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Himalayan Serow: हिमाचल के जंगलों में 20 साल बाद पहली बार कैमरे में कैद हुआ दुर्लभ ‘हिमालयन सेरो’

Himachal Pradesh Wildlife News: डलहौजी के कैचमेंट जंगलों में 20 साल बाद दुर्लभ हिमालयन सेरो कैमरे में रिकॉर्ड हुआ है। वन विभाग के गश्ती दल ने इस संकटापन्न वन्यजीव का वीडियो बनाकर इसके अस्तित्व की पुष्टि की है।
Published on: 4 August 2026
Himalayan Serow: हिमाचल के जंगलों में 20 साल बाद पहली बार कैमरे में कैद हुआ दुर्लभ 'हिमालयन सेरो'

Himalayan Serow Spotted in Dalhousie: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में डलहौजी वन मंडल के अंतर्गत आने वाले कैचमेंट जंगलों में एक अत्यंत दुर्लभ वन्यजीव घटनाक्रम सामने आया है। कालाटोप-खजियार वन्यजीव अभयारण्य से सटे डलहौजी के जंगलों में लगभग दो दशकों के लंबे अंतराल के बाद अति-दुर्लभ हिमालयन सेरो (Himalayan Serow) की उपस्थिति दर्ज की गई है। इस क्षेत्र के इतिहास में यह पहली बार है जब इस शर्मीले और दुर्लभ पहाड़ी जानवर को कैमरे के जरिए सीधे तौर पर रिकॉर्ड किया गया है।

रविवार को वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे नियमित जंगल गश्त के दौरान इस जानवर को देखा गया। गश्ती दल ने तत्परता दिखाते हुए इस दुर्लभ जीव को अपने वीडियो कैमरे में कैद कर लिया। डलहौजी और आसपास के पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विजुअल साक्ष्य माना जा रहा है। वन अधिकारियों का मानना है कि यह घटना इस क्षेत्र के जैविक विविधता की समृद्धि और जंगलों के बेहतर होते स्वास्थ्य का स्पष्ट प्रमाण है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हिमालयन सेरो (जिसका वैज्ञानिक नाम ‘कैप्रिकॉर्निस थर’ है) मुख्य रूप से हिमालय के दुर्गम, खड़ी ढलानों और घने वनों में निवास करने वाला एकांतप्रिय स्तनधारी जीव है। अपनी अत्यधिक शर्मीली प्रकृति और मानवीय आबादी से दूर रहने की प्रवृत्ति के कारण इसे देख पाना बेहद कठिन होता है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने घटते प्राकृतिक आवासों, जंगलों के विखंडन और अवैध शिकार के खतरों को देखते हुए इस प्रजाति को ‘नियर थ्रेटेंड’ यानी खतरे के निकट वाली श्रेणी में रखा हुआ है। यह दुर्लभ जीव मिजोरम का राज्य पशु भी है।

वर्ष 2021 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, कालाटोप वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में हिमालयन सेरो को अंतिम बार वर्ष 2005-06 के दौरान देखा गया था। उस समय क्षेत्र में फैले मुंह-खुर के गंभीर प्रकोप के बाद यह माना जाने लगा था कि स्थानीय स्तर पर इस प्रजाति का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। ऐसे में दो दशकों के लंबे इंतजार के बाद इसका दोबारा सामने आना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।

इस महत्वपूर्ण खोज पर बात करते हुए डलहौजी के मंडल वन अधिकारी डॉ. कुलदीप सिंह जमवाल ने बताया कि डलहौजी कैचमेंट क्षेत्र से हिमालयन सेरो का वीडियो डॉक्यूमेंटेशन क्षेत्र के वन्यजीव संरक्षण अभियान के लिए एक ऐतिहासिक पड़ाव है। यह विजुअल रिकॉर्ड डलहौजी वन मंडल के तहत आने वाले वनों की समृद्ध जैव विविधता को रेखांकित करता है और क्षेत्र में निरंतर वैज्ञानिक निगरानी तथा आवास संरक्षण की आवश्यकता को बल देता है।

डीएफओ डॉ. जमवाल के अनुसार, मौखिक दावों की तुलना में वीडियो साक्ष्य अधिक मजबूत और वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इससे दीर्घकालिक जैव विविधता निगरानी, प्राकृतिक आवास प्रबंधन और भावी संरक्षण योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण बेसलाइन डेटा प्राप्त होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में कैमरा-ट्रैपिंग और व्यवस्थित वन्यजीव सर्वेक्षणों के माध्यम से इस प्रजाति की आबादी और फैलाव का आकलन किया जाएगा।

गौरतलब है कि चंबा जिले के जंगलों में दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व डॉ. जमवाल के कार्यकाल के दौरान कालाटोप-खजियार क्षेत्र में सांभर हिरण की पहली आधिकारिक मौजूदगी दर्ज की गई थी। इसके अलावा, गामगुल वन्यजीव अभयारण्य में अत्यंत दुर्लभ हिमालयन ब्राउन बियर (भूरा भालू) का दस्तावेजीकरण भी एक प्रमुख उपलब्धि रही है। वन विभाग अनुसंधान, निरंतर निगरानी और स्थानीय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से इस नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

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