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Historical Pauri Fair: प्राचीन संस्कृति की पहचान है त्रिलोकीनाथ पोरी मेला

Published on: 17 August 2024
Pori Fair Triloknath:

Historical Pauri Fair: हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहुल स्पीति के उदयपुर मंडल में स्थित त्रिलोकीनाथ धाम का पोरी मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह प्राचीन संस्कृति और परंपराओं का भी जीवंत उदाहरण है। हर साल अगस्त के तीसरे सप्ताह में आयोजित होने वाला यह मेला, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का अनूठा संयोजन पेश करता है, जो हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 त्रिलोकीनाथ धाम: धार्मिक महत्व

त्रिलोकीनाथ धाम, भगवान त्रिलोकीनाथ (शिव भगवान के तीन लोकों के स्वामी) का निवास स्थल माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण लगभग दसवीं शताब्दी में हुआ था और यह चंद्राभागा नदी के बाएं तट पर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ की मूर्ति की चार भुजाएँ हैं और मूर्ति के सिर पर एक अन्य मूर्ति भी विद्यमान है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे अवलोकितेश्वर के रूप में मानते हैं। यह मन्दिर न केवल हिंदू बल्कि बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए भी अत्यंत पवित्र है।

पोरी मेला: त्योहार की शुरुआत

पोरी मेला हर साल अगस्त के तीसरे सप्ताह में गर्मियों के दौरान मनाया जाता है। यह मेला धार्मिक श्रद्धा और उत्सव की गतिविधियों का अनूठा मिश्रण है। मेला शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले से ही तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। भक्तगण अपने घरों को छोड़कर इस पावन अवसर पर त्रिलोकीनाथ धाम की ओर निकलते हैं।

 शोभायात्रा और परिक्रमा

मेला का प्रमुख आकर्षण शोभायात्रा होती है, जो हिंसा गांव से शुरू होकर त्रिलोकीनाथ धाम तक जाती है। शोभायात्रा में स्थानीय महिला मंडल, सांस्कृतिक दल और धार्मिक वाद्य यंत्रों के साथ मधुर धुनों का प्रदर्शन किया जाता है। भक्तगण इस शोभायात्रा में शामिल होकर भगवान त्रिलोकीनाथ का गुणगान करते हैं।

यात्रा के दौरान, भक्तगण मंदिर की परिक्रमा गैलरी में तीन या सात चक्कर लगाते हैं, प्रार्थना के पहिये घुमाते हैं और मंत्र (ओम मणि पद्मे हम) का जाप करते हैं। यहाँ लगातार घी और सरसों के तेल के दीपक जलाए जाते हैं, और लोग दीपकों के लिए दान देते हैं, जिनमें से एक दीपक इतना बड़ा होता है कि उसमें 16 किलोग्राम घी/तेल रखा जा सकता है।

त्रिलोकीनाथ पोरी मेला हिमाचल प्रदेश की प्राचीन संस्कृति की पहचान है और यह हमें हमारे समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास की याद दिलाता है। यह मेला हर साल धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाया जाता है, जो स्थानीय समाज के जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

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