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Maternity Benefit Act : हिमाचल हाईकोर्ट ने प्रेग्नेंट महिलाओं को आवश्यक सहायता और सुविधाएं प्रदान करने का दिया निर्देश

Maternity Benefit Act: हिमाचल हाईकोर्ट ने प्रेग्नेंट महिलाओं को आवश्यक सहायता और सुविधाएं प्रदान करने का दिया निर्देश

शिमला |
Maternity Benefit Act: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (Himachal Pradesh High Court) ने डिलीवरी के दौरान महिलाओं के अधिकारों को बरकरार रखने और आवश्यक सहायता और सुविधाएं प्रदान करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने लोरेटो कॉन्वेंट तारा हॉल स्कूल (Loreto Convent Tara Hall School) की प्रबंध समिति (Managing Committee) के सचिव बनाम शारू गुप्ता और अन्य के मामले में यह आदेश दिया है। जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर की पीठ ने यह फैसला दिया है।

यह मामला प्रतिवादी शारू गुप्ता (Sharu Gupta) से संबंधित है, जिन्हें अनुबंध के आधार पर सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था, बाद में, परीक्षण अवधि के दौरान उन्हें गर्भावस्था का सामना करना पड़ा। स्कूल प्रबंधन ने उनकी सेवाओं को समाप्त करते हुए असंतुष्टि का आरोप लगाया। “लेकिन श्रम निरीक्षक और अपीलीय प्राधिकरण ने मैटर्निटी लाभ प्रदान करने से बचने के लिए समाप्ति को रणनीतिक कदम माना।”

लेकिन याचिकाकर्ता के स्कूल प्रबंधन ने फैसले पर आपत्ति जताते हुए तर्क दिया कि शारू गुप्ता अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में स्कूल को सूचित करने में विफल रही और उन्होंने मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन (Application for Maternity Leave) नहीं किया। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी बर्खास्तगी सेवा नियमों के अनुसार थी और उनके कथित असंतोषजनक सेवा रिकॉर्ड के कारण उचित थी।”

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जवाब में शारू ने जोर देकर कहा कि स्कूल को उसकी प्रेग्नेंसी के बारे में पता था, जैसा कि उसकी पिछली छुट्टियों से पता चलता है। उसने कहा कि उसने मौखिक रूप से शीतकालीन अवकाश के बाद मैटरनिटी लीव पर जाने का इरादा बताया और मैटरनिटी बेनेफिट देने से बचने के लिए उसे बर्खास्त कर दिया गया।

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जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर (Justice Vivek Singh Thakur) ने मामले से जुड़े उपलब्ध रिकॉर्ड की सावधानीपूर्वक जांच करने के बाद याचिकाकर्ता का दावा खारिज कर दिया कि शारू गुप्ता ने उन्हें अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में सूचित नहीं किया था। अदालत ने अपने फैसले में सुनीता बालियान बनाम निदेशक समाज कल्याण विभाग, एनसीटी नई दिल्ली सरकार (2007) मामले का हवाला भी।

मामले से जुड़े अन्य तथ्य जांचने और दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायालय ने स्कूल की अपील को खारिज कर दिया और निचले प्राधिकारी के आदेशों को बरकरार रखा। इसके अलावा, अदालत ने उसे बहाली के बदले 15 लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा दिया। साथ ही यह घोषणा की कि “मैटरनिटी बेनेफिट के अनुदान को विफल करने के किसी भी इरादे से गंभीरता से निपटा जाना चाहिए।

मामले में जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर की पीठ ने कहा, गर्भ धारण करना, बच्चे को जन्म देना और उसकी देखभाल करना न केवल महिला का मौलिक अधिकार (Fundamental Rights Of Women) है, बल्कि समाज के अस्तित्व के लिए उसके द्वारा निभाई जाने वाली पवित्र भूमिका भी है। इस कर्तव्य की कठिन प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उसे वे सुविधाएं दी जानी चाहिए।

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अदालत ने दर्ज किया, “मां बनने का अधिकार भी सबसे महत्वपूर्ण मानवाधिकारों में से एक है। इस अधिकार की हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए। इसलिए जहां भी लागू हो, मैटरनिटी बेनेफिट एक्ट (Maternity Benefit Act) के प्रावधानों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।”

पढ़े हिमाचल हाई कोर्ट का फैसला

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