Himachal Panchayat Vendor System News: हिमाचल प्रदेश की पंचायती राज संस्थाओं में वर्तमान में संचालित वेंडर प्रणाली को लेकर प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों से कड़ा विरोध सामने आ रहा है। इस व्यवस्था की व्यावहारिक समस्याओं को रेखांकित करते हुए प्रदेश सरकार से मामले में तुरंत संज्ञान लेने की मांग जोरों से उठ रही है। जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का आरोप है कि मौजूदा नियमों की वजह से पंचायतों के विकास कार्यों में बाधा आ रही है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है।
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह से इस प्रणाली में आवश्यक संशोधन करने की मांग की गई है, ताकि पंचायतों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। वर्तमान व्यवस्था पर धरातल से मिल रही जानकारियों के अनुसार इस प्रक्रिया में भारी कमीशनखोरी पनप रही है। कई पंचायतों में वेंडर सिर्फ कागजों तक सीमित हैं और 5% से 10% या उससे अधिक का मोटा कमीशन लेकर फर्जी बिल उपलब्ध करवा रहे हैं, जबकि वास्तविक आपूर्ति पंचायत प्रतिनिधि या उनके करीबी लोग खुद कर रहे हैं।

इस व्यवस्था में नियमों की अनदेखी का एक बड़ा मामला रिश्तेदारों को वेंडर बनाने से जुड़ा है। प्रावधान न होने के बावजूद कई प्रतिनिधि अपने रिश्तेदारों को वेंडर बनवा रहे हैं। इस फर्जीवाड़े और अनियममितताओं को रोकने के लिए आवेदन के समय 2 से 3 लाख रुपये की सिक्योरिटी डिपॉजिट राशि अनिवार्य करने की मांग की गई है।
प्रदेश की कुछ पंचायतों ने फर्जी वेंडरों को बाहर रखने और किसी भी विवाद से बचने के लिए वेंडरों से दो से तीन लाख रुपये की सुरक्षा राशि लेनी शुरू की है, जिस पर वेंडर को ब्याज मिलने का भी प्रावधान रखा गया है। इसे एक सकारात्मक और स्वागत योग्य कदम माना जा रहा है। कर चोरी और फर्जीवाड़े को रोकने के लिए वेंडरों के जीएसटी नंबर के सख्त सत्यापन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
आबकारी एवं कराधान विभाग के माध्यम से यह जांच की जानी चाहिए कि जीएसटी नंबर वास्तव में निर्माण सामग्री की आपूर्ति के लिए ही जारी हुआ है या किसी अन्य कारोबार के लिए, और वेंडर का टैक्स रिकॉर्ड साफ है या नहीं। कई बार विभाग से डिफॉल्टर घोषित लोग भी पंचायतों में वेंडर बनने में कामयाब हो जाते हैं। इसके साथ ही, पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए पंचायत से तय शुल्क पर आवेदन फॉर्म उपलब्ध कराने की भी मांग की गई है। इसके अलावा आवेदन जमा करने के लिए ऑनलाइन या बाय पोस्ट जमा करने कि मांग कि गई है।
पंचायत कार्यों में वित्तीय गबन का एक अन्य जरिया जनरल फंड के तहत होने वाले निर्माण कार्य हैं। इन कार्यों में रेत और सीमेंट को छोड़कर अन्य निर्माण सामग्री को मजदूरी के मद में दर्शा दिया जाता है। इस तरह से सामग्री को लेबर में दिखाने की वजह से न तो राज्य सरकार को जीएसटी प्राप्त होता है और न ही माइनिंग शुल्क मिलता है। इस पूरी व्यवस्था से सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है, जिसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाना अनिवार्य है।
इस व्यवस्था में सुधार के लिए व्यापक कदम उठाना बेहद आवश्यक है। सबसे पहले, पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु हर पंचायत में वेंडर सूची, उनके रेट और आपूर्ति की गई सामग्री का पूरा विवरण पंचायत भवन के नोटिस बोर्ड पर लगाने के साथ-साथ ग्राम सभा में नियमित रूप से प्रकाशित किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए फर्जी बिल देने वाले, कमीशन लेने वाले या कार्य में डिफॉल्ट करने वाले वेंडरों को तुरंत ब्लैकलिस्ट किया जाए और इस सूची को पूरे प्रदेश में साझा किया जाए ताकि वे अन्यत्र काम न पा सकें।
इसके साथ ही, हितों के टकराव को रोकने के लिए सख्त नियम लागू होने चाहिए। न सिर्फ रिश्तेदार, बल्कि पंचायत प्रतिनिधि, सचिव, उनके परिवार या किसी भी करीबी व्यक्ति का वेंडरशिप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित पूरी तरह प्रतिबंधित हो; आवेदन के समय इसकी अनिवार्य स्व-घोषणा ली जाए और झूठी घोषणा पाए जाने पर आपराधिक कार्रवाई की जाए।
आर्थिक पारदर्शिता और राजस्व वृद्धि के लिए रेत-सीमेंट सहित सभी सामग्रियों का GST और माइनिंग शुल्क सहित पूर्ण बिल अनिवार्य किया जाना चाहिए, साथ ही लेबर के नाम पर फर्जी सामग्री दर्शाने के खेल पर पूरी तरह रोक लगे। अंत में, सिर्फ कागजी या नाममात्र के वेंडर बनने से रोकने के लिए केवल सिक्योरिटी राशि ही नहीं, बल्कि पिछले 1-2 वर्षों का टर्नओवर, स्टॉक क्षमता और वास्तविक व्यापार के ठोस प्रमाण (जैसे गोदाम का भौतिक सत्यापन या वैध रजिस्ट्रेशन) की शर्त अनिवार्य की जानी चाहिए।


















