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Himachal Politics: सुक्खू सरकार की नौकरशाही पर ढीली पकड़ को लेकर बहस, बाहरी अफसरों का विवाद या वीरभद्र गुट की सत्ता की लड़ाई?

Himachal Politics: सुक्खू सरकार की नौकरशाही पर पकड़ ढीली को लेकर बहस, बाहरी अफसरों का विवाद या वीरभद्र गुट की सत्ता की लड़ाई?

Himachal Politics News: हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार में इन दिनों नौकरशाही को लेकर बड़ा विवाद छिड़ा हुआ है। पूर्व सीएम स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के पुत्र और लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने मंगलवार को खुलकर कुछ बाहर से आए IAS और IPS अधिकारियों पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि ये अफसर राज्य के हितों को नजरअंदाज कर अपने निजी एजेंडे चला रहे हैं और शासक की तरह बर्ताव कर रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से इन पर सख्त कार्रवाई की मांग की। वहीं दूसरी तरफ उनके समर्थक सोशल मीडिया के माध्यम से कांग्रेस के हाई कमान से हिमाचल प्रदेश में सीएम बदलाव कि मांग कर रहे हैं। दरअसल यह बयान ऐसे समय में आया है जब अप्रैल 2026 में एक बार फिर से राज्यसभा चुनाव होने वाले हैं और पार्टी के अंदर पुरानी गुटबाजी फिर से उभर रही है।सुक्खू सरकार के नौकरशाही पर नियंत्रण को लेकर बहस

उल्लेखनीय है कि विक्रमादित्य सिंह ने फेसबुक पर एक तीखी पोस्ट लिखी, जिसमें उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की एक महीने पुरानी चेतावनी का पूरा समर्थन किया। उन्होंने लिखा, “मंडी में उपमुख्यमंत्री के भाषण से हम पूरी तरह सहमत हैं। उन्होंने आगे लिखा कि, यूपी और बिहार के कुछ IAS-IPS अधिकारी हिमाचली मूल्यों की कद्र नहीं कर रहे। उन्हें राज्य की सेवा करनी चाहिए, न कि शासक बनना चाहिए।” यह पोस्ट 6 दिसंबर 2025 को मंडी में कांग्रेस सरकार के तीन साल पूरे होने के कार्यक्रम में अग्निहोत्री के बयान के बाद आई। तब अग्निहोत्री ने नौकरशाहों को चेताया था कि जो सरकार के खिलाफ काम करेंगे, उनसे “अंधेरी रात में निपटा जाएगा”।

मंत्री विक्रमादित्य ने केंद्र से आए फंड के मनमाने बंटवारे पर भी गुस्सा जताया। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, “केंद्र का फंड हिमाचल के लोगों का है। किसी अफसर को इसे अपने मन से बांटने का हक नहीं। सड़कें और परियोजनाएं रुकी हुई हैं, राज्य की पहचान को चोट पहुंच रही है।” हालांकि नाम लिए बिना उनका इशारा साफ था। विक्रमादित्य पीडब्ल्यूडी, शहरी विकास और आवास विभाग संभालते हैं, जहां उत्तर प्रदेश कैडर के 1997 बैच के IAS देवेश कुमार प्रधान सचिव हैं।

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हालांकि कांग्रेस सरकार और पार्टी में इस बात को लेकर सभी एक मत नहीं हैं। राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा, “बाहर के कई अफसर अच्छा काम कर रहे हैं। सामान्य आरोप लगाने की बजाय नाम लेने चाहिए।”

उधर, उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने मामले में विक्रमादित्य सिंह का बचाव करते हुए कहा कि ये देखना होगा कि उन्होंने किस संदर्भ में ये बात कही है। बता दें कि अग्निहोत्री ने कई मौकों पर राज्य की नौकरशाही के कामकाज पर नाराजगी जताई है। अग्निहोत्री को वीरभद्र सिंह का करीबी माना जाता है।

दी प्रिंट की एक खबर के मुताबिक वरिष्ठ कांग्रेस नेता राशिद अल्वी भी इस विवाद में कूद पड़े हैं, अल्वी ने नई दिल्ली में पत्रकारों से कहा, “सिविल सर्वेंट पूरे भारत में सेवा करते हैं। इस तरह की टिप्पणियां देश को बांटती हैं, जैसे महाराष्ट्र में यूपी और बिहार के लोगों पर राज ठाकरे के हमले। भारत सभी का है। प्रशासनिक बंटवारे ठीक हैं, लेकिन आपसी हमले ठीक नहीं हैं।”

