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हिमाचल में किसान आयोग को राज्यपाल की अनुमति, विधि विभाग ने जारी की अधिसूचना, क्या बदल जाएगी पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था ?

Himachal Pradesh State Farmer Commission: प्रदेश में कृषि, बागवानी और पशुपालन सहित ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों की निगरानी के लिए राज्य किसान आयोग कानून को राज्यपाल कविंद्र गुप्ता की मंजूरी मिल गई है, जिसके तहत आयोग को व्यापक शक्तियां दी गई हैं।
Published on: 27 May 2026
Himachal Kisan Ayog Law: हिमाचल में किसान आयोग को राज्यपाल की अनुमति, विधि विभाग ने जारी की अधिसूचना, क्या बदल जाएगी पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

Himachal Kisan Ayog Law: हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने किसानों की आवाज को नीतियों के केंद्र तक पहुंचाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। राज्य में लंबे समय से खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों पर एक अलग और प्रभावी संस्थागत व्यवस्था की मांग की जा रही थी। इस मांग को पूरा करते हुए अब किसानों को एक ऐसा मंच मिलने जा रहा है, जो केवल फसलों तक ही सीमित नहीं रहेगा। यह नया ढांचा बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, दुग्ध उत्पादन, औषधीय पौधों की खेती, मधुमक्खी पालन और रेशम उत्पादन जैसी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों की गतिविधियों पर सीधी नजर रखेगा।

बता दें कि हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंद्र गुप्ता की मंजूरी और विधि विभाग की अधिसूचना जारी होने के साथ ही हिमाचल प्रदेश राज्य किसान आयोग कानून अब आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आ गया है। इस नए कानून के लागू होने से प्रदेश में कृषि और किसान हितों को एक नई संस्थागत ताकत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। पहाड़ी प्रदेश की अर्थव्यवस्था में खेती और बागवानी की हमेशा से बेहद अहम भूमिका रही है, लेकिन हाल के दिनों में बदलते मौसम, उत्पादन लागत में लगातार हो रही बढ़ोतरी, बाजार की जटिल चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं ने स्थानीय किसानों की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं।

ऐसे चुनौतीपूर्ण दौर में सुक्खू सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम केवल एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं है। इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अंदरूनी रूप से मजबूत करने और किसानों की व्यावहारिक समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित करने की गंभीर कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इस नए कानून की सबसे खास बात यह है कि इस आयोग को केवल एक साधारण सलाहकार संस्था तक ही सीमित नहीं रखा गया है। इसके विपरीत, आयोग को जमीनी स्तर पर जांच करने और आवश्यकता पड़ने पर जरूरी दिशा-निर्देश जारी करने जैसी प्रशासनिक शक्तियां भी सौंप दी गई हैं।

नए कानून के तहत विधिवत गठित होने वाला यह आयोग कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों से जुड़े विभिन्न सरकारी विभागों के बीच सीधा समन्वय स्थापित करने का काम करेगा। संस्थागत मजबूती के लिए कृषि और बागवानी विश्वविद्यालयों के कुलपति, बागवानी विभाग के निदेशक, पशुपालन विभाग के निदेशक और मत्स्य विभाग के निदेशक को इस आयोग का पदेन सदस्य बनाया गया है। इसके साथ ही, कृषि विभाग के निदेशक इस पूरे आयोग में सदस्य सचिव की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेंगे।

कानून के नियमों के अनुसार, आयोग का अध्यक्ष अनिवार्य रूप से हिमाचल प्रदेश का स्थायी निवासी होना चाहिए। अध्यक्ष पद पर उसी व्यक्ति को नियुक्त किया जाएगा जिसे कृषि क्षेत्र का व्यापक और व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो, तथा वह एक प्रगतिशील किसान या पेशेवर के रूप में जाना जाता हो। इसके अतिरिक्त, अध्यक्ष पद के लिए स्नातक की उपाधि होना अनिवार्य है। साथ ही, उसके पास राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कृषि परिदृश्य की गहरी समझ होने के साथ-साथ कृषि, बागवानी और पशुपालन क्षेत्र में कम से कम पांच वर्ष का प्रशासनिक अनुभव होना आवश्यक है।

राज्य सरकार का स्पष्ट मानना है कि यह नवगठित आयोग किसानों की वास्तविक समस्याओं, राज्य की कृषि नीतियों, बाजार व्यवस्था और फसल उत्पादन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रभावी सुझाव देकर कृषि व्यवस्था को एक नई और सही दिशा देगा। निर्धारित नियमों के तहत आयोग के अध्यक्ष और अन्य गैर-सरकारी सदस्य अधिकतम पांच वर्ष की अवधि या 70 वर्ष की आयु पूरी होने तक ही अपने पद पर बने रह सकेंगे। राज्य में किसान हितों को लेकर इसे एक बड़े सुधारात्मक और ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिससे आने वाले समय में ग्रामीण क्षेत्रों को स्थिरता मिलेगी।

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