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Sabarimala Temple Case Supreme Court: क्या धार्मिक परंपराएं अंधविश्वास हैं? सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों पर दिया बड़ा बयान

Women entry in Sabarimala: सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका यह तय करने का अधिकार रखती है कि कोई परंपरा अंधविश्वास है या नहीं, केवल संसद ही इस पर अंतिम निर्णय नहीं ले सकती।
Published on: 9 April 2026
Sabarimala Temple Case Supreme Court

Sabarimala Temple Case Supreme Court: सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को लेकर चल रही कानूनी बहस ने एक नया मोड़ ले लिया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अदालत के पास धार्मिक प्रथाओं की तार्किक जांच करने का पूर्ण अधिकार है।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय करने में सक्षम नहीं है कि क्या अंधविश्वास है, क्योंकि उसे धार्मिक बारीकियों का गहन ज्ञान नहीं होता। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जो एक समाज के लिए धर्म है, वह दूसरे के लिए अंधविश्वास हो सकता है।

इसके उलट, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, तो अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। पीठ ने सती प्रथा, जादू-टोना और नरभक्षण जैसे उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई परंपरा समाज की अंतरात्मा को झकझोरती है, तो न्यायिक हस्तक्षेप अनिवार्य है।

‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ का पैमाना
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) के सिद्धांत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रथा की जांच उस विशिष्ट धर्म की मान्यताओं और परंपराओं के आधार पर ही होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसी हर जांच सार्वजनिक नैतिकता के दायरे में होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने इस पर सहमति जताई कि हालांकि अदालत धार्मिक विशेषज्ञ नहीं है, लेकिन नरबलि या जादू-टोना जैसी कुरीतियों पर हस्तक्षेप करने के लिए किसी विस्तृत जांच की आवश्यकता नहीं होती।

केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि सबरीमला में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होना भेदभाव नहीं, बल्कि भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप के प्रति एक धार्मिक आस्था है। सरकार के अनुसार, प्रत्येक धार्मिक परंपरा को केवल व्यक्तिगत समानता के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन विशेष मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए जो सदियों से चली आ रही हैं।

क्या है मामला
बता दें कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश वर्जित होने की सदियों पुरानी परंपरा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत के न्यायिक इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। साल 2018 में शीर्ष अदालत ने 4:1 के बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी, लेकिन व्यापक विरोध और पुनर्विचार याचिकाओं के बाद अब यह मामला 9 जजों की संवैधानिक पीठ के पास है। अदालत को अब न केवल सबरीमाला, बल्कि अन्य धर्मों में भी महिलाओं के अधिकारों और जेंडर भेदभाव से जुड़े पांच महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अंतिम निर्णय लेना है।

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का मुख्य आधार भगवान अयप्पा के ‘ब्रह्मचर्य स्वरूप’ और मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को माना गया था। 1990 में पहली बार यह मामला कानूनी रूप से उठा और साल 2018 में इसे असंवैधानिक घोषित किया गया। वर्तमान में मामला बड़ी बेंच के पास है, जो इस पर पुनर्विचार करेगी।

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