Himachal Dalit Harassment: कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा जातीय भेदभाव के बाद सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई पीड़ा और संवैधानिक मूल्यों को लेकर उनकी चिंता के बीच हिमाचल प्रदेश से सामने आए घटनाक्रमों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब किसी प्रमुख राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वयं संस्थागत तंत्र में अपनी आवाज को उचित महत्व न मिलने या अन्याय का अनुभव व्यक्त करते हैं, तो यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक शासन की मूल भावना से जुड़ा विषय बन जाता है।
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में उसी कांग्रेस पार्टी की सरकार है जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे हैं। इस पृष्ठभूमि में राज्य के भीतर दलित समुदाय से जुड़े नागरिकों और प्रशासनिक अधिकारियों के कथित उत्पीड़न के मामलों ने सरकार और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। विशेष रूप से सोलन के कंडाघाट निवासी दलित युवक मोहित कुमार और शिमला में तैनात उप पुलिस अधीक्षक (DSP) विजय रघुवंशी के मामलों ने सामाजिक न्याय एवं प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

पहला मामला: सोलन में दलित युवक का मामला
सोलन के कंडाघाट क्षेत्र निवासी मोहित कुमार के मामले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा की गई विभागीय जांच में 14 जून 2025 की घटना से संबंधित यातायात चालान को झूठा, मनगढ़ंत और मनमाना पाए जाने की बात सामने आई है। जांच में उपलब्ध डैश-कैम फुटेज, कॉल विवरण तथा वाहन की गति से संबंधित डिजिटल साक्ष्यों सहित अन्य तथ्यों की जांच की गई। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर वाहन चलाते समय मोबाइल फोन के उपयोग अथवा अत्यधिक लापरवाही से वाहन चलाने के आरोपों की पुष्टि नहीं होने की बात रिपोर्ट में सामने आई है।
मोहित कुमार का आरोप है कि तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के वाहन को रास्ता न दे पाने के बाद उनके विरुद्ध कार्रवाई शुरू हुई और बाद में उन्हें आपराधिक मामले में भी उलझाया गया। उनका दावा है कि उनके वाहन में मौजूद डैश-कैम रिकॉर्डिंग पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करती है।
वर्तमान में यह मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग तक भी पहुंच चुका है। आयोग द्वारा संबंधित प्रशासन से कार्रवाई रिपोर्ट मांगे जाने के बाद यह प्रश्न और गंभीर हो गया है कि यदि किसी दलित युवक के विरुद्ध की गई प्रारंभिक पुलिस कार्रवाई ही विभागीय जांच में गलत, मनगढ़ंत अथवा मनमानी पाई जाती है, तो उसके लिए जिम्मेदारी किसकी निर्धारित होगी।
दूसरा मामला: दलित पुलिस अधिकारी ने लगाया संस्थागत उत्पीड़न का आरोप
दूसरा गंभीर मामला हिमाचल पुलिस के उप पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी विजय रघुवंशी से संबंधित है। रघुवंशी ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर उनके विरुद्ध लगातार प्रतिकूल रिपोर्ट भेजने, निलंबन एवं विभागीय कार्रवाई की संस्तुति करने, संलग्न सरकारी वाहन वापस लेने तथा गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों के बावजूद कठिन क्षेत्र में ड्यूटी लगाने जैसे आरोप लगाए हैं।
उनका आरोप है कि सामान्य स्थानांतरण के बाद पांवटा साहिब में कार्यभार ग्रहण करने को लेकर पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी उनसे नाराज हुए और इसके बाद उनके विरुद्ध सरकार को कई रिपोर्ट भेजी गईं। रघुवंशी का यह भी आरोप है कि उनके विरुद्ध गिरफ्तारी का प्रस्ताव तक आगे बढ़ाया गया। उन्होंने मुख्य सचिव और गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष कई बार अपनी शिकायतें रखीं तथा मुख्यमंत्री के समक्ष भी अपनी बात रखी।
रघुवंशी का आरोप है कि अत्यधिक मानसिक दबाव के दौरान उन्हें रीढ़ की गंभीर चोट लगी और वे लंबे समय से चिकित्सकीय अवकाश पर हैं। इसके बावजूद उनका कहना है कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी होने के बावजूद उन्हें कठिन क्षेत्र में निर्वाचन ड्यूटी पर तैनात किया गया। उन्होंने इन परिस्थितियों को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष भी उठाया है।
‘सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया’ पर खड़े होते गंभीर सवाल
इन आरोपों के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पुलिस प्रशासन के उस कथित जवाब से जुड़ा है, जिसमें अधिकारी के विरुद्ध सरकार को रिपोर्ट भेजना, निलंबन अथवा विभागीय कार्रवाई की संस्तुति करना तथा जबरदस्ती सरकारी वाहन वापस लेना सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई बताया गया है।
सवाल यह है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध बार-बार प्रतिकूल रिपोर्ट भेजी जाए, उसके विरुद्ध निलंबन और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए, उसे उपलब्ध प्रशासनिक संसाधनों से वंचित किया जाए और उसकी गंभीर चिकित्सकीय स्थिति के बावजूद कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी लगाई जाए, तो क्या इन सभी घटनाओं को केवल “सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया” कहकर समाप्त किया जा सकता है?
