Suspension Sultan Drama: जिले के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले सरकारी बंगले में सुबह-सुबह ऐसी खबर फैली कि पूरे पुलिस महकमे की चाय ठंडी हो गई। खबर छोटी थी, लेकिन असर ऐसा कि वायरलेस से लेकर व्हाट्सऐप ग्रुप तक हर जगह केवल एक ही चर्चा थी, “बड़े साहब की अलमारी का ताला टूटा मिला है।”
साहब की माताजी का मातम तो ऐसा था मानो कैकेयी का पात्र याद आ गया हो, पर यह सब बस एक आई-वॉश था। साहब इतने कड़क, इतनी कड़कती मिजाज, फिर भी चोरी! यह तो अंग्रेज जेलर के घर सेंध, सुरंग या कुछ और जैसा ही मामला लग रहा था।

“सुना है बड़े साहब अनुशासन के इतने पक्के हैं कि सुबह की चाय से पहले दो-चार लोगों को निलंबित किए बिना उनका दिन शुरू नहीं होता।” SHO ने अपनी कुर्सी खिसकाते हुए कहा। “देखो बेटा, अनुशासन अच्छी चीज़ है। लेकिन अनुशासन और निलंबन में उतना ही फर्क है जितना बारिश और बाढ़ में।”
आखिरकार जिले के सबसे वरिष्ठ कप्तान यानी ‘सिंघम’ साहब के घर की अलमारी का ताला टूट ही गया! पूरे महकमे में साहब की धाक थी, इसलिए जब थाने के सिपाही को यह खबर मिली तो उसकी उत्सुकता का ठिकाना न रहा। उसने तुरंत SHO उड़ान सिंह से पूछ लिया, “जनाब! कप्तान साहब की अलमारी टूट गई? पर कैसे और किसने तोड़ी?” यह सुनते ही SHO साहब का हलक सूख गया और वे जोर से चिल्लाए, “अबे चुप कर! दीवारों के भी कान होते हैं!”
कांस्टेबल थोड़ा मर्माहत तो हुआ, पर अपनी आदत से मजबूर उसने धीमी आवाज में फुसफुसाते हुए कहा, “अरे हुजूर, बाहर लोग क्या कहेंगे? सिंघम के घर डाका! वहां तो चौबीसों घंटे पुलिस का संतरी पहरा देता है ना?” इस पर SHO उड़ान सिंह ने एक ठंडी सांस ली और अपना दर्द बयां किया कि संतरी की बात ही मत करो, साहब की असली हॉबी तो कर्मचारियों को सस्पेंड करने की है! अब तक तो बेचारे संतरी-फंतरी सब सस्पेंड होकर घर बैठ चुके होंगे और उनकी विभागीय जांच भी शुरू हो गई होगी। “भई, हॉबी का मसला है!” SHO ने अपने चश्मे के ऊपर से घूरकर देखा।
कांस्टेबल ने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए चुटकी ली, “सही बात है, साहब तो साक्षात ‘देवता’ हैं – जब तक नाश्ते में चार-पांच पुलिसवालों के सस्पेंशन ऑर्डर साइन न कर लें, उन्हें खाना पचता ही नहीं!”
जब कांस्टेबल ने असली मसला पूछा, तो SHO ने रहस्य से पर्दा उठाया कि अलमारी से कोई सोने-चांदी के जेवर नहीं, बल्कि एक ‘ढक्कन’ चोरी हुआ है! यह सुनकर कांस्टेबल चकित रह गया। SHO ने आगे बताया कि यह कारनामा किसी और का नहीं, बल्कि साहब की धर्मपत्नी का ही लग रहा है, वही बीवी जिन्होंने उस रात माताजी से मार खाई थी और खाकी ने भी मिलकर जिनकी अच्छी-खासी कुटाई कर दी थी। कांस्टेबल की आंखें फटी की फटी रह गईं; उसे लगा था कि मैडम तो अब तक ‘घरवाली’ के पद से सस्पेंड नहीं, बल्कि डिसमिस की जा चुकी होंगी! लेकिन कहानी में ट्विस्ट यह था कि इस बार बीवी ने भी साहब पर मुकदमा ठोक दिया था।
अब सवाल यह था कि अलमारी टूटी कैसे? वैसे भी चोरी ढूंढने के मामले में अपने पुलिस स्टेशन का रिकॉर्ड हमेशा ‘जीरो’ ही रहा है। SHO ने साफ किया कि चोरी ढूंढना तो मकसद ही नहीं है, असली खेल तो बीवी को डराने के लिए रचा गया है। लेकिन अब बीवी के घर पर रेड मारेगा कौन? इसके लिए लेडी कांस्टेबल ‘निन्नी’ को तैयार किया गया।
अभी यह खिचड़ी पक ही रही थी कि SHO साहब की जेब में रखा फोन घनघना उठा। स्क्रीन पर ‘बड़े साहब’ का नाम चमका, जो दिन में चार-पांच बार तो SHO को गरियाने के लिए फोन करते ही थे। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से दहाड़ गूंजी, “साले! एफआईआर वाली बात बाहर लीक कैसे हुई?!” SHO हकलाते रह गए और फोन कटते ही उनकी सस्पेंशन की ‘उड़ान’ पक्की हो गई।
कांस्टेबल ने मजे लेते हुए तंज कसा, “क्यों इंस्पेक्टर साहब! कहा था ना दीवारों के कान होते हैं? अब उठाइए बोरिया-बिस्तर और भरिए उड़ान सीधे दूर-दराज़ के हंसपुर सस्पेंशन मुख्यालय के लिए!”
जाते-जाते सस्पेंड हुए SHO ने चुपके से बताया कि वैसे साहब पर भी तो सरकारी कागजात चोरी करवाने का आरोप है। इसके बाद, आगे वकील करने की सलाह देकर वे खुद रफूचक्कर हो गए; क्योंकि जो साहब अपनी बीवी पर भी झूठी एफआईआर करवा सकते हैं, वे किसी और को क्या बख्शेंगे!
इधर कांस्टेबल मन ही मन सोच रहा था कि साहब आजकल कॉकरोचों से भी काफी डर रहे हैं; कहीं उनके खुद के ‘वास्ते-गुनेहगार’ होने का भांडा न फूट जाए – मतलब उनकी अपनी चोरी का मुद्दा न उठ जाए! सिंघम साहब पर भी तो कागजात चुरवाने का मसला भूसे के नीचे दबी आग की तरह सुलगता ही जा रहा है।
खैर, साहब को तो झूठी एफआईआर कराने की आदत है; बीवी हो या कोई करीबी, छोड़ते किसी को नहीं। अब देखना यह था कि सिंघम साहब अपने इस ‘मारे हुए डाके’ के चक्कर में खुद कब सस्पेंड होते हैं!
उधर पुलिस लाइन में नजारा ही अलग था – साहब के हाथों सस्पेंड हुए 32 पुलिसकर्मियों ने मिलकर एक विशाल ‘हवन’ रचाया था, और सबकी बस एक ही मनोकामना थी कि जल्द से जल्द कप्तान साहब के खुद के सस्पेंशन का फरमान जारी हो जाए!
नोट: यह लेखक के निजी विचार है


















