Edible Oil Price Hike in India: देश में आगामी त्योहरी सीजन की शुरुआत से ठीक पहले आम जनता के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। आने वाले महीनों में भारतीय रसोई का बजट एक बार फिर बिगड़ सकता है, क्योंकि खाद्य तेल की कीमतों में एक बड़े उछाल की संभावना जताई जा रही है। कमजोर मानसून के कारण घरेलू स्तर पर बुवाई में आई कमी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सीमित सप्लाई के चलते बाजार में खाद्य तेलों की उपलब्धता प्रभावित हुई है।
वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण भारत आने वाले मालवाहक जहाजों के आगमन में दो-दो महीनों तक का विलंब हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप सरसों, सोयाबीन और पाम तेल के खुदरा रेट में आठ से 12 फीसदी तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी होने की पूरी आशंका जताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल की इस किल्लत के पीछे रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध एक मुख्य कारण बना हुआ है।

ज्ञात हो कि वैश्विक खाद्य तेल बाजार में इन दोनों देशों की कुल हिस्सेदारी लगभग 63 फीसदी है। हाल के दिनों में यूक्रेन द्वारा रूसी बंदरगाहों पर किए गए ड्रोन हमलों के बाद से काला सागर का पूरा समुद्री मार्ग परिवहन के लिहाज से काफी असुरक्षित हो गया है। व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर उत्पन्न हुए इस संकट के कारण दर्जनों मालवाहक जहाज रास्ते में ही फंसे पड़े हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य तेलों का व्यापार और वितरण पूरी तरह से प्रभावित हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) द्वारा जारी आंकड़े अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में आई इस भारी गिरावट की पुष्टि करते हैं। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 में खाद्य तेलों का कुल आयात सालाना आधार पर 29 फीसदी तक लुढ़क गया है। अगर पिछले दो महीनों की तुलना की जाए तो मई के महीने में देश में 13.39 लाख टन खाद्य तेल का आयात दर्ज किया गया था, जो जून महीने में घटकर महज 11.11 लाख टन पर सिमट गया।
आयात में आई इस कुल गिरावट के बीच पाम तेल के आयात में 10.5 प्रतिशत और सोयाबीन तेल के आयात में 23 प्रतिशत की बड़ी कमी दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर जारी चुनौतियों के साथ-साथ भारत के घरेलू स्तर पर भी स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है। देश में मानसून की कमजोर स्थिति ने तिलहन फसलों की बुवाई को भारी नुकसान पहुंचाया है।
चालू सीजन के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय किसानों ने अब तक केवल 163.54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही तिलहन फसलों की बुवाई की है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में तिलहन का औसत रकबा लगभग 200 लाख हेक्टेयर रहता है। बुवाई का यह पिछड़ापन भविष्य में घरेलू उत्पादन पर असर डालेगा, जिससे बाजार में आपूर्ति और भी अधिक सीमित हो सकती है।
उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ समय के दौरान विभिन्न खाद्य तेलों की कीमतों में 18 फीसदी तक की वृद्धि पहले ही दर्ज की जा चुकी है। 30 जुलाई तक के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सूरजमुखी तेल का भाव 160.55 रुपये प्रति किलो से उछलकर 189.56 रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गया है।
इसी तरह अन्य श्रेणियों में पाम तेल की कीमतों में 14.42%, सोयाबीन तेल में 11.92%, मूंगफली तेल में 9.19% तथा सरसों तेल के भाव में 6.89% की बढ़ोतरी देखी गई है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इंडोनेशिया और मलेशिया की ओर से बायोफ्यूल के लिए पाम तेल का बढ़ता उपयोग और अल नीनो के प्रभाव ने वैश्विक खाद्य तेल स्टॉक को पहले ही काफी सीमित कर दिया है।
त्योहारों के आगामी समय में देश के भीतर खाद्य तेल की किल्लत उत्पन्न न हो, इसके लिए भारतीय आयातकों और व्यापारियों ने अब वैकल्पिक विकल्पों और नए देशों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। वर्तमान रणनीति के तहत भारत में सूरजमुखी तेल की कुल आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा अब दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना से आयात किया जा रहा है।
इसके साथ ही आपूर्ति को संतुलित करने के उद्देश्य से ऑस्ट्रेलिया से कैनोला तेल और ब्राजील-अर्जेंटीना से सोयाबीन तेल की खरीदारी बढ़ाई जा रही है। बाजार को उम्मीद है कि जुलाई महीने में पाम तेल का आयात 40 फीसदी तक बढ़कर 7 लाख टन के स्तर पर पहुंच सकता है, जिससे आने वाले दिनों में कीमतों में होने वाली अप्रत्याशित बढ़ोतरी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा।


















