DSP Vijay Raghuvanshi Caste Discrimination And Harassment Case: हिमाचल प्रदेश पुलिस में डीएसपी विजय रघुवंशी के साथ हुए कथित जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने कड़ा संज्ञान लिया है। आयोग ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को अद्यतन रिपोर्ट के साथ नई दिल्ली मुख्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है। इस प्रशासनिक विवाद के राष्ट्रीय पटल पर पहुंचने के बाद अब यह सवाल गहराने लगा है कि आखिर इस पूरे विवाद की मुख्य वजह क्या है और स्थितियां इतनी गंभीर कैसे हुईं।
दरअसल, यह विवाद 23 मई 2023 को जारी तबादला नीति के आदेश के बाद शुरू हुआ। इस नीति के तहत, तबादला होने पर अधिकारी को दो दिनों के भीतर कार्यमुक्त होना था और पाँच दिनों के भीतर नई तैनाती का पदभार ग्रहण करना था। इसी प्रक्रिया का पालन करते हुए तत्कालीन नियंत्रण अधिकारी (एसपी शिमला) ने डीएसपी विजय रघुवंशी को कार्यमुक्त कर दिया, जिसके बाद उन्होंने उसी दिन पांवटा साहिब उपमंडल में अपनी नई तैनाती पर कार्यभार संभाल लिया।

आरोप है कि सरकार की तरफ से ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था, जिसके तहत अधिकारियों को नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करने से पहले पुलिस महानिदेशक कार्यालय से अलग से ‘आवागमन आदेश’ (Movement Order) की प्रतीक्षा करनी पड़े। इसके बावजूद, जब डीएसपी विजय रघुवंशी पांवटा साहिब पहुंचे, तो कथित तौर पर स्थानीय थाना प्रभारी को उन्हें रोकने के लिए भेजा गया। इसके बाद पुलिस महानिदेशक द्वारा उन्हें फोन और संदेशों के माध्यम से धमकाने तथा सिरमौर एसपी द्वारा उनका पदभार स्वीकार न करने के आरोप भी सामने आए है।
आरोपों के मुताबिक इस मामले को और गंभीर बनाने वाला पहलू यह है कि तत्कालीन एसपी सिरमौर द्वारा दक्षिणी रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) को भेजी गई रिपोर्ट में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP), सीआईडी ज्ञानेश्वर सिंह पर भी संगीन आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वे डीएसपी विजय रघुवंशी की गतिविधियों की गैर-कानूनी तरीके से निगरानी (सर्विलांस) करवा रहे थे।
इन सभी गंभीर आरोपों के बाद इस पूरे घटनाक्रम से ऐसा प्रतीत होता है कि जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक की संपूर्ण पुलिस मशीनरी का इस्तेमाल डीएसपी विजय रघुवंशी को उनकी नई तैनाती का पदभार ग्रहण करने से रोकने के लिए किया गया।
इस पुरे मामले में एक कनिष्ठ अधिकारी, थाना प्रभारी को वरिष्ठ अधिकारी को रोकने के लिए भेजे जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। थाना प्रभारी का रोकने वाला कदम बेहद अपमानित करने वाला कदम था। इस मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि तत्कालीन डीएसपी मनविंद्र ठाकुर, जिनका स्थानांतरण होने के बाद विजय रघुवंशी को वहां पदस्थ किया जाना था, उन्हें उसी पद पर बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए।
कानूनी रूप से कार्यभार ग्रहण करने पर ही कार्रवाई की सिफारिश?
मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। 12 दिसंबर 2025 को महानिदेशक अशोक तिवारी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कथित तौर पर डीएसपी विजय रघुवंशी के निलंबन और उनके विरुद्ध विभागीय जांच शुरू करने की सिफारिश की गई। डीएसपी विजय रघुवंशी के तबादले और उसके बाद हुए इस घटनाक्रम ने अब एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि, क्या सरकार द्वारा विधिवत जारी तबादला आदेश का पालन करना भी किसी पुलिस अधिकारी के लिए अपराध बन सकता है?
