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पूर्व मंत्री कौल सिंह का फिर छलका दर्द, यदि मैं जीत जाता तो सुक्खू नहीं, होते मुख्यमंत्री

Himachal Political Crisis: सार्वजनिक सभा के दौरान कौल सिंह के इस दावे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है कि यदि वे पिछला चुनाव जीत जाते, तो आज प्रदेश की कमान किसी और के पास नहीं बल्कि उनके पास होती।
Himachal Congress Conflict पूर्व मंत्री कौल सिंह का फिर छलका दर्द, यदि मैं जीत जाता तो सुक्खू नहीं, होते मुख्यमंत्री

Himachal Congress Conflict News: शिमला और मंडी की राजनीति में गर्माहट के बीच पिछले कुछ समय से पार्टी के भीतर जारी अंतर्कलह अब खुलकर सामने आने लगी है। कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दरअसल, एक सार्वजनिक सभा के दौरान कौल सिंह के इस दावे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है कि यदि वे पिछला चुनाव जीत जाते, तो आज प्रदेश की कमान सीएम सुक्खू के हाथ नही बल्कि उनके पास होती।

उल्लेखनीय है कि हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बने तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन सत्ताधारी दल के भीतर का कलह थमने का नाम नहीं ले रहा है। आठ बार के विधायक, चार बार कैबिनेट मंत्री रहे और पीसीसी चीफ व विधानसभा स्पीकर जैसे पदों पर रह चुके कौल सिंह ठाकुर इन दिनों सीएम सुक्खू के कार्यशैली और उनके द्वारा नजरअंदाज किए जाने से खासे नाराज हैं। इससे पहले भी वे मंडी और शिमला में पार्टी प्रभारी की मौजूदगी में मंत्रियों को काम न मिलने का मुद्दा उठा चुके हैं, जो परोक्ष रूप से सीएम सुक्खू पर बड़ा हमला माना गया था।

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कौल सिंह ठाकुर के ताजा बयान ने पार्टी के भीतर की उस पुरानी टीस को फिर से उजागर कर दिया है, जो उनके सीएम बनने के अधूरे सपने से जुड़ी है। वर्ष 2012 में जब वीरभद्र सिंह छठी बार हिमाचल की कमान संभाल रहे थे, तब कौल सिंह खुद को सीएम पद का सबसे प्रबल दावेदार मानते थे। 2017 के चुनाव के दौरान भी उन्होंने सार्वजनिक मंचों से कहा था कि आठ बार के विधायक होने के नाते वे मुख्यमंत्री पद के लिए हर योग्यता रखते हैं। हालांकि, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और वीरभद्र सिंह के दबदबे के कारण वे इस सर्वोच्च पद तक नहीं पहुंच सके।

सियासी किस्मत का खेल देखिए कि 2017 में द्रंग से चुनाव हारने के बाद मंडी के ही दूसरे राजपूत नेता जयराम ठाकुर सीएम की कुर्सी पर काबिज हो गए। 2022 में कौल सिंह को फिर से एक बड़ी उम्मीद थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। इस बार उन्हें अपने ही सियासी चेले पूर्ण ठाकुर के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी।

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हालांकि, हार का अंतर एक हजार वोटों से भी कम था, लेकिन इस पराजय ने उनके मुख्यमंत्री बनने के सपने को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया। कौल सिंह का स्पष्ट मानना है कि हाईकमान ने उनके अनुभव को देखते हुए मुख्यमंत्री के लिए मन बना लिया था, लेकिन चुनाव हारने के कारण यह समीकरण बदल गया।

अनुभव की दृष्टि से देखें तो कौल सिंह ठाकुर का राजनीतिक कद बेहद ऊंचा है। वर्ष 1977 से राजनीति में सक्रिय रहे कौल सिंह ने पांच दशक के अपने करियर में कानून, स्वास्थ्य, राजस्व और जलशक्ति जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाला है। कानून की पढ़ाई करने वाले इस दिग्गज राजनेता के पास अनुभव की कोई कमी नहीं है, लेकिन पिछले एक दशक से भाग्य उनका साथ नहीं दे रहा है। चुनाव हारने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि उनके लंबे अनुभव का सम्मान करते हुए पार्टी उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देगी, लेकिन ऐसा न होने से उनका धैर्य जवाब दे गया।

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कौल सिंह की नाराजगी की एक बड़ी वजह उनके निर्वाचन क्षेत्र द्रंग में विकास कार्यों की अनदेखी भी रही है। लगातार सीएम द्वारा नजरअंदाज किए जाने के बाद अब उनकी प्राथमिकताएं बदलती दिख रही हैं। वे अपनी नई पीढ़ी को भी राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं, हालांकि उनकी बेटी चंपा ठाकुर मंडी सदर से चुनाव हार चुकी हैं।

अब देखना यह है कि कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता की बढ़ती नाराजगी आने वाले समय में पार्टी के लिए और कितनी बड़ी चुनौती बनती है। फिलहाल, कौल सिंह ने भविष्य में चुनाव न लड़ने की बात कही है, लेकिन हाईकमान के दबाव में वे फिर मैदान में उतरेंगे या नहीं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है।

Kasauli International Public School, Sanwara (Shimla Hills)
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