Himachal News: देशभर के राजनीतिक मंचों से अक्सर सामाजिक न्याय, समान भागीदारी और समाज के वंचित वर्गों को प्रशासनिक व्यवस्था में उचित प्रतिनिधित्व देने की बड़ी-बड़ी बातें सुनने को मिलती हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी भी राष्ट्रीय स्तर पर लगातार दलित, पिछड़े और वंचित समाज की सरकारी और प्रशासनिक तंत्र में समान हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की पुरजोर वकालत करते रहे हैं।
लेकिन इस बीच एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कांग्रेस शासित राज्य हिमाचल प्रदेश में इन सिद्धांतों और दावों का जमीनी स्तर पर अक्षरशः पालन किया जा रहा है?, राज्य के प्रशासनिक गलियारों में काफी लंबे समय से यह गंभीर चर्चा चल रही है कि दलित समाज से संबंध रखने वाले कई वरिष्ठ आईएएस (IAS) और एचपीएएस (HPAS) अधिकारियों की प्रशासनिक स्तर पर अनदेखी की जा रही है।

इन अधिकारियों ने अपने जीवन में कड़े संघर्ष, गंभीर सामाजिक विषमताओं और अत्यंत कठिन प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं को पार करके प्रशासनिक सेवाओं में अपनी एक खास पहचान बनाई है। इसके बावजूद, वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में उन्हें उनकी वास्तविक क्षमता, योग्यता और लंबे अनुभव के अनुरूप महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं मिल पा रही हैं।
राज्य के प्रशासनिक ढांचे पर नजर डालें तो यह बात सामने आती है कि कुछ दलित अधिकारियों को ऐसे विभागों में स्थानांतरित या नियुक्त कर दिया जाता है जहां नीति निर्माण यानी पॉलिसी मेकिंग या बड़े निर्णय लेने की भूमिका लगभग नगण्य यानी शून्य के बराबर होती है। वहीं दूसरी ओर, कुछ योग्य अधिकारियों को लंबे समय तक बिना किसी प्रभावी या मजबूत दायित्व के साइडलाइन करके रखा जाता है। यह स्थिति प्रशासनिक हल्कों में गहरी चिंता और असंतोष का विषय बनी हुई है।
यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति या किसी एक अधिकारी विशेष के व्यक्तिगत हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था में समान अवसर, निष्पक्षता और सामाजिक सम्मान से जुड़ा हुआ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मौलिक प्रश्न है। जब कोई अधिकारी अपनी कठिन मेहनत और अटूट योग्यता के बल पर देश और राज्य की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी नियुक्ति और उसे मिलने वाली जिम्मेदारियां भी उसकी व्यक्तिगत क्षमता के अनुरूप ही तय होनी चाहिए।
केवल औपचारिक रूप से कोई पद सौंप देना या किसी कम महत्व वाले विभाग की जिम्मेदारी देकर किसी सक्षम अधिकारी की प्रतिभा का सही उपयोग न करना पूरी तरह से अनुचित माना जा रहा है। ऐसा करना न केवल उस संबंधित अधिकारी की योग्यता के साथ सरासर अन्याय है, बल्कि यह खुद हिमाचल प्रदेश राज्य के व्यापक प्रशासनिक और जनहितों के भी पूरी तरह विपरीत है, क्योंकि इससे योग्य अधिकारियों की सेवाओं का लाभ राज्य को नहीं मिल पाता।
इस कड़वी वास्तविकता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों से आने वाले अनेक युवाओं को इन उच्च प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचने के लिए अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष कठिन संघर्ष में बिताने पड़ते हैं। ऐसे में, जब वे तमाम विपरीत परिस्थितियों को मात देकर इस सर्वोच्च मुकाम पर सफलता हासिल कर लेते हैं, तब उन्हें मुख्य प्रशासनिक और निर्णय लेने वाले महत्वपूर्ण पदों से दूर रखना राज्य की पूरी कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
इन तमाम परिस्थितियों के बीच अब सीधे तौर पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से कुछ तीखे और स्पष्ट सवाल पूछे जा रहे हैं। पहला सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार ने कभी इस बात की आत्म-समीक्षा की है कि वर्तमान में दलित समाज से आने वाले कितने आईएएस और एचपीएएस अधिकारियों के पास वास्तव में प्रभावी विभाग और महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां मौजूद हैं? इसके साथ ही, वर्तमान में ऐसे कितने अधिकारी हैं जिन्हें काफी लंबे समय से बिना किसी प्रभावी दायित्व के केवल फाइलों तक सीमित रखा गया है?
दूसरा बड़ा सवाल सुक्खू सरकार से यह है कि क्या राज्य में विभिन्न सरकारी विभागों का आवंटन केवल प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निष्पक्ष रूप से किया गया है, या फिर इसमें सभी वर्गों के लिए समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांत का पूरी तरह से पालन किया गया है? यदि वर्तमान राज्य सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय, समानता और वंचितों के अधिकारों की पुरजोर पक्षधर है, जैसा कि राजनीतिक मंचों से दावा किया जाता है, तो फिर इन काबिल अधिकारियों की प्रशासनिक भूमिका इतनी सीमित और कमजोर क्यों दिखाई दे रही है?
यह पूरा विश्लेषण या विमर्श किसी भी व्यक्ति विशेष के पक्ष में या किसी के विरोध में खड़ा नजर नहीं आता, बल्कि यह विशुद्ध रूप से प्रशासनिक स्तर पर समान अवसर, नीतिगत न्याय और समाज के हर वर्ग के लिए उचित सामाजिक सम्मान की एक लोकतांत्रिक मांग है। यदि हिमाचल प्रदेश सरकार सचमुच सामाजिक न्याय और बराबरी के सिद्धांतों में अटूट विश्वास रखती है, तो उसे इस पूरे संवेदनशील विषय पर अत्यंत पारदर्शी तरीके से अपनी स्थिति को जनता के सामने स्पष्ट करनी चाहिए।
सभी योग्य और अनुभवी अधिकारियों को उनकी वास्तविक कार्यक्षमता के अनुरूप मुख्यधारा की जिम्मेदारियां सौंपना केवल एक सामान्य प्रशासनिक आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि यह हमारे पवित्र संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों का सच्चा सम्मान भी है। अब वह समय आ चुका है जब राज्य सरकार को खुलकर यह स्पष्ट करना होगा कि क्या हिमाचल प्रदेश में योग्यता के वास्तविक आधार पर जिम्मेदारियां दी जा रही हैं, या फिर कुछ विशेष वर्गों के अधिकारियों की अनमोल प्रतिभा को केवल फाइलों की धूल फांकने के लिए छोड़ दिया गया है।
















