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Himachal Glacier Lakes Danger: हिमाचल में ‘वॉटर बॉम्ब’ बनीं 9 ग्लेशियर झीलें, IIT मंडी के अध्ययन में बड़ा खुलासा

IIT Mandi Study: जलवायु परिवर्तन के बीच हिमाचल प्रदेश में 9 ग्लेशियर झीलें खतरे का सबब बनी हुई हैं। IIT मंडी के अध्ययन के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में इन झीलों के आकार में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और इनकी संख्या भी 30 प्रतिशत तक बढ़ गई है।
Published on: 5 September 2026
Himachal Glacier Lakes Danger: हिमाचल में 'वॉटर बॉम्ब' बनीं 9 ग्लेशियर झीलें, IIT मंडी के अध्ययन में बड़ा खुलासा

Himachal Glacier Lakes Danger: ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन के बीच हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों से एक चिंताजनक खबर सामने आई है। आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, राज्य की 9 ग्लेशियर झीलें सामान्य से काफी तेजी से पिघल रही हैं। पिछले 10 वर्षों में न केवल इन झीलों का क्षेत्रफल बढ़ा है, बल्कि इनकी संख्या में भी 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि प्राकृतिक और मानव निर्मित कारणों से यदि इन झीलों से अचानक पानी का रिसाव होता है, तो निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है। आईआईटी मंडी के शोधकर्ता प्रोफेसर डॉ. डेरिक्स पी. शुक्ला ने सैटेलाइट और अन्य माध्यमों से जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में झीलों की कुल संख्या अब 2,000 के करीब पहुंच चुकी है।

इनमें से चंबा और लाहौल की सीमा पर स्थित 9 प्रमुख झीलें, कालीकुंड, चंद्रताल, वासुकी, सुरई, क्या त्सो, योचे, समुद्रा टापू, कासंगा और गेपांग गाथ अत्यधिक संवेदनशील हैं और कभी भी ‘वॉटर बॉम्ब’ का रूप ले सकती हैं। इन झीलों में होने वाले किसी भी संभावित हादसे से 15 से अधिक पुल, कई रिहाइशी गांव, स्कूल और स्वास्थ्य संस्थान सीधे खतरे की जद में आ सकते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, ग्लेशियर पिघलने से गेपांग गाथ झील का क्षेत्रफल 2.44 लाख स्क्वायर मीटर बढ़ गया है। वहीं, कासंग झील में 1.50 लाख स्क्वायर मीटर और कालीकुंड में 1.20 लाख स्क्वायर मीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, कालीकुंड झील की ढलान काफी सीधी और खड़ी होने के कारण यह बेहद संवेदनशील श्रेणी में आती है।

हालांकि, सरकारी एजेंसियों, केंद्रीय जल आयोग (CWC) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की रिपोर्ट में फिलहाल हिमाचल की केवल 4 झीलों को ही संवेदनशील क्षेत्र में रखा गया है, जिनमें से तीन झीलें आईआईटी मंडी के इस अध्ययन में भी शामिल हैं।

डॉ. शुक्ला ने बताया कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे प्राकृतिक और मानवीय दोनों तरह के कारक जिम्मेदार हैं। जहां प्राकृतिक कारणों में भूकंप और भूस्खलन मुख्य हैं, वहीं मानवीय कारकों में पहाड़ी इलाकों में पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही सबसे बड़ा कारण बन रही है। पर्यटकों की आमद बढ़ने से बर्फ और ग्लेशियरों पर धूल का जमाव बढ़ जाता है, जो उनके तेजी से पिघलने की मुख्य वजह है। उन्होंने कहा कि आज तकनीक के जरिए इन बदलावों को ट्रैक करना आसान हो गया है, लेकिन अब सरकारों को इन्हें बचाने के लिए धरातल पर उतरकर ठोस कदम उठाने होंगे।

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