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UP Home Guard Bharti: “भर्ती परीक्षा या चुनौती?” 100 करोड़ की फीस और 41 हजार पदों की दौड़, क्या है सच?

Uttar Pradesh Home Guard Bharti: उत्तर प्रदेश होम गार्ड भर्ती परीक्षा के आंकड़ों ने लाखों युवाओं को सकते में डाल दिया है। 25 लाख आवेदकों से एकत्रित 100 करोड़ की भारी-भरकम राशि और परीक्षा में शामिल होने वालों की घटती संख्या व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठा रही है।
Published on: 29 April 2026
UP Home Guard Bharti: "भर्ती परीक्षा या चुनौती?" 100 करोड़ की फीस और 41 हजार पदों की दौड़, क्या है सच?

UP Home Guard Bharti: उत्तर प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुई होम गार्ड भर्ती परीक्षा ने राज्य के युवाओं के बीच एक नई बहस को जन्म दिया है। इस भर्ती प्रक्रिया में कुल 41,424 रिक्त पदों के लिए लगभग 25 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। प्रत्येक अभ्यर्थी से लिए गए ₹400 के आवेदन शुल्क के कारण कुल जमा राशि करीब ₹100 करोड़ तक पहुंच गई है।

इतनी बड़ी धनराशि का संचय होने के बाद अब यह सवाल उठने लगे हैं कि इस धन का उपयोग किस प्रकार और किन व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है। क्या अभ्यर्थियों को इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता के बारे में कोई सटीक जानकारी दी जाती है?

41,424 पदों के लिए 25 लाख से अधिक आवेदनों का आना केवल कड़ी प्रतिस्पर्धा का ही संकेत नहीं है, बल्कि यह देश में व्याप्त बेरोजगारी की गहरी समस्या को भी उजागर करता है। आज का युवा सीमित विकल्पों के कारण हर अवसर को भुनाने की जद्दोजहद में लगा है, भले ही वह पद उनकी वास्तविक योग्यता के अनुरूप हो या न हो। उच्च शिक्षित युवाओं का भी इन छोटे पदों के लिए आवेदन करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि रोजगार के अवसर युवाओं की संख्या के अनुपात में काफी कम हैं। यह स्थिति नीतिगत स्तर पर गहन समीक्षा की मांग करती है।

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि 25 लाख आवेदकों में से केवल 6 लाख अभ्यर्थी ही परीक्षा देने पहुंचे। 19 लाख अभ्यर्थियों का अनुपस्थित रहना प्रशासनिक तंत्र और अभ्यर्थियों की मानसिकता, दोनों पर सवालिया निशान लगाता है। क्या युवा हतोत्साहित होकर अपनी उम्मीदें खो रहे हैं, या फिर परीक्षा की व्यवस्था और प्रतिकूल परिस्थितियां उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर रही हैं? यह आंकड़ा उस छुपी हुई हताशा को दर्शाता है, जिसे अक्सर सरकारी आंकड़ों की चमक-धमक में अनदेखा कर दिया जाता है।

परीक्षा के कठिन स्तर को लेकर भी उम्मीदवारों में खासा आक्रोश है। कई अभ्यर्थियों का आरोप है कि प्रश्नपत्र का स्तर निर्धारित पाठ्यक्रम (सिलेबस) से काफी अधिक था। हालांकि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में चुनौती होना अनिवार्य है, लेकिन जब प्रश्नपत्र का स्तर तय सीमाओं से बाहर चला जाता है, तो यह मेहनत और परिणाम के बीच के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देता है। “जैसी तैयारी, वैसा परिणाम” का सिद्धांत तभी प्रभावी हो पाता है जब परीक्षा की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और पूर्व निर्धारित मानदंडों के अनुसार हो।

प्रश्नों की अत्यधिक जटिलता को लेकर भी अभ्यर्थियों ने अपनी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि जिस तरह के प्रश्न पूछे गए, वे अपेक्षित स्तर से कहीं अधिक कठिन थे। इस स्थिति ने न केवल युवाओं के आत्मविश्वास को डगमगाया है, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आवेदन शुल्क के रूप में दी गई ₹400 की राशि केवल एक शुल्क नहीं, बल्कि युवाओं के परिश्रम और उनके सीमित संसाधनों का निवेश है। यह निवेश उम्मीदों के साथ किया जाता है, जिसके बदले वे केवल पारदर्शिता और सुव्यवस्थित चयन प्रक्रिया की अपेक्षा रखते हैं।

अंत में, यह समझना आवश्यक है कि सरकारी भर्ती परीक्षाएं केवल किसी पद के लिए चयन का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि ये युवाओं के भविष्य और तंत्र के प्रति उनके भरोसे का आधार होती हैं। आवेदन शुल्क से लेकर परीक्षा के आयोजन और परिणाम तक की हर प्रक्रिया यदि न्यायसंगत और पारदर्शी हो, तभी युवाओं का विश्वास बना रह सकता है। प्रशासनिक व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना होगा कि युवाओं की कड़ी मेहनत का मूल्यांकन निष्पक्षता के साथ हो, ताकि भविष्य में वे पूर्ण ऊर्जा और उम्मीद के साथ आगे बढ़ सकें।

-हिमानी चौधरी, शोधार्थी-

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