Shimla News: हिमाचल प्रदेश सरकार के निर्देश पर पूर्व शिमला एसपी और वर्तमान में कांगड़ा के पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम के प्रबंध निदेशक डीआईजी संजीव गांधी के खिलाफ दो मामले दर्ज किए जाने के बाद राज्यभर में राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भारी हलचल मच गई है। पुलिस विभाग के भीतर ही एक उच्च अधिकारी पर इस प्रकार की कानूनी कार्रवाई होना पूरे प्रदेश में चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।
जानकारी के मुताबिक पहला मामला पुलिस लाइन कैथू के एक कांस्टेबल की शिकायत पर दर्ज किया गया है, जिसमें धोखाधड़ी, सरकारी धन के कथित दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। वहीं दूसरा मामला पुलिस थाना सदर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 316 (5) के तहत दर्ज हुआ है, जो लोक सेवकों द्वारा आपराधिक विश्वासघात से जुड़ा हुआ है।

इन मामलों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और मीडिया में इसे लेकर बहस छिड़ गई है। एक वर्ग इसे विशुद्ध रूप से प्रतिशोधनात्मक कार्रवाई बता रहा है, क्योंकि चर्चा यह भी है कि आईपीएस संजीव गांधी की उच्च अधिकारियों के साथ तालमेल नहीं बैठ पा रहा था। वहीं दूसरी ओर, उनके समर्थकों और शुभचिंतकों द्वारा सोशल मीडिया पर उनकी ईमानदारी के पक्ष में भारी पोस्ट डाले जा रहे हैं।
आईपीएस संजीव गांधी का प्रशासनिक सफर पिछले कुछ महीनों से लगातार चर्चा का विषय रहा है। 23 जनवरी 2023 को शिमला के एसपी पद पर नियुक्त होने वाले गांधी ने लगभग तीन साल तक इस पद पर कार्य किया। इसके बाद पिछले कुछ महीनों में उनके ताबड़तोड़ तबादलों का दौर शुरू हुआ:
- 7 फरवरी 2026 को उन्हें शिमला के एसपी पद से हटाकर कार्मिक विभाग के अधीन किया गया।
- 9 फरवरी 2026 को उन्हें मिल्कफेड का प्रबंध निदेशक नियुक्त किया गया, लेकिन उन्होंने इस पद का कार्यभार नहीं संभाला।
- 24 फरवरी 2026 को उन्हें दोबारा कार्मिक विभाग में रिपोर्ट करने के निर्देश दिए गए।
- 24 मार्च 2026 को उन्हें डीआईजी ट्रैफिक, टूरिस्ट और रेलवे (टीटीआर) के पद पर तैनात किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने कई अहम रिपोर्टें सरकार को सौंपीं।
- 7 अक्टूबर 2026 को खविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने एक बार फिर उनका तबादला करते हुए उन्हें हिमाचल प्रदेश पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम, कांगड़ा का प्रबंध निदेशक बना दिया।
रोड सेफ्टी फंड और स्वतंत्र ऑडिट की मांग पर उपजा विवाद
सूत्रों और रिपोर्ट्स के अनुसार, डीआईजी टीटीआर के पद पर कार्यभार संभालने के बाद संजीव गांधी ने रोड सेफ्टी फंड से जुड़े खर्चों में कथित अनियमितताओं का पता लगाया था। पिछले कुछ वर्षों में रोड सेफ्टी फंड के तहत लगभग 30 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी, लेकिन कैश बुक और फंड एलोकेशन रजिस्टर जैसे महत्वपूर्ण मूल अभिलेख उचित रूप से संधारित नहीं पाए गए। जब संजीव गांधी ने इस 30 करोड़ रुपये के फंड का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ऑडिट अकाउंटेंट जनरल (AG) के माध्यम से करवाने का प्रस्ताव रखा, तो जानकारों के मुताबिक पुलिस महानिदेशक (DGP) द्वारा उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया।
इसके विपरीत, पुलिस मुख्यालय की ओर से उस आवास समिति के माध्यम से ऑडिट कराने की घोषणा की गई, जिसमें स्वयं संजीव गांधी रह रहे थे। जानकारों का मानना है कि बाहरी और स्वतंत्र ऑडिट कराने के बजाय अधिकारी के आवास का इस तरह चयन कर ऑडिट करवाना प्रतिशोध की भावना को दर्शाता है। इसके अलावा, अधिकारी पर लगभग 1.80 लाख रुपये का पीनल रेंट (दंडात्मक किराया) लगाए जाने की कार्रवाई पर भी गंभीर वैधानिक सवाल खड़े हुए, क्योंकि संबंधित आवास कभी विधिवत रूप से एसपी शिमला के लिए आधिकारिक तौर पर अधिसूचित ही नहीं किया गया था।
हाल ही में दशहरे के अवसर पर संजीव गांधी ने अपने फेसबुक पेज पर नशा तस्करी के विरुद्ध अपने 27 वर्षों के सेवाकाल का जिक्र करते हुए लिखा था कि शिमला जिला में अपने तीन वर्षों के कार्यकाल के दौरान उन्होंने 2,000 से अधिक तस्करों को गिरफ्तार किया और लगभग 1,000 मामले दर्ज किए। इस दौरान उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल द्वारा सम्मानित भी किया गया था, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी पोस्ट में किया था।
विमल नेगी प्रकरण और गहराता विवाद
कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि हिमाचल प्रदेश के बहुचर्चित विमल नेगी संदिग्ध मौत मामले के बाद से ही उच्च अधिकारियों के साथ शुरू हुआ प्रशासनिक गतिरोध धीरे-धीरे बढ़ता चला गया। हालांकि इस दौरान उच्च स्तर पर अधिकारियों के तबादले भी होते रहे, लेकिन अंततः यह मनमुटाव अब वर्तमान स्थिति तक पहुंच गया है, जहां एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी पर सीधे आपराधिक मामले दर्ज होने की नौबत आ गई है। फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम ने हिमाचल पुलिस विभाग और शासन व्यवस्था के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है।

















