Himachal Pradesh Road Safety Fund controversy: हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग में सड़क सुरक्षा निधि के प्रबंधन, आवंटन और उपयोग को लेकर एक अत्यंत गंभीर और अप्रत्याशित विवाद उत्पन्न हो गया है। राज्य सरकार द्वारा हाल ही में जारी की गई एक अधिसूचना ने पुलिस विभाग के भीतर वित्तीय अनुशासन, प्रशासनिक पारदर्शिता और सार्वजनिक धन की वित्तीय शुचिता पर बड़े और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल, इस विवाद का मुख्य केंद्र वह प्रशासनिक फेरबदल है, जिसके तहत पूर्व डीआईजी (यातायात, पर्यटक एवं रेलवे – टीटीआर) संजीव गांधी को उनके पद से हटा दिया गया है। इस प्रकरण में सबसे अधिक आश्चर्यजनक पहलू यह है कि संजीव गांधी के स्थान पर टीटीआर का महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रभार उसी अधिकारी को सौंपा गया है, जिसके पिछले कार्यकाल के दौरान सड़क सुरक्षा निधि के दुरुपयोग के गंभीर आरोप सामने आ चुके हैं। यह निर्णय सीधे तौर पर पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर संदेह उत्पन्न करता है।

पूर्व डीआईजी टीटीआर संजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में इस निधि के उपयोग में पाई गई कई बड़ी विसंगतियों को प्रमुखता से उजागर किया था। सामने आए तथ्यों के अनुसार, उन्हें उन धनराशियों के उपयोगिता प्रमाण-पत्र (यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट) बिना उचित जांच के प्रस्तुत करने के लिए वस्तुतः बाध्य किया जा रहा था, जो सरकार द्वारा पूर्व में विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्वीकृत की गई थीं।
संजीव गांधी ने इस दबाव के आगे झुकने के बजाय, विभाग में उपलब्ध आधिकारिक अभिलेखों और निर्धारित वित्तीय प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए कड़े प्रश्न उठाए थे। उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों के समक्ष यह स्पष्ट किया था कि सड़क सुरक्षा निधि का उपयोग केवल उसके वास्तविक और नियमसम्मत उद्देश्यों के लिए ही अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।
हिमाचल प्रदेश सड़क सुरक्षा निधि एवं गतिविधियां नियमों के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) पुलिस विभाग के विभागाध्यक्ष होते हैं। इस नाते, इस महत्वपूर्ण निधि का उचित और निर्धारित लक्ष्यों के लिए उपयोग सुनिश्चित करने का प्राथमिक उत्तरदायित्व उन्हीं का है। इसके अतिरिक्त, सरकारी तंत्र में वित्तीय पारदर्शिता बनाए रखने के लिए विगत कई वर्षों से यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से निर्धारित है कि सड़क सुरक्षा निधि का वैधानिक लेखा-परीक्षण (ऑडिट) केवल महालेखाकार (अकाउंटेंट जनरल) के माध्यम से ही किया जाएगा।
इस स्पष्ट और बाध्यकारी नियमावली के बावजूद, राज्य के पुलिस महानिदेशक की वर्तमान कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यह चर्चा का एक बड़ा विषय बन गया है कि महालेखाकार की स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था के माध्यम से जांच कराने के बजाय, डीजीपी अपनी पसंद के चयनित अधिकारियों के माध्यम से विभागीय जांच अथवा आंतरिक ऑडिट कराने को प्राथमिकता आखिर क्यों दे रहे हैं। इसे नागरिक समाज द्वारा सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितताओं को छिपाने अथवा मामले पर पर्दा डालने के एक गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
इन तमाम संदेहास्पद परिस्थितियों के बीच, उसी अधिकारी को फिर से टीटीआर का प्रभार सौंपना विवाद को और भी गहरा कर देता है, जिसकी पूर्व पदस्थापना के समय इस निधि के उपयोग को लेकर गंभीर शिकायतें जुड़ी हुई हैं। पुलिस महानिदेशक की अनुशंसा पर की गई इस नियुक्ति ने आम नागरिकों के बीच यह संदेश दिया है कि कहीं यह कदम सड़क सुरक्षा निधि से संबंधित कथित अनियमितताओं को दबाने और वास्तविक अधिकारियों का उत्तरदायित्व छिपाने के उद्देश्य से तो नहीं उठाया गया है।
इस पूरे संवेदनशील प्रकरण का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सड़क सुरक्षा निधि की यह पूरी व्यवस्था माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सख्त निर्देशों के अनुपालन में ही स्थापित की गई थी। अतः इस निधि के मूल उद्देश्य से किसी भी प्रकार का विचलन, पुलिस विभाग द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों की अवहेलना अथवा नियमों का खुला उल्लंघन एक अत्यंत गंभीर न्यायिक विषय बन जाता है।
वर्तमान में नागरिक समाज के विभिन्न प्रबुद्ध वर्ग इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बेहद मुखर हो गए हैं। वे इस मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों का वित्तीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक विधिक उपायों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार, यदि इस मामले में जल्द ही पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की गई, तो नागरिक समाज द्वारा आवश्यकता पड़ने पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सीधे अवमानना याचिका (कंटेम्प्ट पिटीशन) दायर करने की कानूनी तैयारी भी की जा रही है।


















