PM CM Removal Custody Bill: देश की राजनीति में भूचाल लाने वाले 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर बड़ी खबर सामने आ रही है। इंडियन एक्सप्रेस हिंदी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बेहद संवेदनशील विधेयक की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति आगामी 17 जुलाई को अपनी अंतिम रिपोर्ट को स्वीकार कर सकती है। इसके बाद, 20 जुलाई से शुरू होने जा रहे संसद के मानसून सत्र में इस विधेयक को पटल पर रखा जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चौतरफा विरोध के बावजूद बिल के सबसे विवादित और कड़े प्रावधानों को जस का तस बनाए रखने की पूरी संभावना है। बता दें कि इस प्रस्तावित कानून के मूल मसौदे के तहत, यदि देश के प्रधानमंत्री, किसी राज्य के मुख्यमंत्री या कोई भी केंद्रीय अथवा प्रांतीय मंत्री किसी ऐसे गंभीर अपराध में गिरफ्तार होते हैं जिसमें 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, और वे लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें अपने पद से हटना होगा।

उल्लेखनीय है कि यह विधेयक पिछले साल अगस्त में गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संसद में पेश किया गया था। इसकी गंभीरता को देखते हुए भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता में 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया था, जिसमें सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सदस्यों का बहुमत है।
समिति में सत्तापक्ष के अलावा AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी, NCP शरद पवार गुट की सुप्रिया सुले और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के एस निरंजन रेड्डी भी शामिल हैं। हालांकि, विपक्षी ‘इंडिया’ ब्लॉक के कई सदस्यों ने शुरुआत से ही जेपीसी की कार्यवाहियों का बहिष्कार किया था। विपक्ष की मुख्य दलील थी कि समिति में सत्ता पक्ष के पास भारी बहुमत होने के कारण उनकी आपत्तियों और सुझावों को अनसुना किया जा रहा है।
विपक्ष ने इस बिल को पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और भारतीय संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है। विपक्षी दलों की एक और बड़ी वैधानिक आपत्ति ‘नेचुरल जस्टिस’ के सिद्धांत को लेकर है। विपक्ष का स्पष्ट कहना है कि किसी जनप्रतिनिधि पर केवल आरोप तय होने या हिरासत में लिए जाने और अदालत द्वारा दोषी पाए जाने में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
महज पुलिस या जांच एजेंसी की हिरासत के आधार पर जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि को पद से हटाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत होगा। विपक्षी खेमे को यह गंभीर डर सता रहा है कि इस कानून का इस्तेमाल केंद्र सरकार द्वारा राजनीतिक प्रतिशोध और विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने के हथियार के रूप में किया जा सकता है।
दूसरी तरफ, नरेंद्र मोदी सरकार और ट्रेजरी बेंच की दलीलें बिल्कुल विपरीत हैं। सत्ता पक्ष का तर्क है कि 30 दिन की समयसीमा बेहद पर्याप्त होती है। इस अवधि के दौरान कोई भी आरोपी व्यक्ति कम से कम तीन बार अदालत में जमानत के लिए अर्जी दाखिल कर सकता है। अगर कोई व्यक्ति 30 दिनों के बाद भी न्यायिक या पुलिस हिरासत से रिहा नहीं हो पाता है, तो इतने लंबे समय तक उसका शीर्ष सार्वजनिक पद पर बने रहना नैतिक रूप से गलत है और इससे सार्वजनिक शुचिता पर सवाल उठते हैं।
सरकार इसे राजनीति को अपराधमुक्त करने और ‘क्लीन पॉलिटिक्स’ की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बता रही है। हालांकि, तीखे मतभेदों के बीच जेपीसी के भीतर सत्तारूढ़ गठबंधन, विपक्ष और तटस्थ दलों के बीच इस बात पर एक मौन सहमति बनती दिख रही है कि कानून के संभावित दुरुपयोग को रोका जाए। इसके लिए रिपोर्ट में कुछ कड़े सुरक्षात्मक प्रावधान जोड़े जाने का सुझाव दिया जा सकता है, ताकि कोई भी सरकार इसका राजनीतिक लाभ न उठा सके।
रिपोर्ट के मुताबिक समिति अपनी सिफारिशों में यह भी तय कर सकती है कि यह नियम किन विशिष्ट और जघन्य अपराधों की प्रकृति पर लागू होगा। बहरहाल, विपक्षी सांसद इस अंतिम रिपोर्ट पर अपना असहमति नोट दर्ज कराने की तैयारी में हैं, जिससे मानसून सत्र में भारी हंगामे के आसार साफ नजर आ रहे हैं।
















