बदलाव की मांगों पर जनरल नरवणे ने समाज की तुलना एक ‘प्रेशर कुकर’ से की। उन्होंने कहा कि यदि आप प्रेशर कुकर की भाप निकलने का रास्ता पूरी तरह बंद कर देंगे, तो वह फटेगा ही।

कूटनीति और विदेश नीति: “कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं”
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समीकरणों पर बात करते हुए पूर्व सेना प्रमुख ने दो-टूक शब्दों में कहा कि दुनिया में कोई भी देश किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं। रूस का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हमें यह याद रखना चाहिए कि मुश्किल समय में कौन सा देश हमारे साथ खड़ा था। उन्होंने इसकी तुलना निजी जीवन से करते हुए कहा कि अच्छे समय में सभी साथ होते हैं, लेकिन असल मदद संकट के समय ही समझ आती है।
चीन के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा कि हर स्थिति को दुश्मनी के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। चीन के साथ भारत की प्रतिस्पर्धा व्यापार, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक प्रभाव के स्तर पर है, जो एक हद तक सकारात्मक भी है। उन्होंने इसकी तुलना दो कंपनियों के बीच टेंडर की होड़ से की, जहां एक जीतता है और दूसरा हारता है, लेकिन वे एक-दूसरे के दुश्मन नहीं बन जाते। भारत को पाकिस्तान और चीन सहित सभी देशों के साथ बातचीत की स्थिति में हमेशा रहना चाहिए।
नरवणे ने कहा कि भारत को सबके साथ “बातचीत की स्थिति” में रहना चाहिए, चाहे पाकिस्तान हो, चीन हो या कोई और देश। उन्होंने कहा कि ईरान में अमेरिका के बमबारी करने के बावजूद बातचीत चल रही है, रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई के साथ भी बातचीत जारी है, और बैक चैनल हो या आधिकारिक चैनल, संवाद का रास्ता हमेशा खुला रहता है।
सवाल उठा कि ईरान जैसे पुराने दोस्त के साथ भारत दोस्ती का हक़ अदा करने में पीछे रहा या नहीं। नरवणे ने इससे इनकार नहीं किया कि भारत “कूटनीतिक रस्सी पर चल रहा है।” उन्होंने कहा कि पड़ोस में पिछले पाँच सालों में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में उथल-पुथल हुई, कई संघर्ष एक साथ चले, फिर भी भारत की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, इसलिए “सब कुछ ग़लत नहीं हो सकता।” उन्होंने कहा, “मुझे लगता है हम अच्छा काम कर रहे हैं।”
घरेलू प्रदर्शन और सामाजिक दबाव पर अहम टिप्पणी
हाल ही में देश में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों और बदलाव की मांगों पर जनरल नरवणे ने समाज की तुलना एक ‘प्रेशर कुकर’ से की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अपनी बात रखना या बोलना कोई गुनाह नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि आप प्रेशर कुकर की भाप निकलने का रास्ता पूरी तरह बंद कर देंगे, तो वह फटेगा ही। इसलिए विरोध प्रदर्शनों को चलने देना चाहिए और साथ ही समाज में दबाव बढ़ने के असली कारणों पर विचार कर उनकी सुनवाई भी करनी चाहिए।
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल यह कह देना सही नहीं है कि हम सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं, इसलिए हमारी मांग तुरंत पूरी होनी चाहिए। इसके लिए एक निश्चित कानूनी प्रक्रिया और उचित माध्यम का होना आवश्यक है। नागरिक अपनी बात रख सकते हैं, लेकिन अपनी मनमानी नहीं कर सकते। विविधता के सवाल पर उन्होंने कहा कि उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हमारी संस्कृति और भाषा भले ही अलग हो, लेकिन यही विविधता हमारी असली ताकत है।
सेना और राजनीति
पूर्व सैनिकों के राजनीतिक विचारों को लेकर जनता में मोहभंग के सवाल पर नरवणे ने व्यक्ति और संगठन में फ़र्क़ बताया। उन्होंने कहा कि सेना संगठन के रूप में अराजनीतिक है, “थी, है और रहेगी”, और राजनीति में दख़ल नहीं देगी। पर व्यक्ति के रूप में हर सैनिक को वोट देने का हक़ है और उसकी अपनी पसंद हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सेना में सब तरह के लोग आते हैं और सबके साथ एक जैसा व्यवहार होता है।
अग्निपथ योजना और रक्षा आत्मनिर्भरता पर समीक्षा
अग्निपथ योजना में सुधार की गुंजाइश पर बोलते हुए पूर्व सेना प्रमुख ने कहा कि दुनिया की कोई भी नीति शत-प्रतिशत सही नहीं होती। नीतियों में बदलाव किसी प्रकार की भावना या दबाव में नहीं, बल्कि तथ्यों, आंकड़ों और फील्ड से मिल रहे फीडबैक के आधार पर होने चाहिए। उन्होंने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि जब देश का संविधान सौ से अधिक बार बदला जा सकता है, तो किसी योजना में भी आवश्यकतानुसार संशोधन किए जा सकते हैं।
आत्मनिर्भरता: “R&D पर उतना ज़ोर नहीं दिया”
नरवणे ने माना कि सेना अब भी बहुत-सी चीज़ें आयात करती है, हालाँकि काफ़ी कुछ “मेड इन इंडिया” हुआ है। उन्होंने कहा कि अपने पैरों पर खड़े होने का “हाई टाइम” 50 साल पहले था, अब यह और ज़रूरी हो गया है। उनके अनुसार भारत ने अपने R&D पर उतना ज़ोर नहीं दिया जितना देना चाहिए था, इसलिए वह अब भी “कैच-अप” खेल रहा है। उन्होंने कहा कि आगे निर्भरता घटाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों पर शोध करना होगा और यह देखना होगा कि कल क्या चाहिए होगा।
इसरो में निजीकरण और नियंत्रण पर उठे सवाल पर उन्होंने कहा कि जब से रक्षा में नागरिक उद्योग शामिल हुए हैं, तब से इसमें रफ़्तार आई है। दशकों तक यह केवल रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों के पास था, पर अब L&T, अडानी डिफ़ेंस, भारत फ़ोर्ज जैसी बड़ी कंपनियाँ और पारस डिफ़ेंस जैसे स्टार्टअप आ गए हैं। सरकार की हिस्सेदारी के सवाल पर उन्होंने कहा कि निजी कंपनियों को भी कारोबार चाहिए, इसलिए साझेदारी होगी ही।
विवादित किताब पर बोले मैं आगे बढ़ चूका
मीडिया से बातचीत में वे अपनी विवादित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ पर जवाब देने से बचते नजर आए। नरवणे ने दो किताबें लिखे जाने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पहली किताब “कैंटोनमेंट कॉन्स्पिरेसी” पर पहले बात हो चुकी है और दूसरी पर वे अगले दिन यानी कल होने वाले अपने सत्र में बात करेंगे। जिस किताब के लिए “इतना हंगामा हुआ” उस पर उन्होंने कहा, “पुरानी बातें छोड़ो, आगे देखना चाहिए।” प्रकाशक के जवाब के बारे में पूछे जाने पर भी उन्होंने कहा कि वे आगे बढ़ चुके हैं। हालांकि, किताब अभी भी पब्लिशर के पास ही है



















