Google News Preferred Source
साइड स्क्रोल मेनू

पैरों तले स्टूल खिसका और अरमान फंदे पे

कभी-कभी अरमान लटके रह जाते हैं फंदे पे और ज़िन्दगी का स्टूल खिसक जाता है। वर्षों का गुमान एक झटके में जब टूटता है तो सब बिखर जाता है। दर्द में कौन नहीं जी रहा ज़िन्दगी किसी के लिए आसान नहीं है बस सबकी दर्द झेलने की क्षमता अलग-अलग है। संघर्ष की भट्टी में तपने के बाद अपनी कई इच्छाएं मारने के बाद इंसान कहीं किसी मुकाम तक पहुंच पाता है। जाने कितने सपने बुने जाते हैं कई बार गिरना उठना फिर दौड़ना और कई बार सबको भाग्य समझकर हार जीत या तो स्वीकार कर लेता है या गुमनामी के अंधेरे में खो जाता है। कुछ दर्द शायद बांटने लायक नहीं होते हैं , कुछ का गवाह सिर्फ सनाटा होता है। कई बार विपरीत परिस्थितियों में खुद को संभाल लेते हैं और सारी बातें दिल से लगते भी नहीं। शरीर इतना ताकतवर है कि हथोड़े-छेनी की मार सह जाये और मन इतना कोमल है कि जीवा के बाणों से छलनी हो जाये। कई बार संघर्ष को अपने हाथों की रेखा में लिया जाता है। मन तो कई बार अपनी ही पीठ थपथपाकर उठ खड़ा होता है और कई बार “बस यार” मैं ही क्यों” बोलकर इतना टूट जाता है कि जैसे मृत्युशय्या पर हो। जिनके पास एक वक्त का खाना होता है वो भी दूसरे वक़्त की उमीद नहीं छोड़ता। परीक्षा, प्रेम और जीवन में असफलता से कोई निखर जाते हैं तो कोई बिखर। कभी-कभी ज़िन्दगी शहद लगती है, प्रकृति की हर एक आहट संगीत लगती है, कभी सिर्फ कानों को चीरता हुआ शोर। ऐसा नहीं है कि डिप्रेसड इन्सान एक दम अपने आप को खत्म कर लेता, वो जीने की हर सम्भव बजह की तलाश करता है, बस लोग समझ नहीं पाते। अंत में पैरों तले से उमीदों का स्टूल खिसक जाता है और अरमान फंदे पर लटक जाते हैं।

इसे भी पढ़ें:  यह समय समानता का है आयोगों के गठन का नहीं
YouTube video player
मुझे महिलाओं से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है। महिलाओं की ताकत, उनकी चुनौतियों और उनकी उपलब्धियों को उजागर करने में विश्वास करती हूँ। मेरे लेखन का उद्देश्य महिलाओं की आवाज़ को मजबूती से पेश करना और समाज में उनकी भूमिका को पहचान दिलाना है।

Join WhatsApp

Join Now

प्रजासत्ता के 10 साल