इस मामले में लगाए गए आरोपों में डीजीपी द्वारा अपनाए गए इन तमाम तौर-तरीकों से यह प्रतीत होता है कि एक ऐसे व्यक्ति, जो स्वयं पुलिस अधिकारी है, अपमानित और प्रताड़ित करने के लिए असाधारण स्तर के प्रयास किए गए। किसी अधिकारी को उसकी विधिवत नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करने से रोकने के लिए स्वयं थाना प्रभारी का मौके पर पहुंचना और उसे ज्वाइन करने से रोकना, अपमानित करने की हद तक की गई कार्रवाई प्रतीत होती है। यह महज प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं, बल्कि अधिकारी की गरिमा और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले कृत्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
बता दें कि हिमाचल प्रदेश सरकार ने 40 से अधिक पुलिस अधिकारियों के सामान्य तबादले किए थे। 23 मई 2023 को जारी तबादला नीति के अनुसार, अधिकारी को निर्धारित अवधि में कार्यमुक्त होकर नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करना था। इसी प्रक्रिया के तहत एसपी शिमला ने डीएसपी विजय रघुवंशी को कार्यमुक्त किया और उन्होंने उसी दिन पांवटा साहिब में नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करने के लिए रिपोर्ट की।
यही से इस विवाद की शुरूवात हुई। आरोप है कि सरकार की ओर से ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ था कि विजय रघुवंशी नई तैनाती पर जाने से पहले पुलिस महानिदेशक कार्यालय से किसी अलग अनुमति या ‘मूवमेंट ऑर्डर’ की प्रतीक्षा करें। इसके बावजूद, जब वह पांवटा साहिब पहुंचे, तो उन्हें रोकने के लिए थाना स्तर के अधिकारी को भेजने का आरोप है। इतना ही नहीं कथित रूप से पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी द्वारा फोन और संदेशों के माध्यम से उन्हें धमकाने तथा एसपी सिरमौर द्वारा उनका कार्यभार स्वीकार नहीं करने के गंभीर आरोप हैं।
डीजीपी अशोक तिवारी पर सबसे बड़ा सवाल—आखिर किस आदेश के तहत रोका गया?
इस पूरे प्रकरण प्रशासनिक स्तर लगाए गए कथित जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के गंभीर आरोपों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल सीधे डीजीपी अशोक तिवारी की भूमिका को लेकर उठता है। यदि सरकार ने तबादला आदेश जारी किया था, नियंत्रण अधिकारी ने अधिकारी को विधिवत कार्यमुक्त किया था और अधिकारी निर्धारित प्रक्रिया के भीतर नई तैनाती पर पहुंच गया था, तो डीजीपी कार्यालय ने उसे रोकने का अधिकार किस नियम या आदेश के तहत प्रयोग किया?
यहां सबसे बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या कोई मौखिक निर्देश सरकारी तबादला आदेश को निष्प्रभावी कर सकता है?, क्या पुलिस महानिदेशक किसी अधिकारी को उसकी वैध नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करने से रोक सकते हैं, जबकि सरकार की ओर से ऐसा कोई लिखित आदेश मौजूद न हो?, और यदि यह प्रक्रिया नियमसम्मत थी, तो बाद में उसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश क्यों की गई?
6 नवंबर को दूसरों ने भी ज्वाइन किया, फिर निशाना केवल विजय रघुवंशी क्यों?
इस मामले में सबसे चुभने वाला प्रश्न 6 नवंबर 2025 से जुड़ा है। उपलब्ध कार्यालयीन रिकॉर्ड के अनुसार उसी दिन अन्य अधिकारियों ने भी अपनी नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण किया। लेकिन आरोप है कि डीएसपी विजय रघुवंशी के मामले में डीजीपी अशोक तिवारी ने अलग मानदंड अपनाते हुए उनके विरुद्ध प्रतिकूल रिपोर्ट तैयार की और 12 दिसंबर 2025 को उनके निलंबन तथा विभागीय जांच की सिफारिश तक कर दी।
यदि अन्य अधिकारी भी उसी प्रकार तबादला आदेश का पालन कर रहे थे, तो विजय रघुवंशी को ही विभागीय कार्रवाई के निशाने पर क्यों लिया गया?, यही वह मुख्य बिंदु है जो पूरे मामले को साधारण प्रशासनिक विवाद से निकालकर चुनिंदा कार्रवाई और कथित संस्थागत प्रताड़ना के सवाल तक ले जाता है।
‘ज्वाइन क्यों किया?’—क्या यही आरोप था?
मामले की सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह बताई जा रही है कि जिस अधिकारी ने सरकार के तबादला आदेश का पालन करते हुए नई तैनाती पर पहुंचने का प्रयास किया, उसी के विरुद्ध यह सवाल खड़ा कर दिया गया कि उसने नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण क्यों किया।
यदि यही कार्रवाई का आधार है, तो ये प्रश्न उठाना भी स्वाभाविक है—
- क्या सरकारी आदेश का पालन करना अब पुलिस अधिकारी के लिए अनुशासनहीनता है?
- या फिर वास्तविक समस्या यह थी कि विजय रघुवंशी ने उस पद पर जाकर कार्यभार ग्रहण करने की कोशिश की, जिसे कुछ प्रभावशाली अधिकारी किसी अन्य अधिकारी के पास बनाए रखना चाहते थे?
