Fake Degree Scam: हिमाचल प्रदेश के इतिहास के सबसे बड़े शैक्षणिक घोटाले “मानव भारती यूनिवर्सिटी फर्जी डिग्री प्रकरण” में पुलिस और CID की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। एक तरफ राज्य सरकार प्रशासनिक स्तर पर ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के दावे कर रही है, तो दूसरी तरफ इस बहुचर्चित मामले में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और मंशा कटघरे में खड़ी होती दिखाई दे रही है।
वर्तमान में इस महाघोटाले से जुड़े वित्तीय लेन-देन और बेनामी संपत्तियों की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) कर रही है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मिलना बाकी है। मामले में कई छूटती कड़ियां स्पष्ट इशारा करती हैं कि पुलिस प्रशासन का रवैया ढुलमुल रहा है, जिसने जांच की मंशा और निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल इस मामले की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब हिमाचल प्रदेश निजी शिक्षण संस्थान नियामक आयोग (Regulatory Commission) ने फर्जी डिग्रियों के संबंध में एक अत्यंत गंभीर शिकायत पुलिस विभाग को सौंपी थी। मामले की संवेदनशीलता और इसकी गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने इसकी संपूर्ण जांच अपराध अन्वेषण विभाग यानि CID को सौंप दी थी। हालांकि, इसके बाद जो हुआ उसने पूरी जांच प्रक्रिया को कटघरे में ला खड़ा किया है।
इस मामले में सूत्रों कि माने तो गंभीर शिकायत मिलने के बावजूद, लगभग दो वर्षों की लंबी अवधि तक इस मामले में न तो कोई प्राथमिकी दर्ज की गई और न ही कोई प्रभावी आपराधिक जांच शुरू की गई। सूत्रों कि माने तो आज यह सवाल सबसे बड़ा बना हुआ है कि जब आयोग की शिकायत पूरी तरह स्पष्ट थी, तो आखिर किसके राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव में इसे दबाकर रखा गया? दो साल तक जांच की फाइलें रुकी रहने का क्या कारण था?
इस दो साल के अभूतपूर्व और असाधारण विलंब का सीधा असर यह पड़ा कि फर्जी डिग्रियों का कारोबार और दायरा शिकायत मिलने के बाद भी लगातार बढ़ता चला गया। समय पर कार्रवाई न होने के कारण सैकड़ों निर्दोष युवाओं का भविष्य संकट में पड़ गया। मामले से जुड़े जानकारों की मानें तो अगर वर्ष 2017 में शिकायत मिलते ही सख्त कानूनी कदम उठाए गए होते, तो अनेक विद्यार्थियों को इस बड़े धोखाधड़ी के जाल में फंसने से बचाया जा सकता था।
जब इस असामान्य विलंब का मामला तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एस.आर. मरडी के संज्ञान में आया, तब उन्होंने इस गंभीर लापरवाही के संबंध में जांच के आदेश जारी किए थे। परंतु, इतने समय बाद भी यह सार्वजनिक नहीं किया गया कि इस स्तर की ढिलाई के लिए कौन उत्तरदायी था और मामले की जाँच में हुई देरी के लिए किस अधिकारी की जवाबदेही तय की गई।
किसी भी आपराधिक मामले में केवल जांच अधिकारी (IO) ही जिम्मेदार नहीं होता; हर महत्वपूर्ण प्रकरण की समीक्षा और निगरानी शीर्ष स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाती है। ‘मानव भारती यूनिवर्सिटी’ मामले में तो यह निगरानी और भी अनिवार्य थी, क्योंकि यह सीधे तौर पर हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा विषय था।
इसके बावजूद, फर्जी डिग्रियों के इस कारोबार में दो साल तक FIR दर्ज न होना CID की सुस्ती और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रशासन संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने से क्यों बच रहा है? क्या इस मामले को किसी बड़े रसूखदार के दबाव में दबाने का प्रयास किया गया, या फिर किसी अंदरूनी वित्तीय लेन-देन की वजह से जांच प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाया गया?
किसी भी संवेदनशील मामले दो साल तक एफआईआर दर्ज न होना केवल अधीनस्थ स्तर की नाकामी नहीं, बल्कि पर्यवेक्षण और शीर्ष नेतृत्व की भी विफलता है। छोटे मामलों में तो निचले कर्मचारियों पर तुरंत गाज़ गिर जाती है, लेकिन इस राज्यव्यापी मामले में वरिष्ठ सीआईडी अधिकारियों को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार और पुलिस विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि:
- 2017 से 2020 के बीच इस मामले की निगरानी कौन से वरिष्ठ सीआईडी अधिकारी कर रहे थे?
- दो वर्षों तक एफआईआर दर्ज न करने के पीछे क्या कारण थे और किस अधिकारी पर इसके लिए कार्रवाई की गई?
- यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो इसके क्या कारण हैं?
- जब मामला हजारों युवाओं के करियर से जुड़ा था, तो CID दो साल तक हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी रही?
- वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी के बावजूद जवाबदेही तय करने से क्यों बचा जा रहा है?,
- क्या इस देरी के पीछे कोई राजनीतिक दबाव था, या फिर किसी बड़े वित्तीय लेन-देन की वजह से जांच को अटकाया गया?
मानव भारती फर्जी डिग्री मामले से जुड़े कई ऐसे अनसुलझे सवाल हैं, जिनका जवाब हर नागरिक जानना चाहता है। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है, और जब बात शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी की आती है, तो सरकार को भी इस संवेदनशील मामले में अपनी भूमिका का निर्वहन पूरी ईमानदारी के साथ करना चाहिए।
हजारों युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले इस घोटाले की सच्चाई सामने लाना सरकार का नैतिक कर्तव्य है। ऐसे में प्रशासन को टालमटोल की नीति छोड़कर जवाबदेही तय करनी होगी, वरना यह सवाल भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही दबकर रह जाएंगे।
अब तो इस मामले में पूर्व मंत्री और भाजपा नेता विक्रम सिंह ठाकुर ने भी हिमाचल के डीजीपी से कड़े सवाल पूछ लिए हैं।
मानव भारती मामले में फर्जी डिग्री मामले में दो साल तक क्यों दबी रही फाइल pic.twitter.com/Bahj4ajKJ0
— Prajasatta (@prajasattanews) August 2, 2026


















