Chandra Dosh Upay: ऋग्वेद में कहा गया है कि ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत:’, अर्थात चंद्रमा जातक के मन का स्वामी है। ज्योतिषीय गणनाओं में चंद्रमा की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह सीधे तौर पर मनुष्य की संवेदनाओं, मानसिक स्वास्थ्य और सुख-शांति को प्रभावित करता है। यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में चंद्रमा कमजोर होता है, तो वह छोटी-छोटी बातों पर विचलित होने लगता है और नकारात्मक विचारों से घिरा रहता है।
ज्योतिष शास्त्र में देह और मन के तालमेल को समझने के लिए जन्म लग्न और चंद्र लग्न दोनों का विश्लेषण किया जाता है। यदि जन्म लग्न को शरीर माना जाए, तो चंद्र लग्न उस शरीर का मन है। बिना मन के देह का कोई अस्तित्व नहीं होता, इसीलिए लग्न के साथ-साथ चंद्रमा की स्थिति देखना अनिवार्य है। चंद्रमा ग्रहों में सबसे छोटा है, लेकिन इसकी गति सबसे तीव्र है। जहां शनि एक राशि पार करने में ढाई वर्ष लेता है, वहीं चंद्रमा मात्र सवा दो दिन में राशि परिवर्तन कर लेता है।
मनुष्य के जीवन में आने वाले शुभ और अशुभ समय का निर्धारण विंशोत्तरी, योगिनी और अष्टोतरी जैसी दशाओं से होता है, जो पूर्णतः चंद्रमा की गति पर आधारित हैं। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, जातक की महादशा उसी नक्षत्र के स्वामी ग्रह से प्रारंभ होती है। उदाहरण के तौर पर, अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले की दशा केतु से और भरणी नक्षत्र वाले की शुक्र से शुरू होती है। ग्रहों के गोचर का फल भी चंद्र कुंडली से ही देखा जाता है।
चंद्रमा का प्रभाव न केवल मनुष्य पर, बल्कि पूरी पृथ्वी पर व्यापक है। समुद्र में आने वाला ज्वार-भाटा चंद्रमा की आकर्षण शक्ति का ही परिणाम है। चूंकि मानव शरीर में भी 60 प्रतिशत से अधिक जल तत्व होता है, इसलिए चंद्रमा की बदलती कलाओं का प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। चंद्रमा श्वसन तंत्र और रक्त का कारक भी है, इसलिए इसकी प्रतिकूल स्थिति दमा जैसी स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है।
कुंडली में अशुभ चंद्रमा के लक्षण बहुत स्पष्ट होते हैं। इसके कारण माता को कष्ट या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। घर में पानी की कमी होना, नलकूपों का सूख जाना या दूध देने वाले पशुओं की अकाल मृत्यु भी चंद्र दोष के संकेत हैं। मानसिक स्तर पर यह स्मृति दोष, अत्यधिक भावुकता, आत्महत्या के विचार और लगातार सर्दी-जुकाम जैसी परेशानियां पैदा करता है। जब चंद्रमा कुंडली के 6, 8 या 12वें भाव में अकेला होता है, तो वह अत्यंत कमजोर माना जाता है।
चंद्र दोष के निवारण के लिए सोमवार का दिन और भगवान शिव की उपासना सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया है, इसलिए उन्हें चंद्रमा का देवता कहा जाता है। सोमवार के दिन शिवलिंग पर कच्चा दूध अर्पित करना और ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘ॐ सों सोमाय नमः’ मंत्र का जाप करना कुंडली में चंद्रमा को बल प्रदान करता है। इससे मन की व्याकुलता शांत होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
धातुओं में चांदी को चंद्रमा का प्रतीक माना गया है। चंद्र दोष से पीड़ित व्यक्ति को सोमवार के दिन दाहिने हाथ की कनिष्ठा उंगली में चांदी की अंगूठी पहननी चाहिए या गले में चांदी का चंद्रमा लॉकेट धारण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, सोमवार की रात चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य देना और उनके दर्शन करना सकारात्मक विचारों के संचार में सहायक होता है। सफेद वस्तुओं जैसे चावल, चीनी, दूध, सफेद चंदन या सफेद वस्त्रों का दान करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है।
अंततः, चंद्रमा की शुभ स्थिति व्यक्ति को कल्पनाशील, धैर्यवान और आत्मविश्वासी बनाती है। यदि आप भी अज्ञात भय, अवसाद या एकाग्रता की कमी से जूझ रहे हैं, तो सोमवार का व्रत रखना और नमक का त्याग करना एक प्रभावी उपाय हो सकता है। चंद्रमा को मजबूत कर न केवल मानसिक शांति प्राप्त की जा सकती है, बल्कि जीवन में भौतिक सुख और ऐश्वर्य का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
इसके अलावा कुछ अन्य उपाय भी है जैसे सोमवार की रात चंद्रोदय के समय चंद्रमा का अर्घ्य दें और दर्शन करें। मान्यता है कि ऐसा करने मन की व्याकुलता शांत होती है और सकारात्मक विचारों का संचार होता है। सोमवार के दिन किसी जरूरतमंद को चावल, चीनी, दूध, सफेद चंदन या सफेद वस्त्रों का दान करें। इन चीजों का दान करने से चंद्र दोष दूर होता है और चंद्रमा की स्थिति कुंडली में मजबूत होती है। सोमवार की रात को चंद्रमा के मंत्र ‘ॐ सों सोमाय नमः’ का जाप करें। इस मंत्र का जाप करने से चंद्र दोष का प्रभाव कम होता है।
















