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Kasauli International Public School, Sanwara (Shimla Hills)

Exclusive! सरकार जी, स्कूल भवन बनाने के पैसे नही थे, तो बना हुआ परिसर क्यों तुडवा दिया..?

Exclusive! सरकार जी, स्कूल भवन बनाने के पैसे नही थे, तो बना हुआ परिसर क्यों तुडवा दिया..?
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Exclusive News: आप सभी ने “आ बैल मुझे मार!” वाली कहावत सुनी तो ही होगी। इसका अर्थ है कि बिना सोचे-समझे ऐसा काम करना, जो पहले से मौजूद चीजों को भी नुकसान पहुंचाए और स्थिति को और बदतर बना दे। कुछ ऐसा ही नजारा आजकल सुख की सरकार में देखने को मिल रहा है। दरअसल, हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार, जो व्यवस्था परिवर्तन के बड़े-बड़े दावे करती है, ने राजकीय प्राथमिक पाठशाला गुनाई को अव्यवस्था में डाल कर बच्चों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया है।

उल्लेखनीय है कि कसौली विधानसभा के अंतर्गत आने वाली इस पाठशाला में लगभग 8 कमरे और बरामदा सहित दो मंजिला भवन था। जो आसपास लगते क्षेत्र के सैंकड़ों बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने का आश्रय दे रहा था। इस भवन की निचली मंजिल की छत और ऊपर के दो कमरों को खराब हालत बताकर गिरवा देना तो समझ आता है लेकिन लेकिन निचली मजिल में बने 5 कमरों की पत्थर और ईंटों की मजबूत दीवारें , जो कई दशकों से मजबूती स्थिति में थी, उसे भी जानबूझकर ध्वस्त करवा दिया गया।

इस सारे प्रकरण में सबसे बड़ी दिलचस्प बात यह है कि यह सब, तब हुआ, जब सरकार के पास स्कूल भवन निर्माण के लिए न तो बजट का कोई प्रावधान था और न ही इसके निर्माण के लिए कोई योजना प्रस्तावित। ऐसे में बिना सोचे-समझे इस भवन को गिरा देना अपने आप में ही कई सवाल खड़े करता है। आज तक सरकार न तो नया भवन बना सकी है और न ही बच्चों की शिक्षा की ओर ध्यान दिया है। नतीजा? लगभग दो साल बाद भी नर्सरी से पांचवीं कक्षा तक के मासूम बच्चे अब मंदिर की धर्मशाला और एक किराए के एक तंग कमरों में पढ़ने को मजबूर हैं। जिसका भाड़ा भी वसूला जाता है।

सनातन धर्म की पवित्रता का प्रतीक मंदिर भले ही बच्चों को आश्रय दे रहा हो, लेकिन सुक्खू सरकार और उसके अधिकारियों की लापरवाही ने शिक्षा के मंदिर को खंडहर तो दूर, मौके पर भवन का एक पत्थर भी बाकी नहीं छोड़ा। हमेशा आर्थिक तंगी का रोना रोने वाली सुक्खू सरकार ने न जाने क्यों बिना सोचे-समझे स्कूल की दोनों मंजिलों को पूरी तरह ध्वस्त करवा दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि निचली मंजिल की दीवारें इतनी मजबूत थीं कि उन्हें बचाकर लेंटर डालकर नया भवन बनाया जा सकता था। लेकिन सरकार और अधिकारियों ने स्कूल को तुड़वाकर इसकी सुध लेना ही छोड़ दिया।

उल्लेखनीय है कि प्रदेश में आई आपदा के दौरान हिमाचल सरकार के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी और स्थानीय विधायक विनोद सुल्तानपुरी ने इस भवन का मुआयना किया था। उस दौरान मंत्री और अधिकारयों के बीच स्कूल भवन तोड़ने को लेकर चर्चा हुई थी जिसमे लोक निर्माण के अधिकारयों और खुद मंत्री ने भी माना था की निचली दीवारें मजबूत पत्थर की बनी है, केवल उपरली मंजिल और निचली मंजिल की छत डालकर इसको बनाया जाए। हालांकि बाद में कुछ और ही हुआ।

