Himachal Dev Culture: हिमाचल प्रदेश की समृद्ध संस्कृति और देव परंपरा यहां के मेलों और त्योहारों में साफ दिखाई देती है। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेले लोगों के लिए आस्था, खुशी और आपसी भाईचारे का प्रतीक हैं। कुल्लू जिला के बंजार उपमंडल की तीर्थन घाटी भी अपनी समृद्ध देव संस्कृति और पारंपरिक लोक परंपराओं के लिए विशेष पहचान रखती है।
हर साल तीर्थन घाटी के केंद्र गुशैनी में आश्विन माह के 10 प्रविष्टे को आयोजित होने वाला ब्रेलंगा मेला इसी समृद्ध देव संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस वर्ष भी एक दिवसीय ब्रेलंगा मेले का आयोजन धूमधाम और धार्मिक उत्साह के साथ किया गया। मेले में तीर्थन घाटी के विभिन्न गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीणों के साथ कुछ पर्यटकों ने भी भाग लिया।
मेले में तीर्थन घाटी की आराध्य देवी गाड़ा दुर्गा के अलावा गांव पेखड़ी के देवता लोमश ऋषि, गांव नाहीं के देवता चौरासी सिद्ध, गांव तिंदर के देवता लक्ष्मी नारायण, गांव फरियाडी के देवता लक्ष्मी नारायण और गांव जन्हार के देवता विमु नाग सहित कई देवी-देवताओं ने अपने-अपने सैकड़ों हारियानों के साथ शिरकत की।
देव मिलन रहा आकर्षण का केंद्र
ब्रेलंगा मेले का सबसे विशेष आकर्षण विभिन्न गांवों से पहुंचे देवी-देवताओं के देवरथों का पारंपरिक देव मिलन रहा। देवी-देवताओं के आगमन के साथ ही पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से पूरा गुशैनी क्षेत्र देवमय हो उठा। देवरथों के साथ पहुंचे हारियानों और देवलुओं की मौजूदगी ने मेले की धार्मिक एवं सांस्कृतिक छटा को और बढ़ा दिया।
माता की पालकी के प्रवेश के बाद होता है देव मिलन
ब्रेलंगा मेले की एक महत्वपूर्ण परंपरा यह है कि गुशैनी में माता गाड़ा दुर्गा की पालकी के प्रवेश से पहले अन्य देवताओं का आगमन नहीं होता। माता की पालकी के मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद ही अन्य देवी-देवता अपने देवलुओं और हारियानों के साथ ढोल-नगाड़ों तथा पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों के बीच देव मिलन में शामिल होते हैं।
देव मिलन और पूजा-अर्चना की धार्मिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद मेले में पारंपरिक लोक नृत्य नाटी का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ग्रामीणों ने वाद्ययंत्रों की धुन पर नाटी डालकर तीर्थन की लोक संस्कृति और परंपराओं की सुंदर झलक प्रस्तुत की।
ब्रेलंगा मेले ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि आधुनिकता और पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के बावजूद तीर्थन घाटी के लोग अपनी सदियों पुरानी देव परंपरा, लोक संस्कृति और सामाजिक एकता को संजोए हुए हैं। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने के साथ-साथ घाटी की सांस्कृतिक पहचान को देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।


















