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Bahra University - Shimla Hills

इस बार 25,26,27 जून को होगा माँ शूलिनी मेला, 28 की सरकारी छुट्टी

Published on: 3 June 2021
इस बार 25,26,27 को होगा माँ शूलिनी मेला, 28 की सरकारी छुट्टी

प्रजासत्ता|
सोलन जिला का सुप्रसिद्ध राज्यस्तरीय शूलिनी मेला इस बार 25,26 व 27 जून को होगा जबकि 28 सरकारी छुट्टी होगी। बता दें कि सोलन शहर का नाम मां शूलिनी के नाम पर ही पड़ा है। यह मेला हर साल जून माह में मनाया जाता है। इस दौरान मां शूलिनी शहर के भ्रमण पर निकलती हैं व वापसी में अपनी बहन के पास दो दिन के लिए ठहरती हैं। इसके बाद अपने मंदिर स्थान पर वापस पहुंचती हैं, इसलिए इस मेले का आयोजन किया जाता है।

कोरोना संक्रमण को देखते हुए मेले का स्वरूप क्या होगा ये अभी कहना मुश्किल होगा। लेकिन हो सकता है कि पिछली बात की तरह ही सूक्ष्म रूप में माता अपनी बहन से मिलने जाए। मंदिर के पुजारी व माता के कल्याने ही इस बार इस रस्म की आदायगी कर सकते है। लेकिन इसको लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

माता शूलिनी मेला बदलते परिवेश के बावजूद यह मेला अपनी प्राचीन परंपरा को संजोए हुए है। मेले का इतिहास बघाट रियासत से जुड़ा है। माता शूलिनी बघाट रियासत के शासकों की कुल श्रेष्ठा देवी मानी जाती हैै। वर्तमान में माता शूलिनी का मंदिर सोलन शहर के दक्षिण में विद्यमान है। इस मंदिर में माता शूलिनी के अतिरिक्त शिरगुल देवता, माली देवता इत्यादि की प्रतिमाएं मौजूद हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार माता शूलिनी सात बहनों में से एक हैं। अन्य बहनें हिंगलाज देवी, जेठी ज्वाला जी, लुगासना देवी, नैना देवी और तारा देवी के नाम से विख्यात हैं।

माता शूलिनी देवी के नाम से सोलन शहर का नामकरण हुआ था जोकि मां शूलिनी की अपार कृपा से दिन-प्रतिदिन समृद्धि की ओर अग्रसर हो रहा है। सोलन नगर बघाट रियासत की राजधानी हुआ करती थी। इस रियासत की नींव राजा बिजली देव ने रखी थी। बारह घाटों से मिलकर बनने वाली बघाट रियासत का क्षेत्रफल 36 वर्ग मील में फैला हुआ था। इस रियासत की प्रारंभ में राजधानी जौणाजी, तदोपरांत कोटी और बाद में सोलन बनी। राजा दुर्गा सिंह इस रियासत के अंतिम शासक थे। रियासत के विभिन्न शासकों के काल से ही माता शूलिनी देवी का मेला लगता आ रहा है। जनश्रुति के अनुसार बघाट रियासत के शासक अपनी कुलश्रेष्ठा की प्रसन्नता के लिए मेले का आयोजन करते थे।

मां प्रसन्न हो तो दूर होते हैं प्रकोप
मान्यता है कि माता शूलिनी के प्रसन्न होने पर क्षेत्र में किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा या महामारी का प्रकोप नहीं होता है, बल्कि सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है। मेले की यह परंपरा आज भी कायम है। कालांतर में यह मेला केवल एक दिन ही अर्थात् आषाढ़ मास के दूसरे रविवार को शूलिनी माता के मंदिर के समीप खेतों में मनाया जाता था। सोलन जिला के अस्तित्व में आने के पश्चात् इसका सांस्कृतिक महत्व बनाए रखने तथा इसे और आकर्षक बनाने के अलावा पर्यटन की दृष्टि से बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान किया गया और इसे तीन दिवसीय उत्सव का दर्जा प्रदान किया गया है।

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