यदि किसी अधिकारी ने इन कार्रवाइयों को प्रतिशोध, भेदभाव अथवा संस्थागत उत्पीड़न बताया है, तो निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के माध्यम से यह निर्धारित होना चाहिए कि प्रशासनिक निर्णय वास्तव में नियमसम्मत थे या किसी व्यक्तिगत अथवा संस्थागत पूर्वाग्रह से प्रभावित।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के सामने परीक्षा की घड़ी
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा मोहित कुमार के मामले में हस्तक्षेप और संबंधित प्रशासन से कार्रवाई रिपोर्ट मांगे जाने के बाद यह मामला केवल एक यातायात चालान तक सीमित नहीं रह गया है। इसी प्रकार विजय रघुवंशी द्वारा आयोग के समक्ष उठाए गए आरोप पुलिस विभाग के भीतर दलित अधिकारियों के साथ व्यवहार और संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न खड़ा करते हैं।
कांग्रेस नेतृत्व लगातार सामाजिक न्याय और संविधान में निहित समानता के अधिकार की बात करता रहा है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार के सामने अब यह परीक्षा है कि वह इन आरोपों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के रूप में देखती है या स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के माध्यम से वास्तविक तथ्यों को सामने लाती है।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के सामने सीधा सवाल है, यदि जांच में किसी नागरिक या अधिकारी के साथ जातिगत भेदभाव, अधिकारों के दुरुपयोग अथवा संस्थागत उत्पीड़न की पुष्टि होती है, तो क्या सरकार संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करेगी?
सामाजिक न्याय केवल भाषणों और राजनीतिक मंचों का विषय नहीं हो सकता। उसकी वास्तविक परीक्षा पुलिस थानों, सरकारी कार्यालयों और प्रशासनिक निर्णयों में होती है। हिमाचल में सामने आए ये मामले अब इसी संवैधानिक कसौटी पर सरकार की परीक्षा ले रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि “प्रजासत्ता न्यूज़ नेटवर्क के पास हिमाचल प्रदेश के कई ऐसे अधिकारियों की जानकारी उपलब्ध है, जिनसे बातचीत भी हुई है। उनके अनुसार, कई विभागों में दलित समाज से आने वाले अधिकारी इसी तरह उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। उन्हें ऐसे पदों पर धकेल दिया गया है, जहाँ उनकी योग्यता का इस्तेमाल महज़ ‘खानापूर्ति’ के लिए किया जा रहा है।
एक तरफ कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी ‘सामाजिक न्याय’ की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी की सरकार वाले राज्य में दलित अधिकारियों और आम लोगों का प्रशासनिक शोषण हो रहा है। खुले मंचों से तो समान अधिकारों और हिस्सेदारी की बात की जाती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।” बता दें कि दलित समाज से जुड़े अधिकारियों को मुख्य जिम्मेदारियों से वंचित रखने का मामला प्रजासत्ता पहले भी प्रमुखता से उठा चुका है।


















