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Crude Oil Price Today: होर्मुज संकट से $85 के पार पहुंचा कच्चा तेल, क्या फिर महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल?

Brent Crude Price: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान की आशंका से वैश्विक तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव, आपूर्ति प्रभावित होने के डर से कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल।
Published on: 15 July 2026
Crude Oil Price Today: होर्मुज संकट से $85 के पार पहुंचा कच्चा तेल, क्या फिर महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल?

Crude Oil Price Today: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। पिछले 15 दिनों के भीतर वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड करीब 73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है।

वहीं, वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड भी 85 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान में तेल बाजार एक तरफ बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों और दूसरी तरफ कमजोर वैश्विक मांग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती, तब तक वैश्विक तेल बाजार में कीमतों का यह उतार-चढ़ाव लगातार जारी रहने की प्रबल आशंका है।

इस मार्ग पर किसी भी प्रकार के व्यवधान से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती है। वैश्विक तेल व्यापार के लिहाज से होर्मुज जलडमरूमध्य को सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। दुनिया भर में होने वाली कुल तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा हाल ही में की गई कार्रवाई और उसके बाद अमेरिका द्वारा लगाए गए नए प्रतिबंधों के कारण बाजार में तेल आपूर्ति बाधित होने का डर बैठ गया है। यही मुख्य वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में फिर से भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम जुड़ गया है।

चालू वर्ष के दौरान तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव का दौर देखा गया है। इससे पहले फरवरी से अप्रैल के बीच जारी युद्ध के दौरान ब्रेंट क्रूड उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर पहुंच गया था। इसके बाद 17 जून को हुए युद्धविराम के चलते कीमतों में बड़ी गिरावट आई और यह फिसलकर लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था। लेकिन 12 जुलाई को होर्मुज क्षेत्र में अचानक तनाव बढ़ने के कारण बाजार का रुख फिर बदला और ब्रेंट क्रूड महज कुछ ही हफ्तों में 85 डॉलर के पार निकल गया।

बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को केवल युद्ध की आशंका से ही समर्थन नहीं मिल रहा है, बल्कि कई अन्य बुनियादी कारक भी इसके पीछे काम कर रहे हैं। मिराए एसेट शेयरखान के रिसर्च एनालिस्ट मोहम्मद इमरान के अनुसार, अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) इस समय कई दशकों के निचले स्तर पर आ चुका है। इसके साथ ही यूरोप में रिफाइंड ईंधनों, विशेषकर डीजल की कीमतों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे बाजार में तंगी की स्थिति बनी हुई है।

सप्लाई घटने का एक बड़ा कारण रूस के रिफाइनिंग ढांचे पर यूक्रेन द्वारा किए जा रहे लगातार ड्रोन हमले भी हैं, जिससे वहां उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके अतिरिक्त, रूस ने जुलाई महीने में डीजल के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी है। इस कदम ने वैश्विक बाजार में रिफाइंड ईंधन की उपलब्धता को और अधिक सीमित कर दिया है। विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि कच्चे तेल की तुलना में इस समय सबसे ज्यादा दबाव डीजल जैसे तैयार ईंधनों की आपूर्ति पर देखा जा रहा है।

पश्चिम एशिया की कुछ प्रमुख रिफाइनरियों में उत्पादन प्रभावित होने और रूस से आपूर्ति घटने के कारण पूरे यूरोप में डीजल की किल्लत बढ़ गई है। हालांकि अमेरिका की रिफाइनरियां इस समय अपनी उच्च क्षमता पर काम कर रही हैं, लेकिन उन पर घरेलू मांग को पूरा करने के साथ-साथ यूरोप की मांग की भरपाई करने का भी दोहरा दबाव है। इस स्थिति के चलते आने वाले समय में भी डीजल और अन्य रिफाइंड उत्पादों की कीमतें उच्च स्तर पर बनी रह सकती हैं।

इन सबके बीच, कच्चे तेल के बाजार पर ओपेक प्लस (OPEC+) देशों की पकड़ भी पहले के मुकाबले कमजोर होती दिख रही है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, कुवैत, इराक और कतर जैसे प्रमुख उत्पादक देश इस समय एशियाई ग्राहकों को अधिक छूट देकर अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की होड़ में लगे हैं। इस रणनीति से यह साफ संकेत मिलता है कि अब केवल उत्पादन में कटौती करके कीमतों को नियंत्रित करना इन देशों के लिए पहले जितना सरल नहीं रह गया है।

दूसरी ओर, दीर्घकालिक अवधि में कच्चे तेल की मांग पर इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के बढ़ते चलन का असर भी साफ दिखने लगा है। भारत सहित कई प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में तेजी से वृद्धि हो रही है, जिससे पारंपरिक ईंधन जैसे पेट्रोल और डीजल की मांग की रफ्तार धीरे-धीरे धीमी पड़ने की उम्मीद है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में आपूर्ति से जुड़े तात्कालिक जोखिम इतने बड़े हैं कि वे मांग में आ रही इस क्रमिक कमी के प्रभाव को पूरी तरह दबा रहे हैं।

आने वाले महीनों में कच्चे तेल की चाल पूरी तरह से अमेरिका और ईरान से जुड़ी भू-राजनीतिक खबरों और घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। यदि दोनों देशों के बीच तनाव में किसी भी प्रकार की कमी आती है, तो बाजार को बड़ी राहत मिल सकती है और कीमतें नीचे आ सकती हैं। इसके विपरीत, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति और अधिक संवेदनशील होती है, तो कीमतों में एक बार फिर से जोरदार उछाल देखने को मिल सकता है।

रिसर्च एनालिस्ट के अनुमान के मुताबिक, अगले तीन से छह महीनों की अवधि में ब्रेंट क्रूड 74 डॉलर से 95 डॉलर प्रति बैरल के व्यापक दायरे में कारोबार कर सकता है। वहीं, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड के ब्रेंट क्रूड के मुकाबले आमतौर पर 4 से 6 डॉलर प्रति बैरल नीचे कारोबार करने की संभावना है। डीजल की वैश्विक किल्लत और रिफाइंड ईंधन की तंगी अगले कुछ महीनों तक बनी रहेगी, जिससे तेल बाजार में अस्थिरता का दौर जारी रहेगा।

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