आरोप है कि विजय रघुवंशी के स्थान पर आने वाले अधिकारी मनविंद्र ठाकुर को उसी पद पर बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए। यदि यह आरोप सही है, तो यह पूरे प्रकरण की मंशा पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
एडीजीपी सीआईडी की कथित निगरानी का उल्लेख भी सवालों के घेरे में है।
एक अधिकारी को उसकी वैध पोस्टिंग पर जाने से रोकने के लिए जिला पुलिस से लेकर राज्य पुलिस मुख्यालय तक किस स्तर पर समन्वय हुआ, यह अब जांच का विषय है।
- क्या एक वैध तबादला आदेश को रोकने के लिए पूरी पुलिस मशीनरी सक्रिय कर दी गई थी?
- वाहन छीना गया, गवाहों पर कार्रवाई हुई, क्या यह महज संयोग था?
- आरोपों की श्रृंखला यहीं समाप्त नहीं होती। बाद में डीएसपी विजय रघुवंशी से उपलब्ध सरकारी वाहन वापस लिए जाने का आरोप भी सामने आया।
इतना ही नहीं, उनके पक्ष में सामने आने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई किए जाने के आरोप हैं। एएसआई पुनीत शर्मा का तबादला और बाद में उनका निलंबन तथा विभागीय कार्रवाई शुरू किए जाने को भी इसी क्रम में देखा जा रहा है। आरोप है कि उस समय उनकी माता गंभीर रूप से बीमार थीं। इसके बावजूद एएसआई पुनीत शर्मा का तबादला, निलंबन और विभागीय कार्रवाई शुरू किया जाना एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
यदि अलग-अलग घटनाओं को एक साथ देखा जाए, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या एक अधिकारी को अकेला करने के लिए प्रशासनिक और विभागीय साधनों का क्रमिक इस्तेमाल किया गया?
आयोग के सामने इन सवालों का क्या जवाब देंगे डीजीपी अशोक तिवारी ?
इस मामले का अगर गहराई से अध्यन किया जाए तो यह मामला अब केवल विजय रघुवंशी की व्यक्तिगत शिकायत नहीं रह गया है, बल्कि यह पुलिस व्यवस्था में समानता, निष्पक्षता और विधि के शासन का प्रश्न बन चुका है। जिसमे डीजीपी अशोक तिवारी की भूमिका पर विशेष रूप से ये प्रश्न उठते हैं:
- यदि तबादला आदेश वैध था, तो अधिकारी को नई तैनाती पर जाने से क्यों रोका गया?
- किस लिखित आदेश के आधार पर उन्हें रोका गया?
- यदि उनका कार्यभार ग्रहण करना नियमविरुद्ध था, तो उसी दिन या उसी अवधि में कार्यभार ग्रहण करने वाले अन्य अधिकारियों के विरुद्ध समान कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- 12 दिसंबर 2025 को उनके निलंबन और विभागीय जांच की सिफारिश का वास्तविक आधार क्या था?
- क्या अधिकारी के विरुद्ध पहले से प्रतिकूल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा था?
- क्या वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उनके विरुद्ध कार्रवाई के लिए अधीनस्थ अधिकारियों और अन्य संस्थागत संसाधनों का इस्तेमाल किया गया?
- और सबसे महत्वपूर्ण, क्या डीएसपी विजय रघुवंशी से इसलिए अलग व्यवहार किया गया क्योंकि वे समाज के कमजोर वर्ग से आते हैं?
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सामने अब असली परीक्षा
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष मामला पहुंचने के बाद अब यह तय होना है कि यह घटनाक्रम महज सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई थी या फिर चुनिंदा, भेदभावपूर्ण और कथित तौर पर जातिगत पूर्वाग्रह से प्रभावित संस्थागत उत्पीड़न का मामला।
हिमाचल सरकार के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है। यदि एक सरकारी अधिकारी विधिवत जारी आदेश का पालन करता है, अपने नियंत्रक अधिकारी से कार्यमुक्त होता है और नई तैनाती पर पहुंचता है, तो उसे बिना स्पष्ट नियमगत आधार के दोषी ठहराने का अधिकार किसे है?
कानून का शासन तभी सार्थक है जब वह सभी अधिकारियों पर समान रूप से लागू हो। डीजीपी का पद किसी अधिकारी को नियमों से ऊपर नहीं रखता और न ही किसी डीएसपी को नियमों से नीचे करता है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि विजय रघुवंशी ने पांवटा साहिब जाकर कार्यभार क्यों ग्रहण किया।
असल सवाल यह है कि , “जब सरकार ने भेजा था, नियंत्रक अधिकारी ने रिलीव किया था और नियमों में निर्धारित अवधि के भीतर अधिकारी नई जगह पहुंचा था, तो उसे रोकने और बाद में उसी कार्रवाई के लिए दंडित करने का आदेश किसने दिया, और क्यों?” इन सभी गंभीर आरोपों और सवालों का जवाब अब रिकॉर्ड, नियम और निष्पक्ष जांच से ही मिलना चाहिए।


















