Fake Certificate Case: सुंदरनगर- हिमाचल प्रदेश मंडी जिला की एक विशेष अदालत ने जाली दस्तावेजों के आधार पर सरकारी सेवा का लाभ उठाने वाले एक पूर्व डिप्टी रेंजर की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने आरोपी प्रकाश चंद की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा को न्यायसंगत ठहराया है।
मामले की जानकारी के अनुसार, प्रकाश चंद ने वर्ष 1983 में हिमाचल प्रदेश राज्य वन निगम में बतौर दैनिक भोगी ‘टिम्बर वाचर’ के रूप में अपना करियर शुरू किया था। वर्ष 1991 में उसने विभाग के समक्ष स्वयं को गुज्जर समुदाय (अनुसूचित जनजाति) से संबंधित बताते हुए एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया। इसी प्रमाण पत्र के आधार पर उसकी सेवाओं को नियमित कर दिया गया। आरक्षित श्रेणी का अनुचित लाभ उठाकर वह पदोन्नति प्राप्त करते हुए डिप्टी रेंजर के पद तक पहुंच गया।
हालांकि धोखाधड़ी का यह मामला काफलोग निवासी जीत राम की शिकायत के बाद प्रकाश में आया। तत्कालीन एसडीएम सरकाघाट द्वारा की गई विस्तृत जांच में यह तथ्य सामने आया कि प्रकाश चंद वास्तव में राजपूत जाति से संबंध रखता है। जांच रिपोर्ट के मुताबिक, जिस क्रम संख्या का प्रमाण पत्र विभाग में जमा किया गया था, वह तहसील रिकॉर्ड में ‘बर्फी देवी’ नामक महिला के नाम पर दर्ज था।
इस मामले की सुनवाई के दौरान तत्कालीन कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने भी गवाही दी कि प्रमाण पत्र पर उनके हस्ताक्षर पूरी तरह फर्जी हैं। हालांकि, आरोपी पक्ष ने साक्ष्यों को अपर्याप्त बताते हुए दलील दी, लेकिन अदालत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि दोषी ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों का उपयोग कर विभाग को गुमराह किया। न्यायालय ने माना कि आरोपी ने उन संवैधानिक लाभों को हड़पा, जो केवल आरक्षित वर्ग के वास्तविक पात्र व्यक्तियों के लिए सुरक्षित थे। इस आदेश के बाद अब दोषी को जेल की सजा काटनी होगी।





