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सरकार की उपेक्षा का शिकार हुआ यह स्कूल अपनी भवन की खाली जगह और बदहाल स्थिति को दर्शाता है, लेकिन रही सही कसर स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) ने पूरी कर दी, जिसने स्कूल में दो दशक पुरानी पानी की टंकी को बिना किसी ठोस कारण के ही तुड़वा दिया। इस टंकी को दोबारा बनवाने में करीब दो लाख रुपये से अधिक का खर्च आएगा, लेकिन न तो सरकार के पास स्कूल भवन बनाने के लिए पैसा है और न ही SMC के पास टंकी तोड़े जाने का कोई जवाब।

स्कूल के एक अध्यापक से जब इस बारे में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हमें इसकी जरूरत नहीं थी। स्कूल प्रबंधन समिति में बात हुई, तो इसे तोड़कर एक टीन का शेड बनाने की बात हुई। हालांकि, जब इसको लेकर कोई ठोस कारण पूछा गया, तो कोई तार्किक उत्तर नहीं मिला। हालांकि उन्होंने इतना कहा कहा कि जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया तो हमने तोडना बंद कर दिया।

वहीं, इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने भी कड़ा विरोध किया। उनका सवाल है, “जब स्कूल का भवन ही नहीं बन सका, तो बनी-बनाई टंकी क्यों तोड़ी गई?” लोगों ने आरोप लगाया है कि कुछ SMC सदस्यों और स्कूल स्टाफ की मिलीभगत से यह काम किया गया। एक टीन के ढांचे के लिए मजबूत टंकी को ध्वस्त करना समझ से परे है। विरोध के बावजूद तोड़ने वालों ने कोई जवाब नहीं दिया।

पिछले साल हिमाचल में आई आपदा के दौरान राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने स्कूल का दौरा किया था। उन्होंने छत की खराब स्थिति को तो माना था, लेकिन पत्थर की दीवारों को मजबूत बताया था। इसके बावजूद, पूरे भवन को गिरा दिया गया। अगर निचली मंजिल की दीवारें होतीं, तो लोगों से सहयोग लेकर इस पर छत डालने का काम किया जा सकता था। लेकिन अब पूरे परिसर को बनाना हम लोगों के बस की बात नहीं है। यह तो सरकार ही करा सकती है, लेकिन वह सुध नहीं ले रही। नतीजा, अब बच्चे मंदिर की धर्मशाला के एक कमरे में पढ़ने को मजबूर हैं, जहां न तो पर्याप्त जगह है और न ही पढ़ाई का माहौल।

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क्या बोले उप निदेशक प्रारंभिक शिक्षा

वहीं, इस मामले को लेकर उप निदेशक, प्रारंभिक शिक्षा, सोलन, मोहिंदर पित्रा से बात की गई, तो उन्होंने कहा कि यह मामला मेरे संज्ञान में है। उन्होंने बताया कि मेरे यहां पदभार लेने से पहले ही स्कूल भवन को ध्वस्त कर दिया गया था। हम इसकी जांच कर रहे हैं कि किन परिस्थितियों में निचली दीवारों को भी गिराया गया।

भवन निर्माण के समय पर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि हमने फाइल सरकार को भेज दी है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कब मंजूरी मिलेगी, यह कहना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि इस भवन के लिए 40 लाख रुपये की राशि मांगी गई है, जिसमें केवल दो या तीन कमरे का भवन बनेगा। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जब बजट का कोई प्रावधान ही नहीं था, तो इस भवन को गिराना ही नहीं चाहिए था। जब नए स्कूल भवन की योजना तैयार हो जाती और सरकार से मंजूरी मिल जाती, तब इसे गिराया जाना चाहिए था।

निर्माण की उम्मीदों का रास्ता बहुत लंबा ……..!

राजकीय प्राथमिक पाठशाला गुनाई का भवन और पानी की टंकी बिना किसी योजना या बजट के ध्वस्त करना सुक्खू सरकार और इसके निकम्मे अधिकारियों की घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को बेनकाब करता है। आज यदि उस भवन के समकक्ष परिसर बनाना हो, तो इसके लिए कई करोड़ रुपये की राशि चाहिए। लेकिन वर्तमान हालात इतने बदतर हैं कि निर्माण की उम्मीदें कब और कैसे पूरी होंगी, यह अनिश्चित और असंभव-सा प्रतीत होता है। सही मायने में इन बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में मूलभूत सुविधाएँ न देकर सुक्खू सरकार 21वीं सदी में भी उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है।

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