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Kasauli International Public School, Sanwara (Shimla Hills)

अध्ययन में दावा, जीव-जंतु भी करते हैं आपस में बातें

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डॉ. आशीष कुमार। प्रकृति आश्चर्यों से भरी हुई है। इसके द्वारा रचित हर रचना का महत्व है। जिस प्रकार मानव जाति संवाद करने के लिए भाषा का इस्तेमाल करती है, उसी प्रकार अन्य जीव-जन्तु आपस में अपने तरीके से संवाद करते हैं। यह बात जीवों पर किए गए अध्ययनों से सिद्ध हो चुकी है कि मनुष्य से इतर प्राणियों की भी अपनी भाषा है। वे अपने संदेशों को अपने तरीकों से एक दूसरे तक पहुंचाते हैं। वे अपने अभिव्यक्ति के उपकरणों का प्रयोग करके मनुष्य से कहीं अधिक अनुशासित और व्यवस्थित संवाद स्थापित करते हैं। उनकी विशेषताओं और क्षमताओं को मानव की क्षमताओं से किसी भी प्रकार से कम नहीं आंका जा सकता हैं

मधुमक्खियों सामाजिक होती हैं। वे विशेष प्रकार के ‘डांस’ द्वारा एक-दूसरे से बातचीत करती हैं। आस्ट्रिया के जीवशास्त्री कार्ल वार्न फ्रिश (Karl von Frisch), जिन्होंने जर्मनी के म्युनिख में रहकर मधुमक्खियों की संवाद कुशलता पर अध्ययन किया। उन्होंने पता लगाया कि मधुमक्खियां विशेष प्रकार के नृत्यों द्वारा संदेश प्रेषित करती हैं।

1967 में प्रकाशित उनकी किताब ‘द डांस लैग्वेज एंड ओरिएन्टेशन ऑफ बीज्स’ (The Dance Language and Orientation of Bees) में मघुमक्खियों के कई प्रकार के डांस बताए, जिनसे अलग-अलग संदेश प्रेषित होते हैं, जैसे ‘वैगल डांस’ (Waggle Dance) जो बताता है कि भोजन का स्रोत पास ही है।

मधुमक्खियां भेजती हैं संदेश
‘राउंड डांस’ (Round Dance) बताता है कि भोजन छत्ते से 50 मीटर की दूरी के अंदर है। ‘सिकल डांस’ (Sickle Dance) बताता है कि भोजन या पानी लगभग 150 मीटर की दूरी पर है। संदेश पाने के बाद मजदूर मधुमक्खियां अपने काम पर लग जाती हैं। इसी प्रकार छत्ते पर खतरा पैदा होने पर संदेश भेजे जाते हैं, जिससे सैनिक मधुमक्खियां संभावित खतरे पर हमला प्रारंभ कर देती हैं। इस महत्वपूर्ण खोज के लिए वैज्ञानिक कार्ल वॉन फ्रिश को वर्ष 1973 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

जीव-जंतुओं की बुद्धि
मधुमक्खियों की भाषा पढ़ने में भारतीय वैज्ञानिक जगतपति चतुर्वेदी ने भी अपना योगदान दिया है। उन्होंने अपनी किताब ‘जीव-जंतुओं की बुद्धि’ में बताया है कि यदि मधुमक्खियों के नृत्य की गति धीमी है तो इसका अर्थ है कि फूलों का जो स्रोत उनके द्वारा तलाशा गया है, उसमें पराग की मात्रा कम है, ऐसे में संख्या में कम मजदूर मधुमक्खियों को जाने की आवश्यकता है। यदि नृत्य की गति तेज है तो इसका अर्थ है कि पराग की बहुलता है और अधिक संख्या में मजदूर मधुमक्खियां भोजन के स्रोत तक जाएं।

दीमकों बॉम्बी में होते हैं कई प्रकार के कमरे
अमेरिकी जीवशास्त्री हेराल्ड हीथ ने दीमकों पर अध्ययन किया। उन्होंने शोध में पाया कि दीमकें जिस बॉम्बी में रहती हैं, उसमें कई प्रकार के कमरे होते हैं। कमरों की बनावट उनके सामाजिक ताने-बाने के अनुसार होती है। राजा-रानी के लिए बड़े और विशेष कमरे होते हैं, बल्कि अन्य दीमकों के लिए छोटे कमरे होते हैं। यदि कॉलोनी में कोई दीमक भूखी हो तो वह मजदूर दीमकों के सींगनुमा एंटीनाओं को स्पर्श करती है, यही उनका भोजन मांगने का तरीका होता है।

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यदि भोजन मांगने वाला दीमक, बच्चा है और आगे चलकर कॉलोनी का राजा बनने वाला है तो इस राजकुमार दीमक का भोजन मांगने का तरीका और मजदूर दीमकों का भोजन देने का तरीका दोनों भिन्न होगा। वह रौबदार तरीके से मजदूर दीमकों से भोजन की मांग करेगा है और मजदूर दीमकें अपने मुंह से एक तरल निकालकर उस उत्तराधिकारी राजकुमार को अविलम्ब आहार प्रदान करेंगी। यदि भोजन की मांग करने वाला मजदूर का बच्चा है तो दीमकें उसे आंतों के पिछले हिस्से से पदार्थ निकालकर देंगी।