वहीं पार्टी के अंदर भी कुछ नेता मानते हैं कि नौकरशाही बेलगाम हो गई है। एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “शुरू से यही शिकायत है। अफसर कांग्रेस नेताओं की नहीं सुन रहे, मंत्री तक परेशान हैं।” स्वास्थ्य मंत्री धनिराम शांडिल ने भी स्वास्थ्य सचिव के निर्देश न मानने की शिकायत की थी।

हालांकि, विक्रमादित्य सिंह ने अपनी पोस्ट और प्रेस वार्ता में किसी भी अधिकारी का नाम नहीं लिया, पत्रकारों के बार-बार के सवाल पर भी वह गोलमोल जबाब देते नजर आए, लेकिन उनकी टिप्पणियों को सरकार के नौकरशाही पर कमजोर होते नियंत्रण के संकेत के रूप में देखा रहा है। यह आरोप हिमाचल प्रदेश में विपक्षी बीजेपी अक्सर लगाती रही है। विपक्षी दल बीजेपी इसे सरकार की कमजोरी बता रही है।

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गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में चल रहा नौकरशाही विवाद काफी दिलचस्प और चिंताजनक है। विक्रमादित्य सिंह के ताजा बयानों से लगता है कि सुक्खू सरकार का अफसरों पर पूरा कंट्रोल नहीं है, और यह पार्टी की आंतरिक कलह का हिस्सा बन गया है। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार का प्रशासन पर मजबूत पकड़ होना जरूरी है।

अगर मंत्री कह रहे हैं कि फंड का मनमाना बंटवारा हो रहा, सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता यह गंभीर मुद्दा है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को अफसरों से जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। उपमुख्यमंत्री अग्निहोत्री की पुरानी चेतावनी और अब विक्रमादित्य का समर्थन दिखाता है कि कुछ दिक्कतें असल में हैं। अगर अफसर निर्देश नहीं मान रहे, तो यह सरकार की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।

उधर, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में उठा यह विवाद सिर्फ नौकरशाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सत्ता और प्रभाव की गहरी लड़ाई छिपी है। जानकार मानते हैं कि प्रदेश में नौकरशाही लंबे समय से बेलगाम होती दिख रही है और इसे काबू में करना मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी थी। उपमुख्यमंत्री का केंद्रीय नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाना इस बात का संकेत था कि मामला गंभीर है और तत्काल कार्रवाई की जरूरत थी, लेकिन इसके बाद भी जमीन पर कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आया।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि विक्रमादित्य सिंह द्वारा बाहरी अधिकारियों पर किए गए हमले को केवल प्रशासनिक नाराज़गी के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे अप्रैल 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि दिवंगत मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का परिवार, खासकर प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह, राज्यसभा टिकट के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। वीरभद्र गुट चाहता है कि प्रतिभा सिंह को यह सीट मिले, ताकि राजनीतिक विरासत कायम रह सके।

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पार्टी के अंदरखाने की चर्चाओं के मुताबिक कुछ नेता वीरभद्र गुट को संतुष्ट करने के लिए प्रतिभा सिंह को राज्यसभा भेजने के पक्ष में हैं। वहीं रजनी पाटिल,आनंद शर्मा, कौल सिंह और विप्लव ठाकुर का नाम भी विकल्प के तौर पर सामने आ रहा है। हालांकि स्थिति आसान नहीं है, क्योंकि पिछली बार अभिषेक मनु सिंघवी की हार और क्रॉस-वोटिंग ने कांग्रेस सरकार को लगभग संकट में डाल दिया था। उस दौरान “बाहरी” नेताओं को लेकर बना नैरेटिव भी अब तक पार्टी को परेशान कर रहा है।

इसके उलट मौजूदा राजनीतिक हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का गुट फिलहाल मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है। प्रतिभा सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया जा चुका है और उनकी जगह विनय कुमार को जिम्मेदारी दी गई है, जिन्हें सुक्खू का करीबी माना जाता है। हाल ही में 11 जिलों में की गई जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों में भी सुक्खू गुट का प्रभाव साफ दिखाई देता है। संगठन में नए चेहरों के उभार के साथ सुक्खू कैंप की पकड़ लगातार मजबूत होती जा रही है।

राजनीतिक जानकारों का निष्कर्ष साफ है कि यह लड़ाई अफसरों की नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन की है। एक तरफ वीरभद्र गुट नौकरशाही पर सरकार की कमजोर पकड़ का मुद्दा उठाकर हाईकमान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सुक्खू गुट संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर अपनी स्थिति मजबूत करता दिख रहा है।

आगे क्या मोड़ आएगा, यह फिलहाल साफ नहीं है, लेकिन सियासी हलचल ने आने वाले महीनों को और दिलचस्प बना दिया है।

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