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हिमाचल में अनियंत्रित विकास और अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, CEC करेगी 9 मुख्य मुद्दों की जांच

Supreme Court Shimla Green Belt: हिमाचल प्रदेश में अनियंत्रित निर्माण और प्राकृतिक आपदाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सख्त कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने शिमला के ग्रीन बेल्ट और पारिस्थितिकी संरक्षण से जुड़े नौ प्रमुख मुद्दों की जांच चरणबद्ध तरीके से CEC को सौंप दी है।
Published on: 9 August 2026
 Himachal Pradesh Environmental Crisis: हिमाचल में अनियंत्रित विकास और अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, CEC करेगी 9 मुख्य मुद्दों की जांच

 Himachal Pradesh Environmental Crisis: हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं, अनियंत्रित निर्माण कार्यों और लगातार बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य से जुड़े कई गंभीर पर्यावरण संबंधी मुद्दों को जांच के लिए ‘सेंट्रली एम्पावर्ड कमिटी’ (CEC) के पास भेज दिया है। इसमें शिमला के संवेदनशील और अधिसूचित ग्रीन बेल्ट इलाके मुख्य रूप से शामिल हैं।

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने निर्देश दिया कि CEC इन तमाम मामलों की जांच चरणबद्ध तरीके से करे और एक बार में तीन मुद्दों पर काम करते हुए अपनी अंतरिम रिपोर्ट अदालत के सामने प्रस्तुत करे।

अदालत द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, जांच प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए CEC राज्य सरकार की विभिन्न संस्थाओं के साथ नियमित बैठकें करेगी। आवश्यकता पड़ने पर कमिटी राज्य के अधिकारियों या किसी भी अन्य संबंधित एजेंसी से आधिकारिक रिकॉर्ड और प्रासंगिक डेटा मांग सकती है। इसके अलावा, राज्य सरकार और उसकी सभी संस्थाओं को निर्देश दिया गया है कि वे CEC को मैनपावर, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और सभी आवश्यक जानकारियां प्रदान करके पूरा सहयोग करें।

यह कमिटी शिमला प्लानिंग एरिया के इकोलॉजिकल संरक्षण से जुड़े मामलों पर भी अलग से सिफारिशें और रिपोर्ट सौंपेगी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण आदेश योगेंद्र मोहन सेनगुप्ता द्वारा दायर दो इंटरलोक्यूटरी (अंतरिम) याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया है।

उल्लेखनीय है कि इस पूरी प्रक्रिया को निष्पक्ष और सटीक बनाने के लिए CEC को यह अधिकार दिया गया है कि वह संबंधित विषयों के विशेषज्ञों और तकनीकी एजेंसियों की मदद ले सकती है। आवश्यकता महसूस होने पर कमिटी के सदस्य मौके पर जाकर साइट इंस्पेक्शन और फील्ड विजिट भी कर सकते हैं। बता दें कि यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर शुरू किया गया था।

गौरतलब है कि बीते कुछ सालों में हिमाचल प्रदेश में अचानक आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के कारण जनधन का भारी नुकसान हुआ था, जिसके बाद अदालत ने इस मामले पर संज्ञान लिया। पिछले साल सितंबर में भी सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह राज्य की नाजुक पारिस्थितिकी और पर्यावरण की स्थिति पर विस्तृत जवाब दाखिल करे। उस दौरान जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने चिंता जताते हुए कहा था कि हिमाचल प्रदेश और पूरा हिमालयी क्षेत्र “गंभीर अस्तित्व के संकट” का सामना कर रहा है, क्योंकि अनियंत्रित विकास गतिविधियों ने प्राकृतिक कमजोरियों को और ज्यादा बढ़ा दिया है।

इससे पहले भी शीर्ष अदालत ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य में बार-बार होने वाले भूस्खलन, ढहती इमारतों और धंसती सड़कों के लिए ‘इंसान, न कि प्रकृति’ जिम्मेदार हैं। अदालत के अनुसार, बिना सोच-समझकर शुरू की गई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, फोर-लेन हाईवे का निर्माण, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और बहुमंजिला इमारतों का ढांचा इस आपदा में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है।

गौरतलब है कि सितंबर के आदेश के तहत कोर्ट ने एमिकस क्यूरी और सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर (एडवोकेट आकाशी लोढ़ा की मदद से) द्वारा तैयार की गई एक विस्तृत प्रश्नावली को अपनाया था। इसमें राज्य सरकार से ज़ोनिंग, वनों और पेड़ों के दायरे, कम्पेन्सेटरी एफ़ॉरेस्टेशन, जलवायु परिवर्तन, सड़कों की स्थिति, खनन, भारी मशीनरी के इस्तेमाल और पर्यटन से जुड़े निर्माण पर जवाब मांगा गया था।

राज्य सरकार ने अदालत में अपना जवाब दाखिल तो किया, लेकिन एमिकस क्यूरी ने दावा किया कि सरकार द्वारा दिया गया जवाब उस समय के प्रासंगिक डेटा पर आधारित नहीं था। इसके साथ ही उन्होंने याचिकाकर्ता सेनगुप्ता के आवेदनों की ओर ध्यान आकर्षित किया, जिनमें शिमला प्लानिंग एरिया और शिमला के नोटिफाइड ग्रीन बेल्ट क्षेत्रों में हो रहे नुकसान पर गहरी चिंता जताई गई थी। याचिकाओं में शिमला के ग्रीन बेल्ट क्षेत्रों की सुरक्षा और उनकी बहाली के लिए स्पष्ट निर्देश देने की मांग की गई थी।

याचिका में एनजीटी के वर्ष 2017 के उस ऐतिहासिक फैसले का भी संदर्भ दिया गया, जिसमें शिमला के संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर कड़े नियम लागू किए गए थे और राज्य को एक सुरक्षित विकास योजना बनाने का निर्देश दिया गया था। हालांकि राज्य सरकार ने उस फैसले के खिलाफ अपील की थी, लेकिन 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सैद्धांतिक रूप से विकास योजना को बरकरार रखते हुए ग्रीन बेल्ट क्षेत्रों की सुरक्षा जारी रखने का आदेश दिया था।

याचिकाकर्ता सेनगुप्ता का आरोप है कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, शिमला के ग्रीन बेल्ट क्षेत्रों में अनधिकृत निर्माण, पहाड़ियों की कटाई, ऊपरी मिट्टी को हटाने और पेड़ों को काटने का काम लगातार जारी है। इससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है। याचिका में नए निर्माण पर यथास्थिति (status quo) बनाए रखने और अवैध ढांचों को तुरंत हटाने के निर्देश देने का आग्रह किया गया था।

चूंकि एमिकस क्यूरी ने स्पष्ट किया कि कुल 9 प्रमुख विषय हैं जिन पर विस्तृत विचार की आवश्यकता है, इसलिए अदालत ने इन्हें CEC को भेजने का निर्णय लिया। CEC और राज्य सरकार दोनों पक्षों ने इस जांच प्रक्रिया पर अपनी सहमति व्यक्त की है।

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