टीम बनाकर बोझा ढोने का काम करती हैं चीटियां
चीटियां भी सामाजिक जीव होती हैं। उनका सामाज रानी, सैनिक, मजदूर आदि में विभाजित रहता है। वे आपसी संवाद के लिए विशेष संकेतों को प्रयोग करती हैं। उनकी मूक भाषा में भी गहराई, सूक्ष्मता और बुद्धिमता दिखायी देती है। वे अपने संकेतों द्धारा रास्ते का चुनाव करती हैं, टीम बनाकर बोझा ढोने का काम करती हैं, खतरों से निपटने के लिए सैनिक चीटियों को बुलाती हैं, मौसम को पूर्वानुमान लगाकर अपने अंडों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का कार्य प्रारंभ कर देती हैं। मौसम विज्ञानी भी जीव जंतुओं की व्यवहार को समझकर मौसम के पूर्वानुमान लगाने की विधियों पर काम कर रहे हैं।

गिद्ध आपस में बातचीत करते हैं
भारतीय समाज में गिद्ध को अशुभ पक्षी माना जाता है, लेकिन वह विशेष प्रकार की चैंओं-चैओं की आवाज द्धारा अपने साथियों को बता देता है कि किस किस्म के जानवार का मृत शरीर पड़ा हुआ है, किस स्थान पर और कितने गिद्धों के लिए भोजन उपलब्ध है। इस आवाज को जब दूसरा गिद्ध सुनता है तो वह भोजन के स्रोत की ओर उड़ने से पहले उसी प्रकार की आवाज निकालर अपने पीछे वाले गिद्धों को संदेश भेज देता है। इस प्रकार की अनूठी संवाद प्रक्रिया द्धारा गिद्ध आपस में बातचीत करते हैं।

ऑक्टोपस को कहा जाता है बुद्धिमान जीव
इसी प्रकार समुद्र में रहने वाले जीव भी आपसी संवाद के लिए विशेष तकनीकों का इंस्तेमाल करते हैं। व्हेल मछलियां प्रकृति प्रदत्त सोनार सिस्टम द्धारा आपस में संवाद करती हैं। ऑक्टोपस को बुद्धिमान जीव कहा जाता है। वह अपनी बुद्धिमत्ता को आपसी संवाद में प्रकट करता है।

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कीटों की भी अपनी भाषा होती है
छोटे कीटों की भी अपनी भाषा होती है। वे अंग स्पर्श द्वारा संवाद करते हैं। उनके अंग स्पर्श करने के तरीके बेहद व्यवस्थित और श्रृंखलाबद्ध होते हैं, जिससे विशेष संदेश संचारित होते हैं। समान जाति के जीव इन संदेशों को भलीभांति समझते हैं और प्रतिक्रिया व्यक्त कर बहुमार्गी कम्युनिकेशन चैनल का निर्माण करते हैं। अपने साथी के किस अंग को किस प्रकार छुएं या पकडे़ं, इस प्रक्रिया से वे अपने साथियों को मन की बात बता देते हैं। ध्वनि, हलचल और स्पर्श से छोटे जीवों में संदेशों का आदान प्रदान होता है। हमें वे देखने में मूक लग सकते हैं, लेकिन उनकी घ्वनियां इतनी कम होती हैं कि हमारे कान उन्हें सुन नहीं सकते हैं, लेकिन ये छोटे जीव उन्हें सुन और समझ लेते हैं।

टिड्डों की 400 प्रकार की ध्वनि
मेढ़क अपनी टर्र-टर्र की आवाज द्वारा अपने साथियों को अपनी मानसिक स्थिति और इच्छाओं के बारे में अवगत कराता है। टिड्डे अपने पंखों पर पिछले पैरों को रगड़कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं। वैज्ञानिकों ने टिड्डों द्वारा उत्पन्न करीब 400 प्रकार की ध्वनि रिकॉर्ड की हैं, इसमें से कुछ प्रणय संबंध के लिए भी होती हैं।

जुगनू प्रकाश निकालकर करते हैं संवाद
कुछ जीव शरीर से प्रकाश उत्पन्न कर आपस में बातचीत करते हैं। रेलरोड कीड़ा के शरीर से लाल हरे रंग का प्रकाश निकलता है। जुगनू भी अपने शरीर प्रकाश निकालकर आपस में संवाद करते हैं। इनके शरीर से निकलने वाला प्रकाश की मात्रा और रंग समान नहीं होत है, बल्कि ये प्रकाश कभी तीव्र तो कभी मंद होता है। प्रकाश की इसी तीव्रता और रंग में संदेश छुपे होते हैं, जिसे समान जाति के कीड़े आसानी से समझ लेते हैं।

कहा जा सकता है, मानव जाति की तरह ही जीव-जंतुओं में भी अपनी अभिव्यक्ति पायी जाती है, केवल तरीके अलग हैं। उनके संवाद उपकरण मनुष्य से भिन्न हो सकते हैं, उनका शब्दकोश हमारे उच्चाण के तरीकों से भले ही मेल न खाता हो, लेकिन प्रकृति ने उन पर भी प्रेम लुटाया है। उनकी महत्ता को स्थापित किया है। कह सकते हैं –

खग जाने खग की भाषा,
ताते उमा गुप्त कर रखा।

[लेखक ‘इंटरनेशनल स्कूल ऑफ मीडिया एंड एंटरटेनमेंट स्टडीज’ (ISOMES) में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं]

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